by admin@bebak24.com on | 2026-07-15 18:59:42
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नई दिल्ली (बेबाक24): सोशल एक्टिविस्ट और 'थ्री इडियट्स' फिल्म के प्रेरणास्रोत सोनम वांगचुक (Sonam Wangchuk) दिल्ली के जंतर-मंतर पर पिछले 18 दिनों से भूख हड़ताल पर हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित धांधली और पेपर लीक के खिलाफ शुरू हुए इस युवा आंदोलन में शामिल होने के बाद से वांगचुक का वजन करीब साढ़े आठ किलो गिर चुका है, जिससे उनकी सेहत को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।
इस बीच, देश के सियासी गलियारों में एक बड़ा सवाल तैर रहा है—नीट (NEET) और पेपर लीक के मुद्दे पर सरकार को लगातार घेरने वाले लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी अभी तक इस अनशन स्थल से दूर क्यों हैं? विपक्षी दलों के कई नेताओं के जंतर-मंतर पहुंचने के बाद अब कांग्रेस और राहुल गांधी की इस 'दूरी' पर सवाल उठने लगे हैं। 'बेबाक24' की यह विशेष राजनीतिक विश्लेषण रिपोर्ट:
इस आंदोलन की तुलना साल 2011 में हुए अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से की जा रही है:
विपक्ष की भूमिका में अंतर: 2011 में जब कांग्रेस केंद्र की सत्ता में थी, तब तत्कालीन मुख्य विपक्षी पार्टी बीजेपी ने अन्ना आंदोलन का खुलकर और सीधा समर्थन किया था।
सोनम वांगचुक की चेतावनी: वांगचुक ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि अगर विपक्ष (विशेषकर कांग्रेस) युवाओं के इस स्वतःस्फूर्त आंदोलन का समर्थन नहीं करता है, तो जनता इसे उनकी "संकीर्ण सोच" मानकर उन्हें खारिज कर देगी।
वरिष्ठ पत्रकारों के सवाल: वरिष्ठ पत्रकार निखिल वागले ने सोशल मीडिया पर सीधा सवाल दागा कि जब वाम मोर्चा, टीएमसी, सपा और शिवसेना जैसी पार्टियां जंतर-मंतर पर समझदारी दिखा रही हैं, तो राहुल गांधी और कांग्रेस इससे पीछे क्यों हैं?
निखिल वागले के सवालों का जवाब देते हुए गुजरात से कांग्रेस के कद्दावर युवा नेता और विधायक जिग्नेश मेवाणी ने पार्टी का रुख साफ किया:
उपेक्षा के आरोपों को नकारा: मेवाणी ने तर्क दिया कि कांग्रेस इस मुद्दे की अनदेखी नहीं कर रही है। कांग्रेस या उसके किसी नेता ने कभी भी इन युवाओं या सोनम वांगचुक के आंदोलन पर सवाल नहीं उठाए हैं।
समानांतर लड़ाई (Parallel Fight): कांग्रेस का कहना है कि वे इसी मुद्दे पर युवाओं के साथ समानांतर लड़ाई लड़ रहे हैं। पार्टी 'छात्रों की गूंज' अभियान चला रही है और 17 जुलाई को देहरादून में राहुल गांधी छात्रों के साथ एक बड़ी जनसभा करने वाले हैं। कांग्रेस सीधे तौर पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रही है।
भले ही कांग्रेस नेतृत्व सीधे तौर पर मंच पर नहीं गया हो, लेकिन पार्टी के वरिष्ठ सांसद शशि थरूर ने आंदोलनकारी युवाओं के नाम एक बेहद संवेदनशील और भावुक खुला पत्र लिखा है:
व्यक्तिगत जुड़ाव: थरूर ने लिखा, "मैं एक मध्यमवर्गीय परिवार से आता हूं जहां योग्यता (Merit) कोई नारा नहीं, बल्कि आगे बढ़ने का इकलौता जरिया थी। जब प्रश्नपत्र लीक होते हैं और परीक्षाएं रद्द होती हैं, तो अमीर और प्रभावशाली लोगों को फर्क नहीं पड़ता, बल्कि मध्यम और निम्न आय वर्ग के युवाओं के सपने टूटते हैं।"
