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60 साल का इंतज़ार खत्म, जर्जर 'मौत के पुल' पर चला विकास का हथौड़ा!

by on | 2026-01-16 21:34:54

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 60 साल का इंतज़ार खत्म, जर्जर 'मौत के पुल' पर चला विकास का हथौड़ा!

60 साल पुरानी उपेक्षा की बेड़ियां टूटीं; राज्यमंत्री संजीव गोंड और पूर्व सांसद नरेंद्र कुशवाहा ने ₹432 करोड़ के प्रोजेक्ट का किया आगाज़।

गुरमा-सोनभद्र।

कहते हैं कि अगर इरादे नेक हों तो सिस्टम को झुकना ही पड़ता है। मारकुंडी-गुरमा मार्ग पर स्थित मीनाबाजार घाघर नदी का वह पुल, जो पिछले 60 सालों से अपनी बदहाली पर आँसू बहा रहा था, अब इतिहास बनने जा रहा है। जिस पुल से गुजरते वक्त जिला प्रशासन के आलाधिकारियों से लेकर आम जनता तक की सांसें अटक जाती थीं, अब वहां ₹432.02 करोड़ की भारी-भरकम लागत से आधुनिक पुल का सीना तनेगा।

खतरे के साये में कट रही थी जिंदगी

​सीमेंट फैक्ट्री के दौर में बना यह पुल इतना जर्जर हो चुका था कि इसे 'हादसों का निमंत्रण' कहना गलत नहीं होगा। जिला जेल के बंदी हों, पीएसी के जवान हों या हर दिन गुजरने वाले हजारों ग्रामीण—हर कोई एक अनचाहे डर के साये में सफर कर रहा था। स्थानीय प्रबुद्धजनों और मीडिया ने इस मुद्दे को लेकर शासन की सोई हुई नींद उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। दर्जनों बार लिखित और मौखिक चेतावनियों के बाद आखिरकार शासन ने इस 'जीर्ण-शीर्ण' पुल की सुध ली।

हवन-पूजन के साथ हुआ शिलान्यास

​शुक्रवार को समाज कल्याण राज्य मंत्री संजीव कुमार सिंह गोंड और पूर्व सांसद नरेंद्र सिंह कुशवाहा ने पूरी विधि-विधान और हवन-पूजन के साथ इस प्रोजेक्ट का श्रीगणेश किया। जैसे ही पहली ईंट रखी गई, सालों से उपेक्षा झेल रहे ग्रामीणों के चेहरे खिल उठे। भाजपा कार्यकर्ताओं ने फूल-मालाओं के साथ नेताओं का भव्य स्वागत कर इस जीत का जश्न मनाया।

मौके पर दिग्गजों का जमावड़ा

​विकास के इस महायज्ञ में चोपन मंडल अध्यक्ष राहुल प्रताप सिंह, तेजधारी यादव, सत्यदेव पाण्डेय, मीनू चौबे और अमरनाथ पनिका जैसे दिग्गज मौजूद रहे। वहीं तकनीकी मोर्चा संभालने के लिए अधिशासी अभियंता प्रीति पटेल, जितेंद्र सिंह और सदानंद मौर्या (जेई) सहित पूरी टीम तैनात रही।

बेबाक नजरिया:

​यह सिर्फ एक पुल का निर्माण नहीं है, बल्कि उस प्रशासनिक सुस्ती की हार है जिसने 60 साल तक इस इलाके को खतरे में रखा। उम्मीद है कि ₹432 करोड़ की यह भारी राशि कागजों से निकलकर पुल की मजबूती में ईमानदारी से दिखेगी, ताकि भविष्य में फिर किसी 'जर्जर' शब्द का इस्तेमाल न करना पड़े।



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