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'बीजेपी से सहानुभूति की उम्मीद न रखें'— सोनम वांगचुक के अनशन पर अखिलेश यादव का बड़ा बयान

by on | 2026-07-16 20:52:55

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'बीजेपी से सहानुभूति की उम्मीद न रखें'— सोनम वांगचुक के अनशन पर अखिलेश यादव का बड़ा बयान

नई दिल्ली/लखनऊ (बेबाक24): लद्दाख के अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के अनिश्चितकालीन अनशन का आज (16 जुलाई 2026) 19वां दिन है। जंतर-मंतर पर वांगचुक की गिरती सेहत और उनके हालिया वीडियो संदेश के बीच अब विपक्षी खेमे के दिग्गज नेता भी इस आंदोलन के समर्थन में खुलकर उतर आए हैं।

समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बुधवार देर रात सोनम वांगचुक को अपना अनशन समाप्त करने की भावुक अपील की है। इसके साथ ही उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार पर तीखा राजनीतिक हमला बोला है। 'बेबाक24' की यह विशेष राजनीतिक रिपोर्ट:

'अपने बहुमूल्य जीवन को दांव पर न लगाएं'— अखिलेश यादव

अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर एक विस्तृत पोस्ट साझा करते हुए सोनम वांगचुक और देश के अन्य आंदोलनकारियों को गंभीर सलाह दी:

  • सहानुभूति की कमी का आरोप: अखिलेश यादव ने लिखा, "सोनम वांगचुक जी और केन-बेतवा के आदिवासी-किसान आंदोलनकारियों को भाजपा से किसी भी प्रकार की सहानुभूति और सहृदयता की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। इसीलिए आप अनशन के माध्यम से अपने बहुमूल्य जीवन को दांव पर न लगाएं।"

  • सरकार बदलने का आह्वान: सपा सुप्रीमो ने आंदोलनकारियों से अपने संकल्प को राजनीतिक बदलाव से जोड़ने की अपील की। उन्होंने कहा, "आप सबके अदम्य संघर्ष और संकल्प की शक्ति जब भाजपा को हटाने के, हम सबके आंदोलन से जुड़ेगी, तो भाजपा हारेगी और हमेशा के लिए हट-मिट जाएगी।"

पर्यावरणविद् प्रो. जीडी अग्रवाल (स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद) का दिया हवाला

अपने संदेश में अखिलेश यादव ने गंगा नदी के संरक्षण के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले प्रख्यात पर्यावरणविद् प्रो. जीडी अग्रवाल (स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद) के ऐतिहासिक अनशन का जिक्र करते हुए सरकार की संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े किए:

  • जीडी अग्रवाल का उदाहरण: यादव ने याद दिलाया कि कैसे मां गंगा के उद्धार के लिए अनशन पर बैठे जीडी अग्रवाल ने निरंतर अपनी मांगें वर्तमान सरकार के सामने रखी थीं, लेकिन उनकी मांगों पर कोई सुनवाई नहीं हुई और अंततः उन्हें अपना जीवन खोना पड़ा था। अखिलेश ने आगाह किया कि लद्दाख के आंदोलनकारियों को भी इस कड़वे इतिहास को ध्यान में रखना चाहिए।

केन-बेतवा लिंक परियोजना: बुंदेलखंड में भी भड़का आंदोलन

अखिलेश यादव ने अपने बयान में केवल लद्दाख ही नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के सीमावर्ती क्षेत्र बुंदेलखंड में चल रहे एक और बड़े आंदोलन का मुद्दा भी उठाया:

  • आदिवासी और किसानों का अनशन: बुंदेलखंड में केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना (Ken-Betwa Link Project) के कारण विस्थापित हो रहे पन्ना और छतरपुर के आदिवासी और किसान बड़े पैमाने पर आंदोलन और अनशन कर रहे हैं।

  • विस्थापन का विरोध: इन क्षेत्रों के ग्रामीणों का आरोप है कि परियोजना के कारण उनके जल, जंगल और जमीन छीने जा रहे हैं और सरकार उचित पुनर्वास और पर्यावरण सुरक्षा सुनिश्चित करने में विफल रही है।

सोनम वांगचुक आंदोलन और राजनीतिक समीकरण (फैक्ट फाइल)

आंदोलन का केंद्रमुख्य मांगेंवर्तमान स्थिति (16 जुलाई 2026)प्रमुख राजनीतिक समर्थन
लद्दाख आंदोलन (सोनम वांगचुक)छठी अनुसूची (Sixth Schedule), राज्य का दर्जा, पर्यावरण संरक्षण।जंतर-मंतर पर अनशन का 19वां दिन; 20 जुलाई को 'संसद चलो' की अपील।अखिलेश यादव (सपा), राहुल गांधी (कांग्रेस) व अन्य विपक्षी दल।
बुंदेलखंड आंदोलन (केन-बेतवा)विस्थापित आदिवासियों और किसानों का उचित पुनर्वास, पर्यावरण क्षति रोकना।पन्ना-छतरपुर में अनशन व विरोध प्रदर्शन तेज।स्थानीय किसान संगठन और समाजवादी पार्टी।

बेबाक24 टेक

20 जुलाई 2026 से शुरू हो रहे संसद के मानसून सत्र से ठीक पहले अखिलेश यादव का यह बयान बेहद नपा-तुला और आक्रामक राजनीतिक कदम है। सोनम वांगचुक का आंदोलन अब केवल लद्दाख तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष के लिए सरकार को घेरने का एक बड़ा हथियार बन चुका है। अखिलेश यादव का जीडी अग्रवाल के अनशन का उदाहरण देना यह रेखांकित करता है कि विपक्ष इस मुद्दे को 'जनता बनाम एक असंवेदनशील व्यवस्था' के रूप में पेश करना चाहता है।

बेबाक24 का मानना है कि लद्दाख के साथ-साथ केन-बेतवा परियोजना के विस्थापितों का मुद्दा उठाकर अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के ग्रामीण व आदिवासी वोट बैंक को भी साधने की कोशिश की है। 20 जुलाई को जहां एक तरफ सुप्रिया सुले परिसीमन पर सरकार को घेरने की रणनीति बना रही हैं, वहीं सड़कों पर सोनम वांगचुक के 'संसद चलो' अभियान और विपक्ष के इस आक्रामक रुख से मानसून सत्र के शुरुआती दिन बेहद हंगामेदार रहने वाले हैं। अब देखना यह होगा कि क्या सरकार इस चौतरफा दबाव के आगे झुककर आंदोलनकारियों से सीधे संवाद का रास्ता चुनती है या नहीं।र



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