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केजीएमयू के हॉस्टल मेस में नॉन-वेज पर रोक; राजभवन के दौरे के बाद यूनिवर्सिटी का फैसला, प्रवक्ता बोले— 'लिखित आदेश नहीं, केवल मौखिक एडवाइज़री'

by on | 2026-07-14 22:05:00

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केजीएमयू के हॉस्टल मेस में नॉन-वेज पर रोक; राजभवन के दौरे के बाद यूनिवर्सिटी का फैसला, प्रवक्ता बोले— 'लिखित आदेश नहीं, केवल मौखिक एडवाइज़री'

लखनऊ (बेबाक24): उत्तर प्रदेश के सबसे प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थानों में शुमार किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) से एक बड़ा और संवेदनशील फैसला सामने आया है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने अपने सभी 18 हॉस्टलों के मेस में मांसाहारी (नॉन-वेज) खाना पकाने और परोसने पर रोक लगा दी है।

हालांकि, यूनिवर्सिटी ने साफ किया है कि कैंपस में नॉन-वेज खाने पर पूरी तरह प्रतिबंध नहीं है, बल्कि यह मेस के लिए जारी की गई एक मौखिक एडवाइज़री है। यह फैसला उत्तर प्रदेश की राज्यपाल और केजीएमयू की कुलाधिपति आनंदीबेन पटेल की टिप्पणी के ठीक अगले दिन सामने आया है, जिससे इस पर सियासी और सामाजिक चर्चा तेज हो गई है। 'बेबाक24' की विशेष ग्राउंड रिपोर्ट:

यूनिवर्सिटी का तर्क: "लिखित आदेश नहीं, पनीर और चने जैसे विकल्प देने की सलाह"

इस फैसले को लेकर छात्रों और मीडिया में मचे हड़कंप के बीच केजीएमयू के प्रवक्ता डॉ. केके सिंह ने स्थिति स्पष्ट की है:

  • केवल मेस के लिए रोक: डॉ. सिंह ने बताया, "कैंपस में कुल 18 हॉस्टल हैं, जिनमें करीब 2,500 छात्र रहते हैं। हमने केवल यूनिवर्सिटी द्वारा संचालित और को-ऑपरेटिव मेस को मौखिक रूप से सलाह दी है कि वे मेस के भीतर नॉन-वेज न बनाएं। इसकी जगह छात्रों को पनीर, न्यूट्रिला और चने जैसे पौष्टिक शाकाहारी विकल्प दिए जाएं।"

  • ऑनलाइन ऑर्डर की छूट: प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि छात्रों के कमरे में खाने पर कोई पाबंदी नहीं है। छात्र चाहें तो बाहर से ऑनलाइन फूड डिलीवरी ऐप्स के जरिए नॉन-वेज मंगाकर अपने कमरों में खा सकते हैं। इसके अलावा, एमडी (MD) छात्रों के सैटेलाइट फ्लैट्स वाले हॉस्टलों में, जहां निजी किचन हैं, वहां ऐसी कोई रोक नहीं है।

  • कोई लिखित आदेश नहीं: प्रवक्ता ने जोर देकर कहा कि न तो यूनिवर्सिटी ने कोई लिखित सर्कुलर जारी किया है और न ही सरकार या राजभवन की ओर से ऐसा कोई लिखित निर्देश मिला है।

राज्यपाल आनंदीबेन पटेल की टिप्पणी से जुड़ा घटनाक्रम

यूनिवर्सिटी भले ही इसे एक सामान्य एडवाइज़री बता रही हो, लेकिन टाइमिंग को लेकर इसे सीधे राजभवन की सख्ती से जोड़कर देखा जा रहा है:

  • दीक्षांत समारोह में लगी थी क्लास: 13 जुलाई 2026 को केजीएमयू के 22वें दीक्षांत समारोह के दौरान राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने अपने संबोधन में हॉस्टल मेस की अव्यवस्था का जिक्र किया था। उन्होंने कहा था, "राजभवन की टीम ने विश्वविद्यालय के तीन मेस का औचक निरीक्षण किया और पाया कि वहां नॉन-वेज बनाया जाता है। यही नहीं, एक मेस में एक्सपायर्ड (तारीख निकले हुए) मसालों का भी धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जा रहा था।"

  • लोहिया संस्थान का भी जिक्र: केजीएमयू प्रवक्ता ने स्वीकार किया कि राज्यपाल ने इससे पहले 15 जून को डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान के दीक्षांत समारोह में भी हॉस्टलों में हफ्ते में दो दिन नॉन-वेज परोसे जाने पर नाराजगी जताई थी। राजभवन के इसी कड़े रुख को भांपते हुए केजीएमयू प्रशासन ने अगले ही दिन यह कदम उठा लिया।

केजीएमयू हॉस्टल मेस विवाद: मुख्य फैक्ट्स

मुख्य बिंदु / क्षेत्रकेजीएमयू प्रशासन का फैसला और फैक्ट्स
संस्थान और छात्रकिंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU), लखनऊ; करीब 2,500 हॉस्टल छात्र प्रभावित।
कार्रवाई का स्वरूप14 जुलाई 2026 से मेस में नॉन-वेज पकाने/परोसने पर मौखिक रोक (एडवाइज़री)।
वैकल्पिक व्यवस्थाछात्रों के लिए पनीर और चने के व्यंजन; ऑनलाइन ऑर्डर कर कमरे में खाने की छूट।
विवाद की पृष्ठभूमि13 जुलाई को राज्यपाल आनंदीबेन पटेल द्वारा मेस में नॉन-वेज और एक्सपायर्ड मसालों पर जताई गई नाराजगी।

बेबाक24 टेक

मेडिकल के छात्रों के मेस में खान-पान को लेकर लिया गया यह फैसला व्यक्तिगत स्वतंत्रता और प्रशासनिक अनुशासन के बीच एक नई बहस को जन्म देता है। डॉक्टर बनने की पढ़ाई कर रहे छात्रों के लिए प्रोटीन और संतुलित पोषण बेहद जरूरी है, और देश के कोने-कोने से आने वाले छात्रों की खान-पान की आदतें अलग-अलग होती हैं। मेस में साफ-सफाई और एक्सपायर्ड मसालों पर राजभवन की सख्ती बिल्कुल जायज है, लेकिन उसकी आड़ में सीधे मेन्यू से नॉन-वेज को गायब कर देना व्यावहारिक से ज्यादा एक 'पॉलिटिकल करेक्टनेस' (राजनीतिक संकोच) का कदम नजर आता है।

बेबाक24 का मानना है कि केजीएमयू प्रशासन ने लिखित आदेश न जारी करके खुद के लिए एक सेफ एग्जिट (बचाव का रास्ता) रखा है। छात्रों को ऑनलाइन ऑर्डर करने की छूट देना यह साबित करता है कि पाबंदी पूरी तरह तार्किक नहीं है, क्योंकि इससे छात्रों की जेब पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा। लोकतांत्रिक और शैक्षणिक संस्थानों में छात्रों की डाइट का फैसला उनकी को-ऑपरेटिव समितियों पर छोड़ दिया जाना चाहिए, बशर्ते वहां स्वच्छता के मानकों का कड़ाई से पालन हो।



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