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ध्रुव राठी के विवादित वीडियो पर दिल्ली हाई कोर्ट सख्त; केंद्र की कमिटी को 15 दिनों में हटाने पर फैसला लेने का निर्देश

by admin@bebak24.com on | 2026-07-03 19:40:02

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ध्रुव राठी के विवादित वीडियो पर दिल्ली हाई कोर्ट सख्त; केंद्र की कमिटी को 15 दिनों में हटाने पर फैसला लेने का निर्देश

नेशनल डेस्क (बेबाक24): देश की जानी-मानी कानूनी मामलों की वेबसाइट 'बार एंड बेंच' के हवाले से एक बड़ी खबर सामने आ रही है। दिल्ली हाई कोर्ट ने शुक्रवार (3 जुलाई 2026) को यूट्यूबर ध्रुव राठी (Dhruv Rathee) के एक बेहद विवादित वीडियो को हटाने की मांग वाली याचिका पर सख्त रुख अपनाया है। हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार की शिकायत अपीलीय कमिटी (GAC) को कड़ा निर्देश देते हुए कहा है कि वह 15 दिनों के भीतर इस वीडियो को सोशल मीडिया से हटाने की मांग पर अपना अंतिम फैसला सुनाए।

यह पूरा मामला ध्रुव राठी के उस वीडियो से जुड़ा है, जिसमें कथित तौर पर हिंदू देवी-देवताओं को लेकर आपत्तिजनक दावे किए गए थे, जिससे करोड़ों श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाएं आहत होने का आरोप है।

1. "आदेश की अवहेलना हुई तो अदालत इसे गंभीरता से लेगी" — जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा

इस मामले की सुनवाई दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की एकल पीठ कर रही थी। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कड़ा रुख अख्तियार करते हुए शिकायत अपीलीय कमिटी को समयसीमा में बांधा।

  • 15 दिनों का अल्टीमेटम: जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने अपने आदेश में कहा कि जीएसी (GAC) इस संवेदनशील मामले पर अगले 15 दिनों के भीतर हर हाल में अपना निर्णय ले और इसकी लिखित जानकारी अदालत को भी सौंपे।

  • अदालत की सख्त चेतावनी: कोर्ट ने साफ लहजे में चेतावनी देते हुए कहा, "अगर इस आदेश की अवहेलना की गई या तय समय में फैसला नहीं लिया गया, तो अदालत इसे बेहद गंभीरता से लेगी।"

2. क्या है ध्रुव राठी का विवादित वीडियो और क्यों मचा है बवाल?

यह कानूनी आदेश वकील अमिता सचदेवा द्वारा दिल्ली हाई कोर्ट में दायर की गई एक रिट याचिका पर आया है। याचिका में ध्रुव राठी के एक विशिष्ट वीडियो की सामग्री पर गंभीर कानूनी और धार्मिक आपत्तियां उठाई गई हैं:

  • वीडियो का शीर्षक और तारीख: याचिका में ध्रुव राठी द्वारा 21 मार्च 2026 को यूट्यूब पर अपलोड किए गए वीडियो 'कैन हिन्दुज ईट बीफ़ : केरला स्टोरी 2 एक्सपोज्ड' (Can Hindus Eat Beef: Kerala Story 2 Exposed) को हटाने की मांग की गई है।

  • धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का आरोप: याचिकाकर्ता अमिता सचदेवा का आरोप है कि ध्रुव राठी ने इस वीडियो में करोड़ों हिंदुओं के आराध्य भगवान श्रीराम, माता सीता और भगवान श्रीकृष्ण के बारे में पूरी तरह से गलत और भ्रामक दावे किए हैं। वीडियो में कथित तौर पर कहा गया था कि ये पूजनीय पात्र मांस और शराब का सेवन करते थे।

  • हिंदू आस्था का अपमान: याचिका में कहा गया है कि इस तरह के संवेदनशील और बिना पुख्ता ऐतिहासिक व धार्मिक तथ्यों के किए गए दावों से सनातन धर्म और हिंदू आस्था का घोर अपमान हुआ है, जिसने देश भर के श्रद्धालुओं की भावनाओं को गहरी ठेस पहुंचाई है।

3. जानिए क्या होती है शिकायत अपीलीय कमिटी (GAC)?

अदालत ने जिस शिकायत अपीलीय कमिटी (Information Technology Grievance Appellate Committee - GAC) को निर्देश दिया है, वह केंद्र सरकार द्वारा सूचना प्रौद्योगिकी (IT) नियमों के तहत गठित एक अर्ध-न्यायिक निकाय (Statutory Body) है।

  • काम क्या है?: यह कमिटी विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स (जैसे यूट्यूब, फेसबुक, एक्स) और अन्य ऑनलाइन इंटरमीडियरीज के कंटेंट शिकायत अधिकारियों द्वारा लिए गए फैसलों या कार्रवाई न किए जाने के खिलाफ आम यूजर्स की अपीलों की सुनवाई करती है। इसके पास विवादित कंटेंट या अकाउंट्स को ब्लॉक करने या हटाने के निर्देश देने की शक्तियां होती हैं।

बेबाक24 टेक

अभिव्यक्ति की आजादी (Freedom of Speech) और किसी की धार्मिक आस्था को जानबूझकर ठेस पहुंचाने के बीच एक बेहद बारीक रेखा होती है, जिसे डिजिटल स्पेस में व्यूज और टीआरपी की होड़ में अक्सर लांघ दिया जाता है। ध्रुव राठी का यह वीडियो (21 मार्च 2026) जिस तरह के संवेदनशील विषय पर केंद्रित था, उसमें बेहद परिपक्वता और धार्मिक ग्रंथों के अकाट्य संदर्भों की आवश्यकता थी। करोड़ों लोगों की आस्था के केंद्र भगवान राम, कृष्ण और माता सीता पर मांस-मदिरा के सेवन का दावा करना निश्चित रूप से समाज में ध्रुवीकरण और आक्रोश को भड़काने वाला कृत्य है।

'बेबाक24' दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के इस त्वरित रुख का स्वागत करता है। इंटरनेट के इस दौर में जब कोई विवादित वीडियो वायरल होता है, तो प्रशासनिक और कानूनी कमिटियां महीनों तक फाइलें दबाए बैठी रहती हैं, जिससे तब तक समाज में तनाव फैल चुका होता है। हाई कोर्ट द्वारा केंद्र की जीएसी (GAC) को 15 दिनों की 'डेडलाइन' देना यह दिखाता है कि न्यायपालिका अब सोशल मीडिया पर फैलाए जा रहे भड़काऊ कंटेंट पर लगाम लगाने के मूड में है। यह फैसला अन्य कंटेंट क्रिएटर्स के लिए भी एक बेबाक कड़ा संदेश है कि 'फैक्ट-चेकिंग' या 'एक्सपोज' करने के नाम पर बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक समाज की गहरी आस्थाओं के साथ खिलवाड़ करने पर अदालतें अब मूकदर्शक नहीं बनी रहेंगी।



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