by admin@bebak24.com on | 2026-07-03 09:31:11
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लीगल डेस्क (बेबाक24): भारतीय लोकतंत्र और नागरिकों के मौलिक अधिकारों के पक्ष में एक बेहद ऐतिहासिक और बेबाक फैसला सुनाते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट ने केंद्र व राज्य सरकार और पुलिस महकमे को आईना दिखाया है। हाई कोर्ट ने सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के महाराष्ट्र महासचिव और पूर्व लोकसभा प्रत्याशी सईद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी के खिलाफ जारी एक साल के एक्सटर्नमेंट ऑर्डर (तड़ीपार या मुंबई और आसपास के इलाकों से बाहर निकालने का आदेश) को पूरी तरह अवैध मानते हुए रद्द कर दिया है।
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस माधव जामदार ने मुंबई पुलिस की कार्यप्रणाली की तीखी आलोचना की। कोर्ट ने बेहद तल्ख लहजे में कहा कि सरकार की नीतियों का विरोध करना या उनके खिलाफ नारेबाजी करना किसी भी नागरिक को उसके अपने शहर से निर्वासित करने का कानूनी आधार नहीं हो सकता।
लीगल न्यूज़ वेबसाइट 'लाइव लॉ' के अनुसार, सुनवाई के दौरान जस्टिस माधव जामदार ने देश में चल रहे हालिया मुद्दों, जैसे परीक्षा पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शनों का हवाला देते हुए पुलिस और स्टेट पावर के दुरुपयोग पर गंभीर सवाल उठाए।
जस्टिस माधव जामदार: "यह देश में क्या हो रहा है? क्या सभी नागरिकों को भारत सरकार का ग़ुलाम बनाया जा रहा है? वे विरोध प्रदर्शन नहीं कर सकते, वे आंदोलन नहीं कर सकते, यह सब क्या है? देश में इतने पेपर लीक हो रहे हैं, अगर लोग उसके खिलाफ आवाज उठाएं, तो क्या आप उनके खिलाफ केस दर्ज कर देंगे?"
नारेबाजी अपराध नहीं: कोर्ट ने हैरानी जताते हुए पूछा कि 'बीजेपी सरकार मुर्दाबाद' और 'अमित शाह मुर्दाबाद' जैसे राजनीतिक नारे लगाना किसी दंडात्मक कार्रवाई का आधार कैसे बन सकता है? लोकतांत्रिक देश में नागरिकों को ऐसे नारे लगाने का पूरा हक है।
पुलिस जनता के प्रति जवाबदेह, मंत्रियों की कार्यकर्ता नहीं: जज ने मौखिक रूप से बेहद कड़ा संदेश देते हुए कहा कि पुलिस अधिकारी जनता के सेवक और उनके प्रति जवाबदेह हैं, वे किसी मंत्री या राजनीतिक दल के अधीन काम करने वाले राजनीतिक कार्यकर्ता नहीं हैं।
मौलिक अधिकारों का हनन: कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों में भाग लेने के कारण सईद चौधरी को शहर से बाहर निकालना संविधान के अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 21 (गरिमा के साथ जीने का अधिकार) का सीधा उल्लंघन है।
मुंबई के चेंबूर निवासी सईद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी नागरिकता संशोधन कानून (CAA), राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC), बाबरी व ज्ञानवापी मस्जिद विवाद, वक्फ बोर्ड में कथित भ्रष्टाचार और महंगाई जैसे मुद्दों पर लगातार लोकतांत्रिक आंदोलन आयोजित करते रहे हैं।
अक्टूबर 2025 में शुरुआत: महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम (MPA) के तहत उनके खिलाफ 2019 से 2024 के बीच दर्ज कई एफआईआर को आधार बनाकर निर्वासन की कार्यवाही शुरू की गई।
दिसंबर 2025 का दमनकारी आदेश: चेंबूर के पुलिस कमिश्नर ने नगर निकाय चुनावों से ठीक पहले चौधरी को 12 महीने के लिए मुंबई और उपनगरीय सीमा से बाहर रहने का आदेश सुना दिया, ताकि वे संगठनात्मक और चुनावी प्रचार न कर सकें।
धारा 188 का गलत इस्तेमाल: चौधरी की ओर से पेश अधिवक्ता पायोशी रॉय और इब्राहिम हरबत ने दलील दी कि पुलिस ने जिन एफआईआर का हवाला दिया, वे सभी शांतिपूर्ण प्रदर्शनों से जुड़ी थीं और उनमें केवल आईपीसी की धारा 188 (लोक सेवक के आदेश की अवहेलना) लगी थी। कानूनन, धारा 188 के छोटे मामलों को 'तड़ीपार' (एक्सटर्नमेंट) जैसी गंभीर कार्रवाई के दायरे में नहीं लाया जा सकता, जो केवल खूंखार अपराधियों या संपत्ति को भारी नुकसान पहुंचाने वालों पर लागू होती है। हाई कोर्ट ने इस दलील को सही माना और पुलिस के आदेश को 'दुर्भावनापूर्ण' करार दिया।
