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32 साल पुराना जल विवाद सुलझा: अमित शाह की मौजूदगी में हरियाणा-राजस्थान के बीच ऐतिहासिक MoU पर दस्तखत; भूमिगत पाइपलाइन से मिलेगा पानी

by admin@bebak24.com on | 2026-06-29 19:22:17

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32 साल पुराना जल विवाद सुलझा: अमित शाह की मौजूदगी में हरियाणा-राजस्थान के बीच ऐतिहासिक MoU पर दस्तखत; भूमिगत पाइपलाइन से मिलेगा पानी

नई दिल्ली/जयपुर/चंडीगढ़: हरियाणा और राजस्थान के बीच पिछले तीन दशकों से अधिक समय से लंबित पड़े बेहद संवेदनशील जल बंटवारे (Water Sharing) के मुद्दे पर सोमवार को एक ऐतिहासिक और बड़ा फैसला हुआ है। नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में दोनों राज्यों के बीच एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (MoU) पर आधिकारिक रूप से हस्ताक्षर किए गए।

इस समझौते के बाद राजस्थान के रेगिस्तानी और पानी की किल्लत से जूझ रहे इलाकों को उनके हिस्से का यमुना जल मिलने का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है।

1. 1994 का 'अपर यमुना रिवर बोर्ड समझौता' होगा लागू

समाचार एजेंसी पीटीआई (PTI) के मुताबिक, सोमवार को हुआ यह समझौता कोई नया कानून नहीं है, बल्कि आज से 32 साल पहले साल 1994 में बने 'अपर यमुना रिवर बोर्ड समझौते' (Upper Yamuna River Board Agreement) को पूरी तरह से जमीन पर लागू करने के लिए किया गया है।

इस नए एमओयू की मुख्य बातें निम्नलिखित हैं:

  • हथिनी कुंड बैराज से मिलेगा पानी: नए कूटनीतिक और तकनीकी समझौते के अनुसार, राजस्थान को उसके हिस्से का आवंटित पानी हरियाणा के हथिनी कुंड बैराज (Hathni Kund Barrage) से दिया जाएगा।

  • अंडरग्राउंड पाइपलाइन का फॉर्मूला: राजस्थान को यह पानी केवल मानसून वाले महीनों (जब यमुना में अतिरिक्त पानी होता है) में उपलब्ध कराया जाएगा। पानी को राजस्थान तक पहुंचाने के लिए एक विशाल भूमिगत पाइपलाइन (Underground Pipeline) प्रणाली का निर्माण किया जाएगा।

2. हाई-प्रोफाइल बैठक में शीर्ष नेतृत्व रहा मौजूद

इस अंतर-राज्यीय जल समझौते को अमलीजामा पहनाने के लिए केंद्र सरकार ने पूरी ताकत झोंकी। समझौते के दौरान गृह मंत्रालय के कार्यालय में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के अलावा:

  • केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल,

  • हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी, और

  • राजस्थान के मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा विशेष रूप से मौजूद रहे और दोनों राज्यों के सिंचाई सचिवों ने इस कूटनीतिक समझौते पर दस्तखत किए।

3. 32 साल तक क्यों अटका रहा यह समझौता?

यह जल समझौता तकनीकी और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण पिछले 32 सालों से धूल फांक रहा था। 1994 में जब यह समझौता हुआ था, तब कागजों पर तो पानी का आवंटन कर दिया गया, लेकिन राजस्थान के पास हरियाणा सीमा से अपने जिलों तक पानी लाने के लिए कोई मजबूत नहर प्रणाली (Canal System) या इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद नहीं था। हरियाणा अपनी जमीन पर नई खुली नहरें बनाने के पक्ष में नहीं था, जिसके कारण यह विवाद तीन दशकों तक खिंचता चला गया। अब खुली नहर के बजाय 'अंडरग्राउंड पाइपलाइन' के आधुनिक फॉर्मूले ने इस गतिरोध को हमेशा के लिए खत्म कर दिया है।

बेबाक24 टेक

यह जल समझौता केवल दो राज्यों के बीच पानी का बंटवारा नहीं है, बल्कि यह आगामी चुनावों और क्षेत्रीय राजनीति की बिसात पर केंद्र की सत्तारूढ़ बीजेपी द्वारा खेला गया एक बहुत बड़ा 'मास्टरस्ट्रोक' है। राजस्थान के शेखावाटी और सीमावर्ती जिलों (जैसे चुरू, झुंझुनू और सीकर) के लिए यमुना का पानी दशकों से एक बड़ा भावनात्मक और चुनावी मुद्दा रहा है। भजन लाल शर्मा सरकार के लिए इसे अपनी एक बहुत बड़ी कूटनीतिक और ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में पेश करने का पूरा मौका मिलेगा।

तकनीकी रूप से देखें तो खुली नहर के बजाय 'अंडरग्राउंड पाइपलाइन' का चयन करना एक बेहद समझदारी भरा और बेबाक फैसला है। इससे न केवल हरियाणा में किसानों की जमीन के अधिग्रहण (Land Acquisition) का विवाद बचेगा, बल्कि रास्ते में होने वाले पानी के वाष्पीकरण (Evaporation) और चोरी को भी रोका जा सकेगा। दोनों राज्यों में एक ही दल (बीजेपी) की सरकार होने का दोहरा लाभ (Double Engine) इस कूटनीतिक सफलता में साफ दिखाई देता है। अब चुनौती इस पाइपलाइन परियोजना को समयबद्ध तरीके से पूरा करने की होगी, ताकि कागजों पर सुलझा यह 32 साल पुराना विवाद जल्द से जल्द राजस्थान के प्यासे खेतों तक हकीकत बनकर पहुंच सके।



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