by on | 2026-07-15 21:20:34
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नई दिल्ली (बेबाक24): देश की सबसे बड़ी अदालत, यानी सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) की गरिमा को ठेस पहुंचाने और सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (CJI) को कथित तौर पर अपशब्द कहने व कोर्ट रूम में कागज लहराने के मामले में दिल्ली पुलिस ने बड़ी कार्रवाई की है। पुलिस ने इस मामले में लखनऊ यूनिवर्सिटी के दो छात्रों को गिरफ्तार किया है।
अदालत में हुई इस अभूतपूर्व घटना के बाद जहां एक तरफ पुलिस ने सुरक्षाकर्मियों की शिकायत पर बेहद संवेदनशील धाराओं में मामला दर्ज किया है, वहीं दूसरी तरफ आरोपियों के परिजनों ने पुलिस पर गंभीर आरोप लगाते हुए न्याय की गुहार लगाई है।
समाचार एजेंसी एएनआई (ANI) के मुताबिक, गिरफ्तार किए गए दोनों युवक लखनऊ विश्वविद्यालय (Lucknow University) में कानून (Law) की पढ़ाई कर रहे हैं:
पहचान: आरोपियों की पहचान 24 वर्षीय प्रबल प्रताप (एलएलबी थर्ड ईयर) और 23 वर्षीय चंद्रभान (एलएलबी सेकंड ईयर) के रूप में की गई है।
पुलिस की रहस्यमयी चुप्पी: इन दोनों छात्रों के खिलाफ दिल्ली के तिलक मार्ग पुलिस स्टेशन में एफआईआर (FIR) दर्ज की गई है। जब बीबीसी संवाददाता प्रेरणा ने थाने के एसएचओ (SHO) ब्रिजेश कुमार से संपर्क किया, तो उन्होंने एफ़आईआर का विवरण देने से साफ मना कर दिया और कहा, "यह बेहद संवेदनशील मामला है, हम फिलहाल इस पर कोई जानकारी साझा नहीं कर सकते।"
यह पूरा वाकया बीती 10 जुलाई 2026 का है। 'लाइव लॉ' की रिपोर्ट के अनुसार:
सुनवाई के दौरान भड़के छात्र: जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस आलोक आराधे की बेंच के सामने इलाहाबाद हाई कोर्ट के अप्रैल 2026 के एक फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई चल रही थी। याचिकाकर्ता खुद छात्र प्रबल प्रताप थे।
पेपर उछाले और की धक्का-मुक्की: जब कोर्ट ने कहा कि इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले में दखल देने का कोई ठोस आधार नहीं है और याचिका खारिज कर दी, तो प्रबल प्रताप कथित तौर पर अपना आपा खो बैठे। उन्होंने जजों को 'माई लॉर्ड' की जगह 'ज्यूडिशियल सर्वेंट' (Judicial Servant) कहना शुरू कर दिया और बाद में मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ अभद्र और असंसदीय भाषा का इस्तेमाल किया। सुरक्षाकर्मियों ने जब उन्हें रोकने की कोशिश की तो उन्होंने धक्का-मुक्की भी की और कोर्ट रूम में कागज उछाल दिए।
बेंच ने दिखाई थी उदारता: घटना के तुरंत बाद बेंच ने बेहद उदार रवैया अपनाते हुए कहा था कि वे समझते हैं कि याचिकाकर्ता की मानसिक स्थिति ठीक नहीं रही होगी, इसलिए वे उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करेंगे। लेकिन बाद में सुरक्षा विंग की आधिकारिक शिकायत पर पुलिस ने कानूनी एक्शन लिया।
प्रबल प्रताप के चचेरे भाई सचिन यादव ने इस पूरे विवाद के पीछे की दर्दनाक पृष्ठभूमि का खुलासा किया है। परिवार के मुताबिक, प्रबल अपराधी नहीं बल्कि सिस्टम का मारा हुआ एक हताश छात्र है:
