by on | 2026-07-14 22:03:33
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कोलकाता (बेबाक24): पश्चिम बंगाल की सियासत से इस वक्त की सबसे बड़ी खबर आ रही है। राज्य की नवनिर्वाचित शुभेंदु अधिकारी सरकार ने चुनाव पूर्व किए गए अपने वादे पर अमल करते हुए एक बेहद बड़ा प्रशासनिक और कानूनी कदम उठाया है। सरकार ने पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के 2011 से लेकर मई 2026 तक के कार्यकाल में हुए सभी कथित घोटालों और भ्रष्टाचार के आरोपों की व्यापक जांच के लिए एक उच्च स्तरीय जांच आयोग (Inquiry Commission) का गठन कर दिया है।
इस आयोग की कमान कलकत्ता हाई कोर्ट के एक कड़े और सेवानिवृत्त जज को सौंपी गई है, जिससे तृणमूल कांग्रेस (TMC) के खेमे में हड़कंप मचना तय है।
राज्य सचिवालय (नबन्ना) की ओर से 10 जुलाई को जारी एक आधिकारिक विज्ञप्ति के अनुसार, इस आयोग का ढांचा बेहद मजबूत रखा गया है:
आयोग के अध्यक्ष: कलकत्ता हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त जज जस्टिस विश्वजीत बसु इस जांच आयोग के अध्यक्ष होंगे।
जांच का दायरा: यह आयोग साल 2011 (जब ममता बनर्जी पहली बार सत्ता में आई थीं) से लेकर इस साल मई 2026 (जब तक टीएमसी सत्ता में रही) तक के पूरे कार्यकाल की फाइलों को खंगालेगा।
प्रभावित विभाग: आयोग मुख्य रूप से शिक्षा, खाद्य और आपूर्ति, राहत और आपदा प्रबंधन, नगर पालिका और पंचायत, आवास, तथा मत्स्य पालन विभागों के कामकाज में हुए 'भ्रष्टाचार के आरोपों' की गहराई से जांच करेगा।
गृह मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि शुभेंदु सरकार द्वारा गठित यह आयोग केवल वित्तीय हेरफेर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका दायरा बेहद विस्तृत है:
घोटालों की सूची: आयोग रिश्वतखोरी, अंफान तूफान के राहत कोष में हुआ कथित भ्रष्टाचार, 100 दिनों की रोजगार योजना (मनरेगा) में वित्तीय गड़बड़ियां, मिड-डे मील योजना में धांधली और सरकारी नौकरियों में नियुक्तियों (जैसे बहुचर्चित शिक्षक भर्ती घोटाला) में हुए भ्रष्टाचार की जांच करेगा।
सत्ता का दुरुपयोग और झूठे केस: इसके अलावा, टीएमसी शासन के दौरान विपक्षी नेताओं और नागरिकों की कथित गैरकानूनी गिरफ्तारियों, राजनीतिक प्रतिशोध के तहत दर्ज किए गए झूठे मामलों और अवैध निर्माण में सरकारी अधिकारियों व नेताओं की मिलीभगत की भी जांच की जाएगी।
इस जांच आयोग को जमीन पर प्रभावी बनाने के लिए भारी-भरकम प्रशासनिक अमला दिया गया है:
सदस्य सचिव: सहायक पुलिस महानिदेशक (ADG) स्तर के वरिष्ठ आईपीएस (IPS) अधिकारी के के जयरामन को आयोग का सदस्य सचिव नियुक्त किया गया है।
अन्य सदस्य: इनके अलावा आयोग की तकनीकी मदद के लिए भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) और राज्य प्रशासनिक सेवा (WBCS) के एक-एक वरिष्ठ अधिकारी को भी शामिल किया गया है।
कानूनी अधिकार: आयोग किसी भी मामले की जांच के दौरान किसी भी रसूखदार व्यक्ति या अधिकारी को समन जारी कर बयान दर्ज कराने के लिए बुला सकता है। साथ ही, प्राथमिक जांच में दोषी पाए जाने पर पुलिस को तुरंत एफआईआर (FIR) दर्ज करने की सिफारिश भी कर सकता है। हालांकि, जो मामले पहले से ही केंद्रीय जांच एजेंसियों (जैसे CBI या ED) के पास हैं, उनमें यह आयोग दखल नहीं देगा।
| मुख्य बिंदु | जांच आयोग के अधिकार और फैक्ट्स |
| आयोग के प्रमुख | कलकत्ता हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त जज जस्टिस विश्वजीत बसु। |
| जांच की समयावधि | साल 2011 से मई 2026 तक (ममता बनर्जी का संपूर्ण कार्यकाल)। |
| मुख्य जांच विषय | शिक्षक भर्ती, अंफान राहत घोटाला, मनरेगा गड़बड़ी, मिड-डे मील और अवैध गिरफ्तारियां। |
| आयोग की सीमा | केंद्रीय एजेंसियों (CBI/ED) के अधीन चल रहे मामलों की जांच यह आयोग नहीं करेगा। |
| सरकार की नीति | मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी का संकल्प— भ्रष्टाचार पर 'जीरो टॉलरेंस' (Zero Tolerance)। |
पश्चिम बंगाल की राजनीति में सत्ता परिवर्तन के बाद से ही इस बात के कयास लगाए जा रहे थे कि शुभेंदु अधिकारी अपनी धुर राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी ममता बनर्जी के पिछले 15 साल के शासनकाल के फैसलों पर कानूनी हंटर चलाएंगे। इस जांच आयोग का गठन यह साफ करता है कि नई सरकार टीएमसी को पूरी तरह से बैकफुट पर धकेलने के मूड में है। अंफान राहत और राशन घोटाले जैसे मुद्दे सीधे जनता से जुड़े हैं, और यदि सेवानिवृत्त जज की अगुवाई वाला यह आयोग इनमें ठोस सबूत निकाल पाता है, तो टीएमसी के कई बड़े नेताओं की मुश्किलें आने वाले दिनों में और बढ़ सकती हैं।
बेबाक24 का मानना है कि राजनीतिक बदलाव के बाद ऐसी जांच एजेंसियां और आयोग बनाना भारतीय राजनीति का एक पुराना चलन रहा है, लेकिन शुभेंदु सरकार के लिए असली चुनौती यह होगी कि यह आयोग महज 'राजनीतिक प्रतिशोध' का साधन बनकर न रह जाए, बल्कि दूध का दूध और पानी का पानी करे। चूंकि आयोग समय-समय पर सरकार को रिपोर्ट सौंपेगा, इसलिए आगामी विधानसभा सत्रों में इन रिपोर्ट्स को लेकर सदन के भीतर और बाहर भारी हंगामा देखने को मिल सकता है।
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