by admin@bebak24.com on | 2026-07-03 19:09:18
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इंटरनेशनल डेस्क (बेबाक24): ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई और उनके परिवार के सदस्यों की अंतिम विदाई की रस्में (Funeral Rituals) आख़िरकार करीब चार महीने के लंबे इंतज़ार के बाद शुक्रवार (3 जुलाई 2026) को तेहरान के ऐतिहासिक 'ग्रैंड मोसाल्ला' (इमाम खुमैनी मस्जिद) में शुरू हो गईं।
इस साल फ़रवरी में अमेरिका और इसराइल के भीषण हवाई हमलों में मारे गए सुप्रीम लीडर के जनाज़े की रस्मों को इतने लंबे समय तक टाले जाने और उनके पार्थिव शरीर को दफ़नाने के लिए पड़ोसी देश इराक़ के पवित्र शहरों में ले जाने को लेकर दुनिया भर के भू-राजनीतिक गलियारों में कई बड़े सवाल उठ रहे हैं।
इस्लामिक परंपराओं में आमतौर पर मृत्यु के तुरंत बाद दफ़नाने की प्रक्रिया पूरी की जाती है, लेकिन ख़ामेनेई के मामले में करीब 120 दिनों की देरी के पीछे गहरे रणनीतिक, सैन्य और धार्मिक कारण हैं:
अमेरिका-ईरान के बीच 40 दिनों की जंग: फ़रवरी में हुए हमले के बाद अमेरिका, इसराइल और ईरान के बीच भीषण सैन्य टकराव शुरू हो गया था। युद्ध की स्थिति और हवाई क्षेत्र (Airspace) असुरक्षित होने के कारण इतने बड़े आयोजन को टालना पड़ा।
60 दिनों का ऐतिहासिक संघर्ष विराम (Ceasefire): हाल ही में 15 जून 2026 को अमेरिका और ईरान के बीच 60 दिनों के संघर्ष विराम को लेकर एक समझौता (MoU) हुआ। इस शांति समझौते के तुरंत बाद, 13 जून को ईरान ने इस 7 दिवसीय (3 जुलाई से 9 जुलाई) अंतिम यात्रा के शेड्यूल का एलान किया।
बिना रासायनिक लेप (Embalming) के कैसे सुरक्षित रहे शव?: इस्लाम में रासायनिक लेप (Chemical Embalming) की मनाही है। काउंटर टेररिज़्म एक्सपर्ट डॉ. ओमर मोहम्मद के अनुसार, शिया धार्मिक क़ानूनों के तहत विशेष परिस्थितियों में दफ़नाने में देरी की छूट मिल जाती है। ख़ामेनेई और उनके परिवार के शवों को सुरक्षित रखने के लिए किसी केमिकल के बजाय रेफ़्रिजरेटेड कोल्ड स्टोरेज (Refrigerated Cold Storage) तकनीक का इस्तेमाल किया गया।
शेड्यूल के मुताबिक, ख़ामेनेई का पार्थिव शरीर 7 जुलाई की शाम इराक़ पहुंचेगा और 8 जुलाई को नजफ़ व कर्बला में अंतिम यात्रा निकाली जाएगी। इसके पीछे धार्मिक आस्था के साथ-साथ तेहरान का बड़ा कूटनीतिक नैरेटिव छिपा है:
शिया जगत के सबसे पवित्र केंद्र: मक्का और मदीना के बाद नजफ़ (जहां पहले शिया इमाम, इमाम अली का रौज़ा है) और कर्बला (जहां इमाम हुसैन का मज़ार है) शिया इस्लाम के सबसे बड़े आस्था केंद्र हैं।
'सॉफ्ट पावर' और कूटनीतिक संदेश: ईरान इस अंतिम संस्कार को महज़ एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि जंग के बाद मिडिल ईस्ट में अपनी राजनीतिक और कूटनीतिक ताक़त के प्रदर्शन के रूप में देख रहा है। इराक़ में इस यात्रा का उद्देश्य यह दिखाना है कि अली ख़ामेनेई का धार्मिक और राजनीतिक प्रभाव केवल ईरान की सीमाओं तक सीमित नहीं था, बल्कि पूरे शिया जगत में फैला हुआ है।
इराक़ सरकार की सीधी भागीदारी: इराक़ के क़बायली नेताओं और धर्मगुरुओं के अनुरोध पर इराक़ी प्रधानमंत्री कार्यालय, गृह मंत्रालय और परिवहन मंत्रालय खुद इस भव्य आयोजन की देखरेख कर रहे हैं, जो दोनों देशों के मजबूत होते रिश्तों को दर्शाता है।
ईरान सरकार ने इस आयोजन के लिए सुरक्षा और सहायता के अभूतपूर्व इंतज़ाम किए हैं। 4 और 5 जुलाई को तेहरान में तथा 6 जुलाई को देशव्यापी राष्ट्रीय अवकाश घोषित किया गया है।
| मुख्य तारीखें | कार्यक्रम और स्थान | सुरक्षा व व्यवस्था |
