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418 साल पुरानी परंपरा, 42 घंटे तक चला 'दुलदुल का ऐतिहासिक कदीमी जुलूस'

by on | 2026-06-23 00:40:31

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418 साल पुरानी परंपरा, 42 घंटे तक चला 'दुलदुल का ऐतिहासिक कदीमी जुलूस'

वाराणसी: धर्म और आस्था की नगरी काशी में मोहर्रम के मौके पर एक ऐसी अनूठी परंपरा का निर्वहन किया गया, जो पूरे विश्व में अद्वितीय है। वाराणसी के दाल मंडी स्थित वक्फ इमामबाड़ा (कच्ची सराय) से 22 जून (6 मोहर्रम) की शाम 5:00 बजे 418 साल पुराना ऐतिहासिक 'दुलदुल का जुलूस' पूरी भव्यता और अकीदत के साथ उठाया गया। अपनी 40 से 42 घंटे की लंबी अवधि के लिए विख्यात यह जुलूस शहर के विभिन्न इलाकों से होते हुए तीसरे दिन इमामबाड़ा पहुंचकर संपन्न हुआ।

​इतिहास और परंपरा का संगम

​इस ऐतिहासिक जुलूस के संयोजक शकील अहमद जादूगर ने बताया कि यह जुलूस 1400 साल पहले मदीने से कर्बला के सफर की याद दिलाता है। जुलूस में बड़ी संख्या में ऊंटों का काफिला शामिल रहा, जो उसी मंजर को दर्शाते हैं जब हजरत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का परिवार मदीने से कर्बला की ओर बढ़ा था।

​मातम और अकीदत के माहौल में डूबी काशी

​जुलूस के दौरान पूरा वातावरण 'हजरत इमाम हुसैन' की याद में गमगीन रहा। 'अंजुमन जवादिया बनारस' के सोजख्वानों और नौहाख्वानों ने अपनी मर्सिया और नौहा-मातम से माहौल को गमजदा कर दिया। इस दौरान "बाली सकीना रो-रो पुकारे, हां आए ना आम हमारे" जैसे नौहे गूंजते रहे, जिससे हर आंख नम थी। जुलूस में शामिल कई बैंड पार्टियों और शहनाई वादकों ने मातमी धुन बजाकर अपनी श्रद्धा अर्पित की।

​8 थानों की सुरक्षा और विस्तृत रूट

​यह जुलूस शहर के 8 थानों के क्षेत्राधिकार से होकर गुजरा, जिसकी सुरक्षा व्यवस्था पर चौक थाना पुलिस की विशेष नजर रही। जुलूस का मार्ग अत्यंत विस्तृत रहा, जिसमें मुख्य रूप से निम्नलिखित इलाके शामिल रहे:

  • प्रारंभिक चरण: नई सड़क, औरंगाबाद, काली महाल, माताकुंड, पितर कुंडा, फातमान, चेतगंज।
  • मध्य चरण: जालपा देवी, कबीर चौरा, आसान गंज, जेतपुरा, दोषी पूरा, दारानगर, बहेलिया टोला, पठानी टोला।
  • अंतिम चरण: हनुमान फाटक, लाट भैरो, चौहट्टा लाल खां, गायघाट, ठठेरी बाजार, चौक, दाल मंडी और पत्थर गली।

​संचालन और प्रबंधन

​जुलूस को सफलतापूर्वक संपन्न कराने में सैयद इकबाल हुसैन की देखरेख और मार्गदर्शन महत्वपूर्ण रहा। इस आयोजन को सुचारू रूप से संचालित करने में जफर हसन, हैदर गुड्डू, सागर हसन, इमरान हुसैन जैदी, हैदर अब्बास, चंद हैदर, हुसैन मौले, सकलैन हैदर, मसराख्यान हुसैन, शकील, शरीब, जीशान, सारिक हुसैन और रेहान हुसैन समेत कई गणमान्य लोगों का विशेष सहयोग रहा।

​जुलूस का सफल संचालन शकील अहमद जादूगर द्वारा किया गया। तीसरे दिन सुबह लगभग 10:00 बजे यह ऐतिहासिक जुलूस वापस इमामबाड़ा पहुंचा और शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ।



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