by on | 2026-07-05 01:57:10
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वाराणसी ( बेबाक 24)। कहते हैं काशी मोक्ष की नगरी है, लेकिन इसी काशी के हरिश्चंद्र घाट ने रिश्तों के उस स्याह चेहरे को भी देखा है जिसे सुनकर आपकी रूह कांप जाएगी। खून के रिश्ते जब सफेद हो जाएं और बुढ़ापे की लाठी बनने वाले ही जब पीठ में खंजर घोप दें, तो इंसानियत को आगे आना ही पड़ता है। एक ऐसी ही दिल दहला देने वाली और अंत में आंखें नम कर देने वाली घटना वाराणसी के हरिश्चंद्र घाट से सामने आई है, जिसने समाज के मुंह पर करारा तमाचा जड़ा है।
कलयुगी बेटों की बेरहमी: घाट पर बिलखता छोड़ भागे
मामला हैदराबाद के रहने वाले बुजुर्ग श्री किशन रेड्डी का है। जिन बेटों को पाल-पोसकर उन्होंने बड़ा किया, वही दो कलयुगी बेटे उन्हें वाराणसी लाकर हरिश्चंद्र घाट पर लावारिस हालत में छोड़ कर रफूचक्कर हो गए। पिता आख़िरी सांस तक घाट के किनारे पथराई आंखों से बेटों के लौटने की राह तकते रहे, लेकिन वो पत्थरदिल दोबारा मुड़कर नहीं आए। लोगों ने उन्हें वृद्धाश्रम जाने की सलाह भी दी, लेकिन पिता की ज़िद थी—“बेटे भले छोड़ गए, पर दम इसी काशी की मिट्टी में तोडूंगा।” और आखिरकार, बेटों के इंतजार में तड़पते हुए उन्होंने हरिश्चंद्र घाट पर ही दम तोड़ दिया।
जब अपनों ने फेरा मुंह, तब न्यास बना ‘श्रवण कुमार’
निधन के बाद भी जब कोई सगा-संबंधी लाश को हाथ लगाने नहीं आया, तब कलयुग के इस दौर में ‘अमन कबीर सेवा न्यास’ मसीहा बनकर सामने आया। संस्था के सदस्यों ने न सिर्फ इस लावारिस शव को सम्मान दिया, बल्कि एक बेटे का फर्ज निभाते हुए पूरे हिंदू रीति-रिवाज और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ श्री किशन रेड्डी का अंतिम संस्कार कराया। संस्था के सदस्य ने खुद मुखाग्नि देकर यह साबित कर दिया कि रिश्ते सिर्फ खून के मोहताज नहीं होते, संवेदना और सेवा ही दुनिया का सबसे बड़ा धर्म है।
बेबाक राय: आखिर कहां जा रहा है हमारा समाज?
बेबाक 24 इस मंच से समाज से यह कड़ा सवाल पूछता है—आखिर हम कैसे समाज का निर्माण कर रहे हैं? जो मां-बाप अपनी उंगली पकड़कर चलना सिखाते हैं, उन्हें बुढ़ापे में इस तरह लावारिस छोड़ देना किस सभ्यता का हिस्सा है?
धन्य है काशी की धरती और सैल्यूट है अमन कबीर सेवा न्यास की इस सोच को, जिसने न सिर्फ एक बुजुर्ग को सनातनी परंपरा से मोक्ष दिलाया, बल्कि ढहते हुए सामाजिक मूल्यों के बीच इंसानियत का परचम बुलंद रखा। यह घटना एक सीख है कि जब अपने मुंह मोड़ लेते हैं, तब मानवता ही सबसे बड़ा सहारा बनती है।
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