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डूसू चुनाव में बदले मुद्दे, लेकिन कायम रही पुरानी छात्र राजनीति

by on | 2026-09-19 10:57:35

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डूसू चुनाव में बदले मुद्दे, लेकिन कायम रही पुरानी छात्र राजनीति

नई दिल्ली | बेबाक24 न्यूज़

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव में इस बार छात्रों के बीच सुरक्षा, छात्रावास, फीस, परिवहन और जवाबदेही जैसे रोजमर्रा के मुद्दे प्रमुख रहे। शुक्रवार को मतदान के दौरान छात्रों की बातचीत से संकेत मिला कि कैंपस से जुड़े सवाल उनकी प्राथमिकता में हैं, लेकिन पारंपरिक छात्र संगठनों और उनकी चुनावी व्यवस्था की भूमिका भी बनी हुई है।

डूसू चुनाव से पहले दिल्ली में युवाओं का आंदोलन भी चर्चा में रहा। जंतर-मंतर पर युवाओं ने शिक्षा, रोजगार और अन्य मुद्दों को लेकर अपनी आवाज उठाई थी। इसके बाद डूसू चुनाव में यही युवा मतदाता के रूप में सामने आए। हालांकि, इस नई तरह की राजनीतिक सक्रियता का छात्र संगठनों की चुनावी राजनीति पर कितना असर पड़ा, इसका स्पष्ट आकलन चुनावी नतीजों और आगे के घटनाक्रम से ही होगा।

मुद्दे बदले, संगठन की भूमिका कायम

दिल्ली विश्वविद्यालय में देश के अलग-अलग हिस्सों से छात्र पढ़ते हैं। करीब 1.50 लाख मतदाताओं वाला डूसू चुनाव इसी विविधता के बीच होता है। लंबे समय से चुनावी राजनीति में एबीवीपी और एनएसयूआई जैसे प्रमुख छात्र संगठनों की मौजूदगी रही है और इस बार भी उनकी सक्रियता दिखाई दी।

राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर चंद्रचूड़ सिंह के अनुसार, युवाओं के हालिया आंदोलनों का प्रभाव डूसू चुनाव पर पड़ना स्वाभाविक है, लेकिन उसका वास्तविक स्वरूप चुनाव परिणाम के बाद ही स्पष्ट होगा। उन्होंने यह भी कहा कि फिलहाल यह तय करना मुश्किल है कि इसका लाभ किस संगठन को मिलेगा।

प्रचार में डिजिटल माध्यम, मतदान में जमीनी तैयारी

छात्र राजनीति में प्रचार और संवाद के तरीके भी बदल रहे हैं। सामाजिक माध्यमों ने उम्मीदवारों को बड़ी संख्या में छात्रों तक पहुंचने का माध्यम दिया है। इसके बावजूद मतदान के दिन कॉलेजों में संगठन की मौजूदगी, समर्थकों की सक्रियता और मतदान केंद्रों के आसपास की चुनावी तैयारी महत्वपूर्ण बनी रही।

इससे डूसू चुनाव में एक साथ दो प्रवृत्तियां दिखाई देती हैं। एक ओर छात्र अपनी सुविधाओं, अधिकारों और विश्वविद्यालय प्रशासन की जवाबदेही से जुड़े सवाल उठा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पारंपरिक छात्र संगठनों की संगठनात्मक व्यवस्था भी चुनाव में प्रभावी बनी हुई है।

नई राजनीतिक भाषा और पुराना ढांचा

डूसू चुनाव के दौरान छात्रों की प्राथमिकताओं में कैंपस से जुड़े मुद्दों की स्पष्ट मौजूदगी दिखाई दी। लेकिन इन मुद्दों के आधार पर पारंपरिक छात्र राजनीति से पूरी दूरी बनती हुई भी नजर नहीं आई। फिलहाल नई पीढ़ी के मुद्दे और पुरानी चुनावी संरचना साथ-साथ आगे बढ़ते दिखाई दे रहे हैं।

बेबाक24 की राय

डूसू चुनाव में छात्रों के मुद्दों और राजनीतिक सक्रियता के तरीके में बदलाव के संकेत जरूर दिखाई देते हैं, लेकिन छात्र संगठनों की पारंपरिक भूमिका भी कायम है। नई राजनीतिक भाषा कैंपस की बहस का हिस्सा बनी है, जबकि चुनावी संगठन और जमीनी नेटवर्क अभी भी प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।



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