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जेल या जहन्नुम की हुंकार... पर काशी की बेटी प्रिया राय का इंसाफ कहां अटका है?

by on | 2026-09-09 22:41:05

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जेल या जहन्नुम की हुंकार... पर काशी की बेटी प्रिया राय का इंसाफ कहां अटका है?

वाराणसी: बाबतपुर-पिंडरा के आशा एजुकेशन ग्रुप परिसर में जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 'कामकाजी महिला सम्मान समारोह' के मंच से हुंकार भरी कि "बेटियों की सुरक्षा से खिलवाड़ करने वालों की जगह सिर्फ जेल होगी या जहन्नुम", तो लगा कि कानून का इकबाल बुलंद हो गया। लेकिन तालियों की इस गड़गड़ाहट के पीछे काशी की बेटी प्रिया राय की वह दर्दनाक चीख आज भी दबी पड़ी है, जो सरकारी दावों की कलई खोलने के लिए काफी है।

​मंच से दावों की फेहरिस्त गिनाना आसान है, लेकिन धरातल पर सिस्टम का सच यह है कि माफिया सिंडिकेट और पूर्व सांसद अतुल राय के गुर्गों के उत्पीड़न के आगे एक बेबस बेटी को इंसाफ की खातिर देश की सर्वोच्च अदालत की दहलीज चुननी पड़ी। न्याय की उम्मीद जब टूट गई, तो उसने सुप्रीम कोर्ट के सामने खुद को आग के हवाले कर दिया। फेसबुक लाइव पर दर्ज हुई वह दास्तान आज भी इस पुलिसिया तंत्र और रसूखदारों के गठजोड़ को नंगा करती है।


सिस्टम को कटघरे में खड़े करते 'बेबाक' सवाल:

  • सुप्रीम कोर्ट ही क्यों? जब सूबे में 'जीरो टॉलरेंस' का ढिंढोरा पीटा जा रहा था, तब काशी की उस बेटी को अपनी जान देने के लिए दिल्ली का रुख क्यों करना पड़ा? क्या स्थानीय पुलिस और प्रशासन का इक़बाल इतना मर चुका था कि उसका भरोसा पूरी तरह टूट गया?
  • लाचार मां का कराहता सच: पीड़िता की मां के वे शब्द आज भी इस व्यवस्था पर तमाचा हैं—"मेरी बेटी का केस सरकार लड़े, मेरी औकात इन बाहुबलियों से लड़ने की नहीं है।" यह बयान चीख-चीखकर बताता है कि खाकी और खादी का गठजोड़ गरीबों के लिए कितना बेदर्द हो चुका है।
  • फर्जी मुकदमों का खेल किसके इशारे पर? बलिया के नरही थाने में राजनीतिक रसूख के दबाव में मुख्य गवाह पर फर्जी मुकदमे ठोके गए। जिस सोशल मीडिया पर पीड़िता का चरित्र हनन किया गया, उन चेहरों को बेनकाब करने में जांच एजेंसियां अब तक पंगु क्यों बनी रहीं?
  • मिशन शक्ति का ढोल या जमीनी झोल? मंचों से 45 हजार महिला सिपाहियों की भर्ती और पुलिस में 20% आरक्षण के आंकड़े पेश करना अलग बात है, लेकिन हकीकत यह है कि आज भी उस पीड़िता और गवाह का परिवार न्याय के लिए दर-दर भटकने को मजबूर है।

​मंचों पर दी जाने वाली चेतावनियां और चमचमाती लाइटों के बीच "जेल या जहन्नुम" के जुमले सुनने में जरूर अच्छे लगते हैं, लेकिन असल 'रामराज्य' तब माना जाएगा जब कानून का डर किसी बाहुबली या माफिया सिंडिकेट पर दिखे। जब तक किसी बेबस मां को अपनी मरी हुई बेटी के इंसाफ के लिए खुद को लाचार न कहना पड़े, तब तक ऐसे हर दावे खोखले ही नजर आएंगे।



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