by admin@bebak24.com on | 2026-07-04 16:29:17
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इंटरनेशनल डेस्क (बेबाक24): पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर (PoK) की सियासत से इस वक्त की सबसे बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ (PTI) ने आगामी 27 जुलाई 2026 को होने वाले विधानसभा चुनावों का 'सशर्त बहिष्कार' (Conditional Boycott) करने का एक बड़ा और रणनीतिक एलान कर दिया है।
पीटीआई ने यह कदम PoK में हफ़्तों से उग्र प्रदर्शन कर रहे स्थानीय संगठन 'जम्मू-कश्मीर संयुक्त लोक कार्रवाई समिति' (JAAC) की मांगों का समर्थन और उनके साथ एकजुटता दिखाने के लिए उठाया है। पीटीआई के इस फैसले के बाद पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष बैरिस्टर गौहर ख़ान ने तुरंत प्रभाव से उम्मीदवारों को टिकट जारी करने की प्रक्रिया पर रोक लगा दी है।
कश्मीर के राष्ट्रपति और पीटीआई के वरिष्ठ नेता व पूर्व प्रधानमंत्री सरदार अब्दुल कय्यूम नियाजी ने पार्टी के इस कड़े फैसले की वजह बताते हुए शहबाज़ शरीफ़ सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा:
सरदार अब्दुल कय्यूम नियाजी: "हम इस चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बनेंगे और न ही कोई चुनाव लड़ेंगे। जब तक संयुक्त कार्रवाई समिति की वैध और संवैधानिक मांगों को पूरा नहीं किया जाता, पीटीआई अपनी जनता के साथ खड़ी रहेगी। इस समय हमारा प्यारा कश्मीर जल रहा है। रावलकोट और कई अन्य ज़िलों सहित हज़ारों नागरिक अपनी जायज मांगों को लेकर धरने पर बैठे हैं, लेकिन सरकार ने बातचीत के बजाय अंधाधुंध बल प्रयोग का रास्ता चुना है, जिसकी वजह से कुछ पुलिसकर्मियों सहित कई अनमोल जानें गई हैं।"
PoK के रावलकोट शहर और उसके आसपास के इलाकों में 'संयुक्त कार्रवाई समिति' के बैनर तले आम नागरिक और स्थानीय नेता हफ़्तों से धरने पर बैठे हैं। हाल ही में सुरक्षा एजेंसियों ने इस आंदोलन के मुख्य नेता शौकत नवाज़ मीर को गिरफ्तार कर लिया था, जिसके बाद प्रदर्शन और ज्यादा हिंसक हो गए।
शरणार्थी सीटों का खात्मा: प्रदर्शनकारियों की सबसे बड़ी मांग है कि पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर की असेंबली में शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 सीटों (Refugee Seats) को पूरी तरह से समाप्त किया जाए। उनका आरोप है कि इन सीटों का इस्तेमाल पाकिस्तान की मुख्यधारा की पार्टियां अपने फायदे और राजनीतिक जोड़-तोड़ के लिए करती हैं।
सरकार का रुख: दूसरी ओर, कश्मीर की वर्तमान सरकार और पाकिस्तान की संघीय सरकार ने पहले ही साफ कर दिया है कि इन 12 शरणार्थी सीटों पर किसी भी कीमत पर कोई समझौता नहीं किया जाएगा।
पीटीआई के इस बहिष्कार को जहां पाकिस्तान की सत्ताधारी पार्टी पीएमएल-एन (PML-N) के नेता तारिक फ़ज़ल चौधरी ने 'चुनावी मैदान से भागने का स्पष्ट प्रमाण और कमजोरी' बताया है, वहीं वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषकों ने इसके पीछे की असली कानूनी और जमीनी कड़वी हकीकत को उजागर किया है:
रजिस्ट्रेशन और चुनाव चिन्ह का संकट: वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक मुजीब-उर-रहमान शमी के मुताबिक, पीटीआई के पास चुनाव का बहिष्कार करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता ही नहीं बचा था। दरअसल, पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में पीटीआई एक पंजीकृत (Registered) पार्टी के तौर पर मौजूद नहीं है। हालांकि वहां के हाई कोर्ट ने पीटीआई को रजिस्टर्ड करने और चुनाव चिन्ह आवंटित करने का आदेश दिया था, लेकिन पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने उस फैसले को निलंबित (Suspend) कर दिया।
अस्तित्व का संकट: मुजीब-उर-रहमान का कहना है कि जिस तरह गिलगित-बाल्टिस्तान और पाकिस्तान के मुख्य चुनावों में पीटीआई के लिए कानूनी रास्ते बंद किए गए, ठीक वही कहानी कश्मीर में दोहराई गई है। पीटीआई समर्थक केवल निर्दलीय के रूप में लड़ सकते थे, लेकिन वहां पाला बदलने (Horse Trading) का इतिहास पुराना है, इसलिए पार्टी ने गरिमा बनाए रखने के लिए बहिष्कार का नैरेटिव चुना।
किसे होगा फायदा?: राजनीतिक पत्रकार दानिश इरशाद के अनुसार, पीटीआई के मैदान छोड़ने से उसके परंपरागत वोट बैंक का नुकसान होगा। यह वोट या तो निर्दलियों को जाएगा या फिर अप्रत्यक्ष रूप से इसका सीधा फायदा बिलावल भुट्टो की पीपीपी (PPP) और शहबाज़ शरीफ़ की पीएमएल-एन (PML-N) को ही मिलेगा।
इमरान ख़ान की पार्टी (PTI) द्वारा पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के चुनावों का बहिष्कार करना महज़ एक 'सहानुभूति कार्ड' या आंदोलन के प्रति एकजुटता नहीं है, बल्कि यह एक चतुर राजनीतिक और कूटनीतिक 'फेस-सेविंग' (चेहरा बचाने की) रणनीति है। जब देश की सर्वोच्च अदालत ने आपके हाथ से बल्ला (चुनाव चिन्ह) और पार्टी का आधिकारिक बैनर ही छीन लिया हो, तो चुनावी मैदान में उतरकर निर्दलियों के भरोसे हार का मुंह देखने से कहीं बेहतर कूटनीति यह होती है कि आप खुद को जन-आंदोलन का मसीहा घोषित करके मैदान छोड़ दें। पीटीआई ने ठीक यही किया है।
'बेबाक24' का मानना है कि शरणार्थियों की 12 सीटों को लेकर जम्मू-कश्मीर संयुक्त लोक कार्रवाई समिति (JAAC) का यह आंदोलन बेहद गंभीर है। यह दिखाता है कि PoK की स्थानीय जनता और इस्लामाबाद के हुक्मरानों के बीच अविश्वास की खाई कितनी गहरी हो चुकी है। रावलकोट में धरने पर बैठी जनता पर अंधाधुंध बल प्रयोग करना और इंटरनेट बैन जैसी पाबंदियां लगाना यह साबित करता है कि पाकिस्तान इस क्षेत्र में लोकतंत्र नहीं, बल्कि बंदूक के दम पर नियंत्रण चलाना चाहता है। पीटीआई के हटने से भले ही चुनाव की 'क्रेडिबिलिटी' (विश्वसनीयता) पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सवाल उठेंगे, लेकिन अंततः इसका फायदा पाकिस्तान की पारंपरिक और सेना-समर्थित पार्टियों को ही मिलेगा, जो कश्मीर असेंबली की सत्ता पर काबिज होने के लिए बेताब हैं।
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