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सस्ती टीआरपी, सियासत के बहुरूपिए और बलिदान का अपमान

by on | 2026-09-20 10:54:25

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सस्ती टीआरपी, सियासत के बहुरूपिए और बलिदान का अपमान

​डिजिटल दौर में जब पत्रकारिता और सार्वजनिक विमर्श का दायरा सिमटकर 30 सेकंड की रीलों, लाइक, शेयर और सस्ती टीआरपी की हवस तक सीमित हो चुका है, तब इतिहास के कठिन और संघर्षपूर्ण अध्यायों को बहुत हल्के में आंकने की होड़ सी मच गई है। वातानुकूलित (AC) कमरों के मखमली गद्दों पर बैठकर स्क्रीन के सामने जहरीले बयान देना बेहद आसान है, लेकिन धरातल की खूनी, खौफनाक और भयावह सच्चाइयों का सामना करने के लिए जिस अदम्य साहस और दृढ़ता की आवश्यकता होती है, उसका अहसास शायद इन दिनों रीढ़विहीन और बौद्धिक रूप से दिवालिया हो चुके तथाकथित विश्लेषकों को नहीं है।

​जब कोई हिंदुत्व, भगवा, विचार और गोली के साये में लड़े गए संघर्ष की शुचिता, तपस्या तथा उस राह में झेली गई यातनाओं पर सवाल उठाता है, तो उसे इतिहास के उन दो खौफनाक पन्नों को पलटकर देखना चाहिए जहाँ मौत ने बारूद की गंध के साथ तांडव किया था।

​पहला पन्ना 29 नवंबर 2005 का है—गाज़ीपुर का वह बसनिया कांड, जहाँ तत्कालीन भाजपा विधायक कृष्णानंद राय और उनके साथियों की गाड़ियों पर सैकड़ों गोलियां बरसाई गई थीं। कार की विंडस्क्रीन छलनी थी, चारों तरफ गोलियों की तड़तड़ाहट थी और सड़क पर अपने ही साथी तड़प-तड़पकर जान दे रहे थे। दूसरा पन्ना 7 सितंबर 2008 का है—आजमगढ़ का तकिया मोड़, जहाँ 36 साल के निडर भगवाधारी के काफिले पर चारों तरफ से पेट्रोल बम और गोलियों से हमला किया गया था। जब मौत महज दो इंच की दूरी से सनसनाती हुई गुजरती है और फेफड़ों में बारूद का धुआं भरता है, तब उस सन्नाटे और दहशत की भयावहता का अंदाजा केवल वही लगा सकता है जिसने उस क्षण को जिया हो।

​जिहादी ताकतों, अंडरवर्ल्ड के खतरनाक नेटवर्क, अकूत धनबल और तत्कालीन सत्ताधारियों की खामोश शह का सामना करते हुए जिन सिद्धांतों और निष्ठा के लिए अपनी जान हथेली पर रखी गई, उस तपस्या का उपहास उड़ाना केवल एक व्यक्ति का अपमान नहीं है, बल्कि उस पूरे संघर्ष पर कुठाराघात है।

​एक तरफ धनबल, पुलिस-प्रशासन की मिलीभगत, टूटते गवाह, अंधे-बहरे कानून की विफलता और बिकती बेंचों के फैसलों ने स्वर्गीय विधायक कृष्णानंद राय के परिवार और उनके समर्थकों को तोड़कर रख दिया था। वहीं दूसरी तरफ, इस पूरे आपराधिक कृत्य को अंजाम देने वाले माफिया साम्राज्य और उसके खजाने को बचाने के लिए अब वही ताकतें नए-नए बहुरूप धारण कर रही हैं। वे चुनाव के मैदान में उतरकर कृष्णानंद राय के बलिदान की बची हुई लौ को बुझाने के कुत्सित प्रयास में जुटी हैं। अब यह देखना दिलचस्प और निर्णायक होगा कि क्या जनता उनके इस नए चक्रव्यूह को सफल होने देगी, या फिर मुहम्मदाबाद की जागरूक जनता इन अपराधियों और उनके संरक्षकों को कड़ा जवाब देगी।

​आज जब टीआरपी के भूखे चेहरे और व्यूज पाने की होड़ में लगे लोग सच को धुंधला करने तथा विषैला एजेंडा फैलाने में जुटे हैं, तब यह सवाल पूछना बेहद जरूरी हो जाता है: क्या सोशल मीडिया के दौर की इस खोखली बहसबाजी में संघर्षों और बलिदानों की कीमत इतनी सस्ती हो गई है? इतिहास का पन्ना पलटकर देखना और निष्पक्ष मूल्यांकन करना ही निष्पक्ष पत्रकारिता और सार्वजनिक संवाद का असली धर्म है—वरना सस्ती लोकप्रियता के लिए इतिहास, बलिदान और तपस्या का उपहास उड़ाने वाली जमात केवल अपने बौद्धिक दिवालियापन का ही विज्ञापन करती रहेगी।



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