by admin@bebak24.com on | 2026-07-14 21:08:55
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गुवाहाटी (बेबाक24): असम विधानसभा के जारी बजट सत्र के दौरान सोमवार को सदन में नागरिकता और प्रवासियों के निष्कासन को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और चौंकाने वाला आंकड़ा सामने आया है। असम सरकार ने गृह विभाग की जिम्मेदारी संभाल रहे मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा (Himanta Biswa Sarma) के जरिए सदन को सूचित किया है कि राज्य सरकार ने पिछले दो सालों में अलग-अलग श्रेणियों के तहत कुल 1,679 बांग्लादेशी नागरिकों को वापस उनके देश भेजा है।
इसमें फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल (Foreigners Tribunal) द्वारा विदेशी घोषित किए गए लोगों के साथ-साथ हाल ही में फिर से लागू किए गए 'प्रवासी निष्कासन कानून' के तहत की गई गिरफ्तारियां और पुशबैक शामिल हैं। 'बेबाक24' की यह विशेष ग्राउंड रिपोर्ट:
विधानसभा के प्रश्नकाल के दौरान ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (AIUDF) के विधायक बदरुद्दीन अजमल ने सरकार से सवाल पूछा था कि पिछले दो सालों में कितने लोगों को बांग्लादेश 'पुशबैक' (वापस सीमा पार) किया गया है?
इस पर आधिकारिक डेटा पेश करते हुए मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने बताया:
कुल निष्कासन: 1 जुलाई 2024 से 30 जून 2026 के बीच कुल 1,679 लोगों को बांग्लादेश वापस भेजा गया है।
घोषित विदेशी: इन 1,679 लोगों में से 193 ऐसे लोग हैं जिन्हें कानूनी तौर पर 'फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल' ने आधिकारिक रूप से विदेशी घोषित किया था और उनके खिलाफ 'पुशबैक' की कार्रवाई की गई।
1950 के कानून का इस्तेमाल: इन 193 घोषित विदेशियों में से 67 लोगों को पिछले साल राज्य में फिर से प्रभावी किए गए 1950 के 'प्रवासी निष्कासन कानून' के तहत देश की सीमा से बाहर का रास्ता दिखाया गया है।
असम सरकार द्वारा अवैध प्रवासियों के खिलाफ अपनाई जा रही इस नई और सख्त प्रक्रिया को लेकर कूटनीतिक और कानूनी गलियारों में काफी चर्चा है:
जबरन सीमा पार भेजने की नीति: आमतौर पर डिपोर्टेशन (Deportation) की औपचारिक प्रक्रिया में दोनों देशों के बीच नागरिकता की जांच-पड़ताल होती है और आधिकारिक रूप से अधिकारियों को सौंपा जाता है। लेकिन मई 2025 से असम सरकार ने घोषित 'विदेशी' लोगों को दूसरे देश (बांग्लादेश) से लंबी बातचीत किए बिना अंतरराष्ट्रीय सीमा के पार धकेलने यानी 'पुशबैक' का तरीका अपनाना शुरू किया है।
24 घंटे के भीतर कार्रवाई (SOP): इसके बाद सितंबर 2025 में, राज्य सरकार ने 'इमिग्रेंट्स (एक्सपल्शन फ्रॉम असम) एक्ट, 1950' (असम से प्रवासियों को निकालने का कानून) को फिर से लागू कर दिया। इस कानून के तहत एक नई एसओपी (SOP) बनाई गई है। इसके तहत यदि कोई व्यक्ति ट्रिब्यूनल से अवैध नागरिक घोषित होता है, तो जिला प्रशासन बिना किसी देरी के उसे 24 घंटे के अंदर देश छोड़ने का निर्देश दे सकता है और अधिकारी उन्हें तुरंत इंटरनेशनल बॉर्डर पार भेज देते हैं।
| मुख्य संकेतक / श्रेणी | सरकारी डेटा (2024 - 2026) | कानूनी स्थिति व प्रक्रिया |
| कुल वापस भेजे गए नागरिक | 1,679 लोग (1 जुलाई 2024 से 30 जून 2026 तक) | अलग-अलग श्रेणियों के तहत बांग्लादेश भेजे गए। |
| ट्रिब्यूनल द्वारा घोषित विदेशी | 193 लोग (कुल संख्या में से) | फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल द्वारा अवैध नागरिक करार। |
| 1950 के कानून के तहत कार्रवाई | 67 लोग | 'प्रवासी निष्कासन कानून' के तहत त्वरित कार्रवाई। |
| राज्य में कुल 'डी-वोटर्स' (D-Voters) | 91,385 नागरिक | संदिग्ध नागरिकता वाले मतदाता (कांग्रेस विधायक के सवाल पर जवाब)। |
सदन की कार्यवाही के दौरान कांग्रेस विधायक नूरुल इस्लाम ने राज्य में संदिग्ध नागरिकता वाले मतदाताओं यानी 'डी-वोटर्स' (D-Voters) से जुड़ा एक और सवाल पूछा। इसके जवाब में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने साफ किया कि वर्तमान में असम की आधिकारिक वोटर लिस्ट में 91,385 डी-वोटर्स दर्ज हैं, जिनकी नागरिकता का मामला या तो जांच के अधीन है या फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल में लंबित है।
असम में अवैध घुसपैठ और नागरिकता का मुद्दा दशकों पुराना और बेहद संवेदनशील है। पिछले दो वर्षों में 1,679 लोगों का निष्कासन और विशेषकर मई 2025 के बाद से अपनाया गया 'पुशबैक' का नया तरीका यह दिखाता है कि हिमंत बिस्वा सरमा सरकार इस मोर्चे पर बेहद आक्रामक रणनीति अपना रही है। हालांकि, भारत द्वारा अपनाए गए इस 'पुशबैक' फॉर्मूले का बांग्लादेश लगातार कड़ा विरोध करता रहा है, जिससे दोनों देशों के सीमा सुरक्षा बलों के बीच भी तनाव की स्थिति बनती है।
बेबाक24 का मानना है कि 1950 के 'प्रवासी निष्कासन कानून' को फिर से लागू करना और 24 घंटे के भीतर सीमा पार भेजने की एसओपी (SOP) बनाना प्रशासनिक तौर पर भले ही त्वरित परिणाम दे रहा हो, लेकिन इसके मानवाधिकार और कानूनी पहलुओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जिन लोगों को ट्रिब्यूनल विदेशी घोषित करता है, कानूनन उन्हें गुवाहाटी हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का अधिकार है। ऐसे में यदि अपील की अवधि से पहले ही 'पुशबैक' कर दिया जाए, तो यह न्यायिक प्रक्रिया के उल्लंघन का मामला बन सकता है। सरकार को राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ-साथ यह भी देखना होगा कि किसी वैध भारतीय नागरिक के साथ अन्याय न हो।
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