युवाओं को ढांढस: थरूर ने प्रदर्शनकारी छात्रों से कहा कि देश उनकी पीड़ा को सुन रहा है और उनका गुस्सा कोई अनुशासनहीनता नहीं, बल्कि व्यवस्था के विश्वासघात का दर्द है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस नागरिक आंदोलन से सीधे तौर पर न जुड़ने के पीछे कांग्रेस की अपनी पुरानी रणनीतिक कड़वी यादें (Trauma) हैं:
2011 का डर: 2011 के अन्ना आंदोलन के बाद कांग्रेस को केंद्र की सत्ता गंवानी पड़ी थी और दिल्ली में 15 साल पुराना उसका शासन उखड़ गया था। इसका सीधा फायदा बीजेपी और आम आदमी पार्टी (AAP) जैसी नई ताकतों को मिला।
सीजेपी (CJP) का उभार: इस आंदोलन की शुरुआत कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने की है। कांग्रेस के रणनीतिकारों को डर है कि कहीं बीजेपी विरोधी माहौल का पूरा सियासी फायदा कांग्रेस को मिलने के बजाय एक बार फिर किसी तीसरे या नए राजनीतिक दल (जैसे सीजेपी) के खाते में न चला जाए।
गठबंधन सहयोगियों का दबाव: शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे ने तो राहुल गांधी से जंतर-मंतर जाने की अपील की है और खुद भी 20 जुलाई को दिल्ली पहुंचने वाले हैं। इसके बावजूद कांग्रेस फिलहाल इस पर फूंक-फूंक कर कदम रख रही है।
| राजनीतिक दल / नेता | आंदोलन को लेकर वर्तमान रुख और गतिविधियां |
| सोनम वांगचुक | 18 दिनों से भूख हड़ताल पर; विपक्ष से "संकीर्ण सोच" छोड़कर समर्थन की मांग। |
| राहुल गांधी / कांग्रेस | सीधे अनशन स्थल से दूरी; हालांकि 'छात्रों की गूंज' और संसद में नीट पर लगातार आक्रामक। |
| जिग्नेश मेवाणी | दलील दी कि कांग्रेस युवाओं के खिलाफ नहीं, बल्कि उनके समानांतर ही मजबूत लड़ाई लड़ रही है। |
| शशि थरूर (कांग्रेस) | युवाओं और वांगचुक के समर्थन में भावुक खुला पत्र जारी किया। |
| अन्य विपक्षी दल (AAP, TMC, शिवसेना, CPI) | संजय सिंह, आतिशी, महुआ मोइत्रा और उद्धव ठाकरे जैसे नेताओं ने खुलकर जंतर-मंतर जाकर समर्थन दिया। |
सोनम वांगचुक का आंदोलन और इस पर कांग्रेस की सतर्कता भारतीय राजनीति की एक बड़ी व्यावहारिक सच्चाई को बयां करती है। कांग्रेस अच्छी तरह जानती है कि गैर-राजनीतिक नागरिक आंदोलन कई बार पारंपरिक राजनीतिक दलों की जमीन खिसका देते हैं। राहुल गांधी 'भारत जोड़ो यात्रा' के बाद से खुद को जनता और जन-सरोकारों के बेहद करीब दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में सोनम वांगचुक और देश के लाखों छात्रों की मांग के साथ खड़े न होना उनकी साख पर सवाल तो जरूर खड़ा करता है।
बेबाक24 का मानना है कि युवाओं के भविष्य (पेपर लीक) जैसे संवेदनशील मुद्दे पर कांग्रेस को केवल 'समानांतर लड़ाई' का बहाना बनाकर दूरी नहीं रखनी चाहिए। नेता प्रतिपक्ष होने के नाते राहुल गांधी की जिम्मेदारी सिर्फ संसद तक सीमित नहीं है, बल्कि सड़क पर संघर्ष कर रहे देश के नागरिकों को भी यह भरोसा देना है कि विपक्ष उनके हक की लड़ाई के लिए किसी भी मंच पर खड़ा होने से नहीं हिचकिचाएगा।
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