by admin@bebak24.com on | 2026-07-12 21:36:45
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बांकीपुर ब्यूरो (बेबाक24): बिहार की राजनीति में इस समय सबसे बड़ा और दिलचस्प मुकाबला पटना जिले की बांकीपुर विधानसभा सीट पर होने जा रहा है, जहाँ आगामी 30 जुलाई 2026 को उप-चुनाव के लिए वोट डाले जाएंगे। तीन दशकों से भारतीय जनता पार्टी (BJP) का अभेद्य किला रही इस शहरी सीट पर इस बार जनसुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने खुद चुनावी मैदान में उतरकर मुकाबले को बेहद रोमांचक और त्रिकोणीय बना दिया है।
यह सीट बीजेपी के पूर्व विधायक नितिन नबीन के बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद खाली हुई है। ऐन वक्त पर बीजेपी द्वारा अपना उम्मीदवार बदलने और जमीनी स्तर पर बदहाल नागरिक सुविधाओं को लेकर 'बेबाक24' की विशेष ग्राउंड रिपोर्ट:
चुनावी रणनीतिकार से राजनेता बने प्रशांत किशोर बांकीपुर की गलियों में लगातार पदयात्रा और डोर-टू-डोर जनसंपर्क अभियान चला रहे हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में 238 सीटों पर लड़कर 3.4% वोट पाने वाली जनसुराज के लिए यह चुनाव साख का सवाल है। प्रशांत किशोर का कहना है, "बांकीपुर का चुनाव केवल एक विधानसभा का चुनाव नहीं है, बल्कि यह नीतीश-सम्राट सरकार के कामकाज पर जनता का सीधा जनमत संग्रह है।"
स्थानीय बनाम राष्ट्रीय: मंदिरी इलाके के रिक्शा चालक हरी महतो कहते हैं, "प्रशांत किशोर अच्छे आदमी हैं, लेकिन उनका मार्केट अभी नहीं है। हमें गरीब की बात सुनने वाला नेता चाहिए।" वहीं, श्याम सुंदर यादव का मानना है, "प्रशांत किशोर राष्ट्रीय नेता हो सकते हैं, लेकिन हमें तो लोकल नेता चाहिए, जो हमारी गली-मोहल्ले को जाने। हमारे लिए बीजेपी ही ठीक है।"
बांकीपुर में बीजेपी को उस वक्त बड़ा झटका लगा जब पार्टी को घोषित उम्मीदवार बदलना पड़ा। इस ड्रामे ने नितिन नबीन के 'होमवर्क' पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं:
पारिवारिक कारणों का बहाना: बीजेपी ने पहले नितिन नबीन के करीबी और 26 साल पुराने कार्यकर्ता अभिषेक कुमार सिन्हा को टिकट दिया था, जिन्होंने नामांकन भी कर दिया था। लेकिन 10 जुलाई को अचानक उन्होंने नाम वापस ले लिया।
चारा घोटाले का कनेक्शन: राजनीतिक गलियारों और मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अभिषेक के माता-पिता (चंचला सिन्हा और रविंद्र प्रसाद) सीबीआई (CBI) द्वारा चारा घोटाले के मामलों में दोषी पाए जा चुके हैं। इस विवाद और शैक्षणिक योग्यता पर उठे सवालों के बाद पार्टी ने डैमेज कंट्रोल किया।
बूथ कार्यकर्ता पर दांव: अभिषेक का नाम कटने के बाद बीजेपी ने एक बेहद साधारण, बूथ स्तर के कार्यकर्ता नीरज कुमार सिन्हा को मैदान में उतारा है, जो टिकट मिलने की घोषणा के वक्त पोलिंग बूथ की पर्चियां बना रहे थे। वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि इससे बीजेपी के कमिटेड कायस्थ वोटबैंक पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा, क्योंकि यह जनसंघ के जमाने से बीजेपी का गढ़ है।
राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने एक बार फिर रेखा गुप्ता पर भरोसा जताया है, जो 2025 के चुनाव में नितिन नबीन से 51 हजार वोटों से हारकर दूसरे स्थान पर रही थीं।
जातीय समीकरण का दावा: रेखा गुप्ता का साफ कहना है, "बांकीपुर कायस्थ बहुल नहीं बल्कि वैश्य बहुल सीट है। इस बार अति-पिछड़ा की बेटी नंबर वन पर रहेगी। प्रशांत किशोर के लड़ने से आरजेडी को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला।"
बांकीपुर का इतिहास गौरवशाली रहा है। यहाँ से 1962 में कृष्ण वल्लभ सहाय और 1967 में महामाया प्रसाद सिन्हा चुनाव जीतकर बिहार के मुख्यमंत्री बने थे। खुद नितिन नबीन यहां से 5 बार विधायक और नगर विकास मंत्री रहे, लेकिन जमीनी हकीकत शर्मनाक है:
गलियों में कैद लोग: कदमकुआं, राजेंद्र नगर और मीठापुर जैसे पॉश और महत्वपूर्ण इलाकों में जरा सी बारिश होते ही बाढ़ जैसे हालात हो जाते हैं।
मीठापुर की पत्थर गली में 44.37 लाख रुपये की लागत से नाली निर्माण के लिए 11 जून को सड़क खोदकर छोड़ दी गई। स्थानीय निवासी संजय कुमार कहते हैं, "ठेकेदार बहुत पतली छड़ें डाल रहा है। सड़कें खुदी पड़ी हैं, बच्चे गड्ढों में गिर रहे हैं और गंदा पानी बीमारियों को न्योता दे रहा है।"
एसके पुरी के निशांत कुमार पूछते हैं, "जगह-जगह कूड़ा है, बसावन पार्क बदहाल है। इसे देखकर लगता है कि यह पटना का पॉश इलाका है?"