सॉफ्टवेयर कंपनी ने की धोखाधड़ी: प्रबल पढ़ाई के साथ-साथ लखनऊ की एक सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करता था। कंपनी ने प्रबल और उसके जरिए आए अन्य युवाओं से नौकरी दिलाने के नाम पर 'सिक्योरिटी मनी' ली, लेकिन न तो नौकरी दी और न ही पैसे लौटाए। इसके अलावा प्रबल की तीन महीने की सैलरी भी रोक ली गई।
पुलिस और कोर्ट से नहीं मिली मदद: प्रबल ने लखनऊ के विकास नगर थाने में शिकायत दर्ज कराई लेकिन पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। इसके बाद उसने निचली अदालत और फिर इलाहाबाद हाई कोर्ट का रुख किया, लेकिन वहां से भी एफआईआर दर्ज कराने का आदेश नहीं मिला।
मानसिक तनाव का शिकार: लगातार कानूनी चक्कर काटने और कहीं से भी न्याय न मिलने के कारण प्रबल पिछले कई महीनों से भीषण मानसिक अवसाद (Depression) और निराशा से जूझ रहा था। इसी हताशा में सुप्रीम कोर्ट में उसका गुस्सा फूट पड़ा।
प्रबल के परिवार का आरोप है कि दिल्ली पुलिस इस मामले में उनके साथ बिल्कुल भी सहयोग नहीं कर रही है:
नहीं मिली एफआईआर की कॉपी: पुलिस ने गिरफ्तारी के बाद से अब तक परिवार को एफआईआर की प्रति उपलब्ध नहीं कराई है।
अज्ञात स्थान पर रखने का आरोप: चचेरे भाई सचिन ने बताया कि सोमवार को प्रबल से कुछ पलों के लिए फोन पर बात हुई थी, लेकिन उसके बाद से पुलिस ने यह नहीं बताया है कि उसे किस जेल या हिरासत केंद्र में रखा गया है। परिवार अपने बच्चे की सुरक्षा को लेकर बेहद डरा हुआ है।
| मुख्य विवरण | घटना और कानूनी कार्रवाई से जुड़े तथ्य |
| मुख्य आरोपी | प्रबल प्रताप (24) और चंद्रभान (23) - लखनऊ यूनिवर्सिटी के कानून के छात्र। |
| घटना की तारीख | 10 जुलाई 2026 (सुप्रीम कोर्ट बेंच के सामने)। |
| मुख्य आरोप | सीजेआई को अपशब्द कहना, कार्यवाही बाधित करना और सुरक्षाकर्मियों से धक्का-मुक्की। |
| दर्ज मुकदमा | तिलक मार्ग थाना, दिल्ली (संवेदनशील श्रेणी में दर्ज)। |
| परिवार की गुहार | मानसिक तनाव की बात स्वीकारते हुए एफआईआर कॉपी और बेटे के ठिकाने की मांग। |
सुप्रीम कोर्ट देश का सर्वोच्च मंदिर है और वहां की मर्यादा की रक्षा हर नागरिक का कर्तव्य है। कानून के छात्रों द्वारा कोर्ट रूम के भीतर जजों के लिए अपशब्दों का प्रयोग करना और कागज उछालना किसी भी सूरत में जायज नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन इस सिक्के का दूसरा पहलू भी बेहद चिंताजनक है।
बेबाक24 का मानना है कि यह घटना हमारे देश की सुस्त न्याय प्रणाली और पुलिसिया संवेदनहीनता का एक जीता-जागता और दुखद उदाहरण है। एक युवा जब नौकरी के नाम पर ठगा जाता है, थाने से लेकर हाई कोर्ट तक के चक्कर काटता है और कहीं सुनवाई नहीं होती, तो उसका सिस्टम से भरोसा उठ जाता है। प्रबल प्रताप का कृत्य गलत था, लेकिन उसकी हताशा सिस्टम की देन है।
दिल्ली पुलिस को भी यह समझना होगा कि आरोपी चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, उसके परिवार को यह जानने का पूरा कानूनी अधिकार है कि उनका बेटा कहां और किस हाल में है। गिरफ्तारी के बाद आरोपी को अज्ञात स्थान पर रखना और एफआईआर की कॉपी न देना मानवा
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