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मोहम्मदाबाद में हांफते रहे अतुल, नहीं भरीं कुर्सियां; 'एक पंथ दो काज' की फिराक में माफिया मुख्तार का गुर्गा!

by on | 2026-09-09 12:13:02

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मोहम्मदाबाद में हांफते रहे अतुल, नहीं भरीं कुर्सियां; 'एक पंथ दो काज' की फिराक में माफिया मुख्तार का गुर्गा!


गाजीपुर/मोहम्मदाबाद।

​मोहम्मदाबाद के कुंडेसर में आयोजित तथाकथित ‘संवाद कार्यक्रम’ में पूर्व सांसद अतुल राय का दम फूलता साफ नजर आया। दावों और वादों का भारी-भरकम ढिंढोरा पीटने के बावजूद मंच के सामने रखी कुर्सियां खाली ही पड़ी रहीं। माफिया मुख्तार अंसारी के इस खासमखास चेले की जनसभा में जनता की बेरुखी ने साफ कर दिया कि अब इलाके में खौफ और सियासत का पुराना कॉकटेल चलने वाला नहीं है।

'एक पंथ दो काज' की कवायद में जुटा माफिया का गुर्गा

​स्थानीय हलकों में चर्चाओं का बाजार गर्म है कि अतुल राय का यह दौरा महज एक 'संवाद' नहीं, बल्कि 'एक पंथ दो काज' साधने की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। एक तरफ स्वर्गीय मुख्तार अंसारी के ढहते काले साम्राज्य को सहारा देकर अतुल राय गैंग के पास छिपे खजाने को बचाने की छटपटाहट है, तो दूसरी तरफ 'फाटक' के विजय रथ को रफ्तार देने की नीयत।

​कुछ घटनाक्रम ऐसे हैं जो इस चर्चा को बल देते हैं—जेल से अतुल राय ने शासन को पत्र लिखकर दावा किया था कि उन्हें मुख्तार से जान का खतरा है, वहीं मुख्तार अंसारी की मौत के बाद उनके बेटे उमर अंसारी के शादी समारोह में अतुल राय को मुंह छिपाकर खड़ा देखा गया। इसकी वीडियो और फोटो वायरल हुईं, जिन्हें बेबाक 24 ने प्रमुखता से प्रकाशित किया था।

भूमिहार समाज निशाने पर, स्वर्गीय कृष्णानंद राय के वजूद को मिटाने की साजिश?

​सूत्रों की मानें तो इस पूरी कवायद के केंद्र में भूमिहार समाज को खासतौर पर निशाना बनाना है। मकसद साफ है—स्वर्गीय कृष्णानंद राय के राजनीतिक और सामाजिक वजूद को चुनौती देकर फाटक की खोती राजनीतिक जमींदारी को फिर से जिंदा किया जा सके।

बसनिया कांड से लेकर SC के सामने आत्मदाह तक: मुकदमों और बगावत का काला अतीत

​विश्वस्त सूत्रों का दावा है कि बसनिया कांड के गवाहों को तोड़ने में खुलेआम अतुल राय की ही मुख्य भूमिका थी; बीरपुर के रमेश राय को सबसे बड़ा इनाम इसीलिए मिला था। यही नहीं, नारायणपुर की पीड़ित युवती प्रिया राय और सियाड़ी के गवाह सत्यम प्रकाश राय पर प्रताड़ना का ऐसा चक्रव्यूह रचा गया कि दोनों को तंग आकर देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) के दरवाजे पर खुद को आग के हवाले करना पड़ा। दोनों की दर्दनाक मौत का साया आज भी अतुल राय के दामन से लिपटा हुआ है।

कैंसर के नाम पर जमानत, पर गांव-गांव में ताल!

​बताते चलें कि माफिया मुख्तार गैंग की बेनामी संपत्तियों की जांच में अतुल राय की भी कई संपत्तियां कानून के शिकंजे में आकर फ्रीज हो चुकी हैं। गंभीर बीमारी का हवाला देकर, कैंसर के इलाज के नाम पर अदालत से सशर्त जमानत हासिल करने वाले पूर्व सांसद अब अदालती राहत का इस्तेमाल सियासी पैंतरेबाजी में कर रहे हैं।

'दादा-परदादा थे जमींदार, लेकिन हैं बेचिरागी !'

​मंच से खुद को बेगुनाह साबित करने की होड़ में अतुल राय ने अपनी सेखी बघारी और साथ ही अपनी गरीबी का रोना भी रोया। रोते हुए उन्होंने दावा किया कि उनके दादा-परदादा बड़े जमींदार थे, लेकिन आज उनके पास पैतृक जमीन नहीं बची है। हालांकि, जनता इन घड़ियाली आंसुओं और दावों की असलियत बखूबी समझती है।

​खाली कुर्सियों के बीच हांफते भाषण ने यह साफ कर दिया है कि मोहम्मदाबाद की आवाम अब सच और झूठ का फर्क समझ चुकी है।

​क्या इलाज की शर्तों पर बाहर आया माफिया का यह गुर्गा अपने आका की सियासी जमीन बचा पाएगा या कानून और जनता की अदालत में इसका हिसाब पूरा होगा?
बेबाक 24 की पैनी नजर हर अपडेट पर बनी रहेगी।



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