| 3 जुलाई | अंतरराष्ट्रीय श्रद्धांजलि समारोह (विदेशी प्रतिनिधियों का आगमन) | सुरक्षा घेरा: 1.5 लाख पुलिसकर्मी हाई अलर्ट पर हैं। 10 हज़ार से अधिक सुरक्षाकर्मी कार्यक्रम स्थल पर तैनात हैं। |
| 4-5 जुलाई | तेहरान के ग्रैंड मोसल्ला में जनता की श्रद्धांजलि और मुख्य जनाज़े की नमाज़ | मेडिकल बैकअप: आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए 10 सैन्य अस्पतालों को एक्टिव किया गया है। |
| 6 जुलाई | तेहरान की सड़कों पर विशाल अंतिम यात्रा | नो-फ्लाई ज़ोन: 6 जुलाई को तेहरान और 9 जुलाई को मशहद का हवाई क्षेत्र पूरी तरह बंद रहेगा। |
| 7-8 जुलाई | इराक़ के नजफ़ और कर्बला शहरों में अंतिम यात्रा | भीड़ का अनुमान: आईआरजीसी (IRGC) के ब्रिगेडियर जनरल हसन हसनज़ादेह के मुताबिक, इस अंतिम यात्रा में 1.2 करोड़ से लेकर 2 करोड़ लोगों के शामिल होने की उम्मीद है। |
| 9-जुलाई | उत्तर-पूर्वी शहर मशहद में इमाम रज़ा के रौज़े में सुपुर्द-ए-ख़ाक़ | - |
इस महा-आयोजन के बीच ईरान के नए संभावित सुप्रीम लीडर और अली ख़ामेनेई के बेटे मोजतबा ख़ामेनेई को लेकर रहस्य गहराया हुआ है। फ़रवरी के हमले में मोजतबा की पत्नी (ज़हरा हद्दाद-आदिल), उनकी बहन बुशरा ख़ामेनेई, और उनके दामाद मिस्बाह अल-हुदा बाक़ेरी की मौत हो गई थी। मोजतबा खुद कई महीनों से सार्वजनिक रूप से दिखाई नहीं दिए हैं।
आयोजन समिति के सचिव अली अकबर पोरजमशीदियन ने मोजतबा की मौजूदगी पर यह कहकर सस्पेंस बढ़ा दिया कि यह उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि मोजतबा ख़ामेनेई सार्वजनिक रूप से लौटकर अपने पिता के जनाज़े की नमाज़ पढ़ाते हैं, तो यह साफ संकेत होगा कि वे ईरान की सत्ता और धार्मिक नेतृत्व की कमान संभालने जा रहे हैं।
ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई का यह अंतिम संस्कार केवल एक विदाई नहीं, बल्कि पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) के बदलते समीकरणों का एक बड़ा राजनीतिक थियेटर है। 4 महीने तक शव को कोल्ड स्टोरेज में रखकर युद्ध विराम (Ceasefire) का इंतज़ार करना यह दिखाता है कि ईरान किसी भी कीमत पर इस मौके को अपनी कमज़ोरी के रूप में पेश नहीं होने देना चाहता था। अमेरिका और इसराइल के साथ 40 दिनों की विनाशकारी जंग झेलने के बाद, तेहरान इस समय दुनिया को यह संदेश देना चाहता है कि उसके हौसले टूटे नहीं हैं। 2 करोड़ की अनुमानित भीड़ को सड़कों पर उतारना और देश में तीन दिन की नेशनल होलीडे घोषित करना, वहां की सत्तारूढ़ इस्लामिक व्यवस्था (Regime) के लिए अपनी खोई हुई साख और जनसमर्थन को दोबारा बटोरने का एक सोचा-समझा 'पब्लिसिटी और इमोशनल टूल' है।
'बेबाक24' यहां सबसे महत्वपूर्ण मोड़ 'इराक़ यात्रा' को मानता है। सद्दाम हुसैन के दौर में जो इराक़ ईरान का सबसे बड़ा दुश्मन था, आज उसी इराक़ के प्रधानमंत्री कार्यालय और परिवहन मंत्रालय द्वारा ईरानी सुप्रीम लीडर के शव की अगवानी के लिए पलक-पावड़े बिछाना यह साबित करता है कि बग़दाद पर इस समय तेहरान का वैचारिक और राजनीतिक नियंत्रण कितना गहरा हो चुका है। नजफ़ और कर्बला की सड़कों पर ख़ामेनेई के ताबूत को घुमाकर ईरान पूरे खाड़ी देशों (विशेषकर सऊदी अरब) को अपनी 'शिया कूटनीति' के वैश्विक प्रभाव का लोहा मनवाना चाहता है। हालांकि, असली परीक्षा 9 जुलाई को मशहद में दफ़्न होने के बाद शुरू होगी— जब मोजतबा ख़ामेनेई के भाग्य और ईरान के अगले सर्वोच्च नेतृत्व का आधिकारिक फैसला दुनिया के सामने आएगा।
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