by on | 2026-07-16 21:18:36
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कोलकाता (बेबाक24): पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सुप्रीमो ममता बनर्जी ने पार्टी के भीतर मचे आंतरिक घमासान, सांसदों की टूट और लगातार हो रहे इस्तीफों पर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए बेहद आक्रामक और दोटूक रुख अख्तियार कर लिया है।
अपनी नवनिर्वाचित राज्यसभा सांसद कोयल मल्लिक के अचानक इस्तीफे और कद्दावर नेता मदन मित्रा की बगावत के बाद, ममता बनर्जी ने गुरुवार (16 जुलाई 2026) को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर एक वीडियो संदेश जारी किया। उन्होंने पार्टी छोड़ने की योजना बना रहे नेताओं को एक तरह से खुली चुनौती और अल्टीमेटम दे दिया है। 'बेबाक24' के राजनीतिक ब्यूरो की यह विशेष रिपोर्ट:
ममता बनर्जी ने आगामी 21 जुलाई को होने वाली टीएमसी की ऐतिहासिक 'शहीद दिवस' (Martyrs' Day) रैली से ठीक पहले बागी सुर अख्तियार करने वाले नेताओं को दोटूक कहा:
खुली छूट: ममता बनर्जी ने वीडियो में कहा, "जो लोग किसी भी तरह के राजनीतिक या व्यक्तिगत दबाव में हैं, वे आगामी 21 जुलाई यानी शहीद दिवस से पहले जो भी फैसला लेना चाहते हैं, पूरी स्वतंत्रता के साथ ले लें। वे जहां जाना चाहते हैं, चले जाएं। हमें कोई आपत्ति नहीं है।"
संवैधानिक अधिकार: उन्होंने आगे कहा, "हमारा पवित्र संविधान हर व्यक्ति को अपनी पसंद का राजनीतिक फैसला लेने का पूरा अधिकार देता है। इसलिए किसी को छिपकर काम करने की जरूरत नहीं है।"
राज्यसभा सांसद और मशहूर अभिनेत्री कोयल मल्लिक के इस्तीफे पर पहली बार बोलते हुए टीएमसी प्रमुख ने गरिमा बनाए रखने की कोशिश की, लेकिन एक बड़ा कूटनीतिक इशारा भी कर दिया:
पहले ही आ गया था ईमेल: ममता बनर्जी ने खुलासा किया, "मैं कोयल मल्लिक का सम्मान करती हूं। राज्यसभा की सदस्यता से औपचारिक इस्तीफा सौंपने से पहले ही उन्होंने ईमेल के जरिए पार्टी नेतृत्व को अपने इस फैसले की जानकारी दे दी थी।"
बीजेपी से मुलाकात पर तंज: उन्होंने आगे कहा कि आज (गुरुवार को) कोयल मल्लिक ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के एक शीर्ष नेता से भी मुलाकात की है, जो उनके अगले राजनीतिक कदम को साफ करता है।
टीएमसी सुप्रीमो का यह सख्त बयान ऐसे समय में आया है जब महज 24 घंटे पहले बुधवार को उनके सबसे करीबी और भरोसेमंद सिपहसालारों में से एक मदन मित्रा ने पार्टी को अलविदा कह दिया। मदन मित्रा आधिकारिक रूप से टीएमसी के उस बागी गुट में शामिल हो गए हैं, जिसका नेतृत्व लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष ऋतब्रत बनर्जी कर रहे हैं और जो केंद्र की एनडीए (NDA) सरकार के साथ रणनीतिक तालमेल बिठा रहा है। 20 लोकसभा सांसदों के बाद अब राज्यसभा और विधानसभा स्तर पर हो रही इस टूट ने टीएमसी नेतृत्व को पूरी तरह सतर्क कर दिया है।
ममता बनर्जी ने इस सियासी उथल-पुथल के बीच प्रशासनिक अधिकारियों से भी 21 जुलाई की रैली के दौरान पूरी तरह निष्पक्ष और मुस्तैद रहने की अपील की है। टीएमसी के लिए यह दिन बेहद भावुक और ऐतिहासिक है:
क्यों मनाई जाती है यह रैली? यह रैली हर साल 21 जुलाई को 1993 की एक ऐतिहासिक घटना की याद में आयोजित की जाती है। उस समय पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा (Left Front) की सरकार थी।
13 कार्यकर्ताओं की शहादत: ममता बनर्जी के नेतृत्व में युवा कांग्रेस के एक प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने अंधाधुंध फायरिंग की थी, जिसमें 13 युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं की मौत हो गई थी। ममता बनर्जी तब से हर साल इन शहीदों की याद में बड़ी रैली करती हैं और इसी मंच से पार्टी की भविष्य की राजनीतिक दिशा तय होती है।
| रणनीतिक पहलू | टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी का रुख (16 जुलाई 2026) |
| मुख्य बयान | दबाव में काम कर रहे नेता 21 जुलाई से पहले पार्टी छोड़ने का फैसला ले लें। |
| कोयल मल्लिक पर रुख | फैसले का सम्मान, इस्तीफे से पहले ईमेल के जरिए दी थी सूचना; आज बीजेपी नेता से मिलीं। |
| मदन मित्रा का झटका | करीबी नेता मदन मित्रा का ऋतब्रत बनर्जी के बागी गुट में शामिल होना बड़ी चुनौती। |
| आगामी डेडलाइन | 21 जुलाई को होने वाली 'शहीद दिवस' रैली से पहले कुनबा समेटने की कोशिश। |
ममता बनर्जी का यह बयान उनके पारंपरिक जुझारू और आक्रामक तेवर को दर्शाता है। जब रक्षात्मक होने के बजाय कोई नेता यह कहता है कि 'जिसको जाना है जाए', तो वह अपने बचे हुए कार्यकर्ताओं को यह संदेश देना चाहता है कि पार्टी किसी एक या दो चेहरों के भरोसे नहीं बल्कि कैडर के दम पर चलती है। 21 जुलाई की शहीद दिवस रैली से ठीक पहले यह अल्टीमेटम देकर ममता बनर्जी ने बागी नेताओं की 'बार्गेनिंग पावर' (मोलतोल करने की क्षमता) को खत्म करने की कोशिश की है।
बेबाक24 का मानना है कि जयराम रमेश भले ही संसद के मानसून सत्र से पहले बीजेपी पर 'दागदार दो-तिहाई बहुमत' के लिए तोड़-फोड़ करने का आरोप लगा रहे हों, लेकिन ममता बनर्जी का यह बयान दिखाता है कि बंगाल के भीतर जमीन खिसक चुकी है। कोयल मल्लिक का ईमेल भेजना और फिर बीजेपी नेता से मिलना तथा मदन मित्रा का एनडीए समर्थक बागी गुट में जाना यह साफ करता है कि 20 जुलाई के संसद सत्र से पहले टीएमसी के भीतर एक बहुत बड़ा वैचारिक विभाजन हो चुका है। अब देखना यह होगा कि 21 जुलाई की इस ऐतिहासिक रैली में ममता बनर्जी अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन को वापस पाने के लिए कौन सा नया नैरेटिव (विमर्श) पेश करती हैं।
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