इस फैसले के बाद देश के कानूनी और राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हैं:
प्रशांत भूषण (वरिष्ठ वकील, सुप्रीम कोर्ट): उन्होंने इस फैसले की सराहना करते हुए एक्स (ट्विटर) पर लिखा, "यह दिखाता है कि न्यायपालिका में अब भी ऐसे जांबाज जज मौजूद हैं, जिनमें सत्ता से कड़े सवाल पूछने और नागरिकों के अधिकारों के पक्ष में खड़े होने का साहस है। बेहद सराहनीय।"
SDPI का आधिकारिक बयान: पार्टी ने फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि जस्टिस जामदार की यह टिप्पणी कि "पुलिस अधिकारी पीएम या सीएम के सेवक नहीं हैं", स्टेट पावर का दुरुपयोग करने वाले हुक्मरानों के गाल पर एक जोरदार तमाचा है।
| व्यक्तिगत एवं शैक्षणिक पृष्ठभूमि | विधिक एवं न्यायिक करियर |
| जन्म एवं शिक्षा: 13 जनवरी 1967 को पुणे में जन्मे जस्टिस जामदार ने कीर्ति कॉलेज से बीएससी और रुइया कॉलेज से इंडस्ट्रियल-एनालिटिकल केमिस्ट्री में डिप्लोमा किया। 1991 में न्यू लॉ कॉलेज से एलएलबी की डिग्री ली। | चैंबर प्रैक्टिस: एलएलबी के बाद वे मशहूर अधिवक्ता एम. ए. राणे के चैंबर से जुड़े। उन्होंने सिविल, क्रिमिनल और संवैधानिक मामलों में बॉम्बे हाई कोर्ट में लंबी वकालत की। |
| पारिवारिक विरासत: उनके पिता जे. डी. जामदार 1960 से 1994 तक न्यायिक सेवा में रहे और बॉम्बे सिटी सिविल कोर्ट के जज पद से सेवानिवृत्त हुए थे। | जनहित के नायक: जज बनने से पहले उन्होंने सीवर कर्मियों की मौत, पर्यावरण संरक्षण, नदियों के प्रदूषण और कॉलेजों द्वारा वसूली जाने वाली भारी फीस के खिलाफ कई ऐतिहासिक पीआईएल (PIL) लड़ीं। कोर्ट ने उन्हें कई मामलों में 'एमिकस क्यूरी' (अदालत का मित्र) भी बनाया था। 7 जनवरी 2020 को उन्हें बॉम्बे हाई कोर्ट का जज नियुक्त किया गया था। |
बॉम्बे हाई कोर्ट का यह फैसला देश के मौजूदा राजनीतिक और प्रशासनिक परिदृश्य पर एक बेहद जरूरी और तीखा प्रहार है। पिछले कुछ सालों में यह चलन सा बन गया है कि जो भी व्यक्ति या राजनीतिक कार्यकर्ता सरकार की नीतियों (चाहे वो सीएए हो, वक्फ संशोधन हो या पेपर लीक का मुद्दा हो) के खिलाफ शांतिपूर्ण सड़क पर उतरता है, पुलिस प्रशासन उसे कानून-व्यवस्था के लिए खतरा बताकर 'क्रिमिनल' की तरह ट्रीट करने लगता है। महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम की धाराओं का इस्तेमाल विपक्षी नेताओं को चुनाव प्रचार से रोकने के लिए 'तड़ीपार' टूल के रूप में करना लोकतांत्रिक शुचिता का मर्डर है।
'बेबाक24' जस्टिस माधव जामदार की इन मौखिक और लिखित टिप्पणियों को सलाम करता है। उन्होंने साफ कर दिया कि भारत एक स्वतंत्र लोकतांत्रिक गणराज्य है, जहां जनता अपनी संप्रभुता के जरिए सरकारें चुनती है। पुलिस अधिकारियों को यह याद रखना होगा कि उनकी वर्दी पर लगा अशोक स्तंभ देश के संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ दिलाता है, न कि सत्ता में बैठे किसी राजनीतिक आका की गुलामी करने की। जब देश में नीट और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक होने से करोड़ों युवाओं का भविष्य अधर में लटका हो, तब शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले नागरिकों पर लाठियां भांजना और उन्हें 'तड़ीपार' करना कानून के राज की नहीं, बल्कि एक 'पुलिस स्टेट' (तानाशाही) की निशानी है। यह फैसला उन सभी पुलिस कमिश्नरों और ब्यूरोक्रेट्स के लिए एक गंभीर चेतावनी है जो मंत्रियों को खुश करने के लिए कानून की किताबों को ताक पर रख देते हैं।
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