by on | 2026-07-03 09:14:18
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अंतरराष्ट्रीय डेस्क (बेबाक24): ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई के आगामी पांच दिवसीय अंतिम संस्कार समारोह से ठीक पहले पश्चिम एशिया में तनाव अपने चरम बिंदु पर पहुंच गया है। ईरान की सर्वोच्च सैन्य कमान ने अमेरिका, इजरायल और उनके वैश्विक व क्षेत्रीय सहयोगियों को बेहद कड़े लहजे में चेतावनी दी है कि यदि 4 से 8 जुलाई 2026 के बीच होने वाले शोक कार्यक्रमों के दौरान किसी भी तरह की सैन्य हिमाकत या आक्रामक कार्रवाई की गई, तो उसका ऐसा "करारा और विनाशकारी जवाब दिया जाएगा जिसका उन्हें जिंदगी भर पछतावा होगा।"
बीबीसी मॉनिटरिंग के अनुसार, ईरान के 'ख़ातम अल-अंबिया केंद्रीय मुख्यालय' के कमांडर मेजर जनरल अली अब्दुल्लाही ने यह बयान जारी किया है, जिसे इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) से जुड़ी आधिकारिक समाचार एजेंसी 'तसनीम' ने अपने टेलीग्राम चैनल पर प्रमुखता से प्रसारित किया है।
मेजर जनरल अली अब्दुल्लाही ने साफ किया कि सर्वोच्च नेता का अंतिम संस्कार केवल एक शोक सभा नहीं होगा, बल्कि यह पूरी दुनिया के सामने यह साबित करेगा कि ईरानी आवाम अपने नेता की शहादत का 'खून का बदला' लेने के अपने संकल्प पर पूरी तरह अडिग है।
गलतफहमी में न रहें अमेरिका-इजरायल: जनरल अब्दुल्लाही ने कहा, "हम शक्तिशाली ईरान के दुश्मनों— विशेष रूप से अमेरिका, ज़ायोनी शासन (इजरायल) और उनके क्षेत्र के भीतर व बाहर के पिट्ठू सहयोगियों को चेतावनी देते हैं कि वे इस ऐतिहासिक शोक के समय ईरान की ताकत को कम आंकने की 'गलतफहमी या गलत आकलन' कतई न करें।"
पछतावे वाला पलटवार: उन्होंने स्पष्ट किया कि ईरान की सीमाओं या संप्रभुता के खिलाफ किसी भी "धमकी या उकसावे वाली कार्रवाई" का जवाब देने के लिए ईरानी सशस्त्र बल अपनी उंगली ट्रिगर पर रखकर तैयार बैठे हैं।
तेहरान नगर पालिका में सांस्कृतिक और सामाजिक मामलों के उप प्रमुख मोहम्मद अमीन तवाकलिज़ादेह के अनुसार, इस अंतिम संस्कार को मानव इतिहास के सबसे बड़े जनसमूहों में से एक बनाने की तैयारी चल रही है:
ऐतिहासिक भागीदारी: राजधानी तेहरान में 1.5 से 2 करोड़ लोगों की संभावित भागीदारी को देखते हुए विशालकाय बुनियादी और सुरक्षा प्रबंध किए जा रहे हैं।
5 दिनों का कार्यक्रम: 4, 5, 6, 7 और 8 जुलाई को तेहरान के अलावा पवित्र शहरों क़ोम और मशहद में भी जनाजे के जुलूस निकाले जाएंगे।
इस महा-संकट और भू-राजनीतिक तनाव के बीच भारत सरकार ने एक बेहद संतुलित और बड़ा कूटनीतिक कदम उठाया है। भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) द्वारा जारी आधिकारिक बयान के अनुसार, भारत की ओर से एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल आज 3 जुलाई 2026 को तेहरान के लिए रवाना हो रहा है।
भारतीय प्रतिनिधिमंडल: इस डेलिगेशन में बिहार के माननीय राज्यपाल सैयद अता हसनैन और केंद्रीय विदेश मामलों के राज्य मंत्री पबित्र मार्गेरिटा शामिल हैं।
रणनीतिक उपस्थिति: भारत के इस कदम को वैश्विक कूटनीति में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पश्चिम एशिया में भारत के रणनीतिक हित (जैसे चाबहार पोर्ट और ऊर्जा सुरक्षा) सीधे तौर पर ईरान से जुड़े हैं, और इस संकट की घड़ी में अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर नई दिल्ली ने ईरान के साथ अपने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत बनाए रखने का बेबाक संदेश दिया है।
ईरान के शीर्ष कमांडर मेजर जनरल अली अब्दुल्लाही की यह खुली सैन्य चेतावनी कोई खोखली गीदड़भभकी नहीं है, बल्कि यह ईरान की 'सुरक्षात्मक और आक्रामक राष्ट्रीय नीति' का सीधा प्रदर्शन है। 28 फरवरी 2026 को जिस तरह अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान के भीतर घुसकर सर्वोच्च नेता को मार गिराया, वह ईरान के सैन्य इतिहास का सबसे बड़ा ब्लंडर था। अब जब तेहरान की सड़कों पर 2 करोड़ लोगों का हुजूम उमड़ने वाला है, तो ईरान को सबसे बड़ा डर इस बात का है कि इजरायल या अमेरिका इस विशाल जनसमूह को तितर-बितर करने या अंतरिम नेतृत्व को निशाना बनाने के लिए फिर से कोई 'ड्रोन या एयर स्ट्राइक' न कर दे। इसी संभावित हवाई हमले के डर को भांपते हुए ईरान ने पहले ही परमाणु और मिसाइल डिफेंस सिस्टम को हाई-अलर्ट पर डाल दिया है।
'बेबाक24' इस पूरे घटनाक्रम में भारत सरकार के फैसले की गहरी और पैनी कूटनीतिक समीक्षा कर रहा है। ईरान के साथ अमेरिका और इजरायल जो भारत के बेहद करीबी रणनीतिक साझेदार हैं का युद्ध चल रहा है। ऐसे में कतर (दोहा) की शांति वार्ता में जहां एक तरफ पाकिस्तान मध्यस्थ बना हुआ है, वहीं भारत ने अपने सबसे अनुभवी और सम्मानित मुस्लिम चेहरे— बिहार के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन और विदेश राज्य मंत्री पबित्र मार्गेरिटा को तेहरान भेजकर एक मास्टरस्ट्रोक खेला है। जनरल हसनैन की मिलिट्री बैकग्राउंड और रणनीतिक सूझबूझ इस बात का संकेत है कि भारत केवल शोक व्यक्त करने नहीं जा रहा, बल्कि वह पर्दे के पीछे ईरान के नए सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व के साथ भू-राजनीतिक समीकरणों और चाबहार पोर्ट की सुरक्षा को लेकर सीधी बातचीत की लाइन खुली रखना चाहता है। 4 से 8 जुलाई के ये पांच दिन तय करेंगे कि मिडिल ईस्ट में शांति की कोई गुंजाइश बची है या फिर 9 जुलाई की सुबह एक नए विश्व युद्ध का बिगुल फूंकेगी।
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