by admin@bebak24.com on | 2026-07-02 16:12:15
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राष्ट्रीय डेस्क (बेबाक24): राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने 1947 के भारत विभाजन की त्रासदी और विस्थापन को लेकर एक बड़ा और वैचारिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण बयान दिया है। उन्होंने कहा कि देश के बंटवारे के बाद पाकिस्तान से सब कुछ छोड़कर भारत आने वाले लोग 'शरणार्थी' (Refugees) नहीं थे, बल्कि वे अपनी "मातृभूमि और धर्म की रक्षा करने वाले संघर्ष के योद्धा" थे।
समाचार एजेंसी पीटीआई (PTI) के मुताबिक, मोहन भागवत बुधवार को नागपुर में सिंधी समाज द्वारा संचालित 'सिंधु एजुकेशन सोसाइटी' के 75वें स्थापना दिवस समारोह को संबोधित कर रहे थे। इसी दौरान उन्होंने विभाजन का दंश झेलने वाले परिवारों के प्रति यह सम्मान प्रकट किया।
मोहन भागवत ने विभाजन के समय विस्थापित हुए लोगों, विशेषकर सिंधी और पंजाबी समुदायों के संघर्ष को रेखांकित करते हुए कहा कि उनके विस्थापन को केवल एक मजबूरी के रूप में देखना गलत होगा।
'शरणार्थी' शब्द कहना गलत: आरएसएस प्रमुख ने साफ शब्दों में कहा, "वे विस्थापित जरूर थे, लेकिन शरणार्थी नहीं थे। उस समय उनके लिए 'शरणार्थी' शब्द का इस्तेमाल करना ही पूरी तरह गलत था। वे अपनी पवित्र भारतभूमि और अपने सनातन धर्म के प्रति अटूट प्रेम के कारण संघर्ष करने वाले योद्धा थे।"
पीढ़ियों की कमाई छोड़ आए: भागवत ने कहा कि इन लोगों ने नवगठित पाकिस्तान में अपनी कई पीढ़ियों की कमाई हुई अकूत संपत्ति, आलीशान घर, जमीन-जायदाद और फलते-फूलते कारोबार को महज इसलिए छोड़ दिया क्योंकि वे बिना किसी भय के अपने धर्म का पालन करना चाहते थे।
पूरी चेतना के साथ लिया फैसला: उन्होंने कहा कि अपार शारीरिक कष्ट, पीड़ा और हिंसा सहते हुए भी इन लोगों ने पूरी चेतना (Consciousness) के साथ भारत आने का निर्णय लिया।
अपने संबोधन के दौरान मोहन भागवत ने इतिहास के उस काले पन्ने पर आत्ममंथन करते हुए एक बेहद भावुक और कूटनीतिक बात भी कही। उन्होंने कहा, "भारत को एकजुट रखने की लड़ाई हम सब हार गए। यह केवल उन विस्थापित होने वाले लोगों की गलती नहीं थी, बल्कि यह पूरे समाज की सामूहिक विफलता थी।"
उन्होंने सिंधी समाज की सराहना करते हुए कहा कि शून्य से शुरुआत करने के बावजूद इस समाज ने अपनी कड़ी मेहनत, व्यापारिक कुशलता और देशभक्ति के बल पर न केवल खुद को दोबारा स्थापित किया, बल्कि भारत के विकास में भी एक बेबाक और अभूतपूर्व योगदान दिया है।
मोहन भागवत का यह बयान केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम का भाषण नहीं है, बल्कि यह आरएसएस के उस वृहद नैरेटिव (Narrative) का हिस्सा है जो विभाजन की विभीषिका को एक नए नजरिए से इतिहास में दर्ज करना चाहता है। 'शरणार्थी' शब्द में कहीं न कहीं एक लाचारी, दया और बेबसी का भाव छिपा होता है, जबकि 'योद्धा' शब्द उस पूरे समाज को गौरव, सम्मान और संघर्ष का एक ऊंचा स्थान देता है। भागवत ने 'शरणार्थी' शब्द को खारिज करके उन लाखों परिवारों के आत्मसम्मान को सहलाया है जिन्होंने विभाजन में अपने स्वजनों और अपनी जड़ों को खो दिया था।
'बेबाक24' इस बयान के राजनीतिक और सामाजिक निहितार्थों को भी देख रहा है। भागवत का यह कहना कि "भारत को एकजुट रखने की लड़ाई हम सब हार गए", एक बहुत बड़ा ऐतिहासिक स्वीकारोक्ति (Admission) है। इसके जरिए उन्होंने किसी एक राजनीतिक दल (जैसे कांग्रेस) पर ठीकरा फोड़ने के बजाय इसे पूरे तत्कालीन नेतृत्व और समाज की सामूहिक हार बताया है। आगामी समय में जब देश 'विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस' (14 अगस्त) की ओर बढ़ रहा है, आरएसएस प्रमुख का यह बयान निश्चित रूप से देश के सांस्कृतिक और राजनीतिक नैरेटिव को प्रभावित करेगा। यह सिंधी और अन्य विस्थापित समुदायों को मुख्यधारा के राष्ट्र-निर्माण में उनके संघर्ष की सही पहचान दिलाने की दिशा में एक साहसिक और सकारात्मक वैचारिक कदम है।
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