| मुख्य उम्मीदवार / पार्टी | रणनीतिक दांव और ताकत | कमजोरी / चुनौती |
| नीरज कुमार सिन्हा (BJP) | बीजेपी का 30 साल पुराना पारंपरिक गढ़ और कायस्थ वोटबैंक का मजबूत आधार। | ऐन वक्त पर उम्मीदवार बदलना और बुनियादी नागरिक सुविधाओं (सड़क, नाली) को लेकर भारी एंटी-इंकंबेंसी। |
| प्रशांत किशोर (जनसुराज) | आक्रामक डोर-टू-डोर कैंपेन, बड़ा चेहरा, युवाओं में पैठ और सरकार विरोधी लहर को भुनाने की कोशिश। | बांकीपुर में नया चेहरा होना; शहरी वोटर्स का बीजेपी के प्रति पुराना झुकाव। |
| रेखा गुप्ता (RJD) | वैश्य और अति-पिछड़ा कार्ड, पार्टी का मजबूत कैडर और लालू-तेजस्वी का मुख्य वोटबैंक। | पिछली बार 51 हजार से अधिक वोटों के अंतर से करारी हार का मनोवैज्ञानिक दबाव। |
वोटिंग का कड़वा सच: बांकीपुर की सबसे बड़ी समस्या यहाँ का कम मतदान प्रतिशत है। साल 2020 में यहाँ मात्र 37% और 2025 में सिर्फ 41% वोटिंग हुई थी। शहरी मतदाताओं की यह बेरुखी किस करवट बैठेगी, यह 30 जुलाई को तय होगा।
बांकीपुर का यह उप-चुनाव बिहार की भविष्य की राजनीति की दिशा तय करने वाला है। प्रशांत किशोर ने सीधे बीजेपी के सबसे मजबूत किले में हाथ डाला है। अगर पीके यहाँ सम्मानजनक वोट लाते हैं या कोई उलटफेर करते हैं, तो यह 2025-26 की स्थापित राजनीति के लिए खतरे की घंटी होगी। लेकिन बीजेपी के लिए यह सीट उनकी प्रतिष्ठा का सवाल है। एक बूथ कार्यकर्ता को टिकट देकर बीजेपी ने कैडर को रीचार्ज करने की कोशिश की है, लेकिन चारा घोटाले के डर से उम्मीदवार बदलने की नौबत आना पार्टी के आंतरिक समन्वय की पोल खोलता है।
बेबाक24 का मानना है कि राजनेताओं की बड़ी-बड़ी कूटनीति के बीच बांकीपुर के आम नागरिकों की सुध लेने वाला कोई नहीं है। देश के वीवीआईपी चेहरों (शत्रुघ्न सिन्हा, रविशंकर प्रसाद आदि) के घरों वाले इस क्षेत्र में अगर जुलाई की बारिश में नाली और जल-जमाव मुख्य मुद्दा है, तो यह पिछले 30 साल के नेतृत्व की विफलता है। देखना होगा कि बांकीपुर की जनता इस बार 'कमिटेड वोटिंग' के ढर्रे पर चलती है या प्रशांत किशोर के सुराज के वादे पर भरोसा जताती है।
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