by admin@bebak24.com on | 2026-07-01 11:23:10
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अंतरराष्ट्रीय डेस्क (बेबाक24): पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में जारी भारी उथल-पुथल के बीच दक्षिण एशिया के दो बड़े पड़ोसियों—भारत और पाकिस्तान—की कूटनीति इस समय वैश्विक रणनीतिकारों के बीच चर्चा का सबसे बड़ा विषय बनी हुई है। एक तरफ जहां पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान जैसे दो धुर विरोधी देशों के बीच मुख्य मध्यस्थ (Mediator) की भूमिका हासिल कर खुद को कूटनीतिक केंद्र में ला खड़ा किया है, वहीं दूसरी तरफ भारत अपनी स्थापित 'रणनीतिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) के तहत बेहद नपे-तुले और सतर्क कदम उठा रहा है।
सऊदी अरब के ऐतिहासिक रूप से बेहद करीब रहते हुए भी पाकिस्तान द्वारा ईरान और वाशिंगटन दोनों का भरोसा जीतना, उसकी भौगोलिक और सैन्य कूटनीति की जटिल कहानी बयां करता है।
इतिहास गवाह है कि 1989 में जब ईरान के तत्कालीन सर्वोच्च नेता अयातोल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी का अंतिम संस्कार हुआ था, तब पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति गुलाम इसहाक खान तेहरान पहुंचे थे—भले ही पाकिस्तान उस वक्त शीत युद्ध में अमेरिका के धड़े में शामिल था। अब, 9 जुलाई 2026 को अयातुल्लाह अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में भी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के शामिल होने की पूरी संभावना है, जबकि भारत से किसी शीर्ष नेता के जाने की उम्मीद नहीं है।
लंदन यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज (SOAS) के रीडर अविनाश पालीवाल के अनुसार:
वास्तविक क्षमता से अधिक प्रभाव: पाकिस्तान ने पश्चिम एशिया के इस संकट का इस्तेमाल अपनी वैश्विक छवि सुधारने और कूटनीतिक लाभ उठाने के लिए बेहतरीन तरीके से किया है।
सैन्य स्वीकार्यता: पाकिस्तान के फील्ड मार्शल जनरल आसिम मुनीर को जहाँ एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पसंद करते हैं, वहीं ईरान भी उनकी सराहना करता है।
अंडरडॉग का फायदा: पाकिस्तान ने इजरायल के अस्तित्व को न मानते हुए भी वाशिंगटन में अपनी अहमियत कम नहीं होने दी, क्योंकि ईरान, अफगानिस्तान और खाड़ी देशों के मुहाने पर बैठी उसकी भौगोलिक स्थिति अमेरिका के लिए आज भी रणनीतिक मजबूरी है।
दूसरी ओर, भारत इस पूरे विवाद में बेहद संभलकर चल रहा है। पश्चिम एशिया भारत के लिए आर्थिक और मानवीय लिहाज से कितना महत्वपूर्ण है, इसे इन आंकड़ों से समझा जा सकता है:
| क्षेत्र / संसाधन | भारत की कुल निर्भरता (%) |
| कच्चा तेल आयात | ~45% |
| एलएनजी (LNG) आयात | 66% |
| एलपीजी (LPG) आयात | ~90% |
| खाड़ी देशों (GCC) में भारतीय | 90 लाख से अधिक निवासी |
| वार्षिक रेमिटेंस योगदान | ~135 अरब डॉलर का 40% |
इस विशाल आर्थिक हित के बावजूद, डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में भारत की 'मल्टी-अलाइनमेंट' (सबके साथ जुड़ाव) की नीति भारी दबाव में रही है। ट्रंप प्रशासन द्वारा ब्रिक्स (BRICS) देशों को दी जाने वाली चेतावनियों और क्वाड (Quad) की उपेक्षा ने नई दिल्ली की चिंताओं को बढ़ाया है। भारत इस साल के अंत में ब्रिक्स प्लस (जिसमें ईरान भी शामिल है) की अध्यक्षता की तैयारी कर रहा है, जिससे उस पर अपना रुख स्पष्ट करने का वैश्विक दबाव है।
मंगलवार को ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान के बीच फोन पर लंबी बातचीत हुई। इस बातचीत के बाद दोनों देशों द्वारा जारी आधिकारिक बयानों में भारतीय कूटनीति का 'संयम' साफ तौर पर देखा गया।
विदेश नीति की अध्येता लौरान डैगन अमोस ने इस पर विश्लेषण करते हुए कहा:
"भारतीय और ईरानी नेताओं के बीच बातचीत के बाद जारी बयानों को देखें, तो भारतीय पक्ष का संयम साफ़ नज़र आता है। भारत की ओर से जारी बयान बेहद संक्षिप्त और सीधे मुद्दे (होर्मुज़ स्ट्रेट की सुरक्षा) पर केंद्रित था, जिसमें बातचीत के महत्व को जानबूझकर कम करके दिखाने की कोशिश की गई। इसके उलट, ईरानी बयान अधिक विस्तृत था, जिसमें ऐतिहासिक संबंधों को रेखांकित करने के लिए कई सकारात्मक शब्दों का इस्तेमाल किया गया था।"
यह सवाल उठाना कि "पाकिस्तान सफल रहा और भारत चूक गया", अंतरराष्ट्रीय राजनीति को बेहद उथले नजरिए से देखना है। पाकिस्तान और भारत की विदेश नीति के लक्ष्य और उनकी मजबूरियां पूरी तरह अलग हैं। पाकिस्तान एक 'रेंटियर स्टेट' (Rentier State) की तरह काम करता है, जो अपनी भौगोलिक स्थिति और सैन्य ताकत को महाशक्तियों के आगे लीज पर देकर कूटनीतिक और आर्थिक मदद हासिल करता है। उसने अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता करके अपनी गिरती अर्थव्यवस्था को बचाने का दांव खेला है।
इसके विपरीत, भारत एक उभरती हुई महाशक्ति है, जिसकी कूटनीति किसी एक देश के पिछलग्गू बनने की नहीं है। पीएम मोदी का ईरान पर हमले से ठीक पहले इजरायल का दौरा करना और फिर ईरान के राष्ट्रपति से फोन पर बात कर 'होर्मुज़ स्ट्रेट में जहाजों की आज़ादी' की मांग करना यह दिखाता है कि भारत अपने राष्ट्रीय और आर्थिक हितों (ऊर्जा सुरक्षा) को सर्वोपरि रखता है। भारत केवल एक पक्ष (ईरान) के समर्थन में बोलकर इजरायल के साथ अपनी मजबूत रक्षा साझेदारी और अमेरिका के साथ रणनीतिक संबंधों को दांव पर नहीं लगा सकता। हालांकि, विश्लेषक अविनाश पालीवाल की यह बात सही है कि भारत को केवल इजरायल के साथ बंधे रहने के जोखिम से बचना होगा, ताकि ईरान पूरी तरह से चीन-पाकिस्तान धुरी की गोद में न बैठ जाए। भारत का यह कूटनीतिक संयम कमजोरी नहीं, बल्कि एक परिपक्व वैश्विक शक्ति की सोची-समझी रणनीति है, जो बिना किसी युद्ध में उलझे अपने 90 लाख नागरिकों और 135 अरब डॉलर के रेमिटेंस को सुरक्षित रखना जानती है।
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