by admin@bebak24.com on | 2026-07-05 21:31:01
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नेशनल डेस्क (बेबाक24): अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावा चोरी (Ram Mandir Donation Theft Case) के मामले में विश्व हिंदू परिषद (VHP) के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार द्वारा पुलिस को लिखे गए पत्र पर अब नया सियासी संग्राम छिड़ गया है। वीएचपी अध्यक्ष द्वारा जांच अधिकारी (IO) को पत्र लिखकर जिन विपक्षी नेताओं के बयान दर्ज करने की मांग की गई थी, उनमें शामिल आम आदमी पार्टी (AAP) के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने इस पर बेहद आक्रामक और बेबाक अंदाज में पलटवार किया है।
संजय सिंह ने वीएचपी पर सीधे 'चुनिंदा राजनीति' करने का आरोप लगाते हुए कहा कि संगठन ने अपने पत्र में उन तमाम बड़े नामों को जानबूझकर छिपा दिया है, जो खुद राम मंदिर ट्रस्ट या बीजेपी (BJP) से जुड़े हुए हैं और जिन्होंने चोरी की बात खुलेआम स्वीकारी है।
संजय सिंह ने मीडिया से बातचीत करते हुए वीएचपी के पत्र की विश्वसनीयता पर ही गंभीर सवाल खड़े कर दिए। उन्होंने तंज कसते हुए कहा:
संजय सिंह का तीखा बयान:
"विश्व हिंदू परिषद ने जो पत्र पुलिस को लिखा है, उसमें भी उन्होंने चोरी कर ली है! उन्होंने सबके नाम चुरा लिए और छिपा दिए हैं। राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा जी ने खुद कहा था कि मंदिर में चोरी नहीं, बल्कि डकैती हुई है। वीएचपी ने उनका नाम इस पत्र में क्यों नहीं लिखा? उनसे भी तो पुलिस को पूछताछ करनी चाहिए कि उनके पास डकैती के क्या सबूत हैं? वह तो खुद ट्रस्ट के सबसे जिम्मेदार आदमी हैं।"
सांसद संजय सिंह ने उन तमाम हिंदू संतों और दक्षिणपंथी नेताओं की सूची सामने रखी, जिन्होंने इस चढ़ावा चोरी मामले पर अपनी नाराजगी और चिंता व्यक्त की थी, लेकिन उनके नाम वीएचपी के मांग-पत्र से गायब हैं:
बीजेपी नेताओं की अनदेखी: संजय सिंह ने कहा कि पत्र में विनय कटियार और धरमदास जी जैसे फायरब्रांड बीजेपी नेताओं का नाम शामिल नहीं है, जबकि वे भी इस अव्यवस्था पर सवाल उठा चुके हैं।
शंकराचार्य और कमलनैन दास का जिक्र: उन्होंने आगे कहा, "शंकराचार्य जी और रजनीश जी के पास भी इस मामले से जुड़े पुख्ता सबूत हैं। यहां तक कि कमलनैन दास जी ने भी सार्वजनिक रूप से कहा है कि मंदिर में चोरी हुई है, लेकिन आलोक कुमार जी के पत्र में इनमें से किसी भी पूजनीय संत का नाम नहीं है।"
राजनीति का आरोप: 'आप' नेता ने कहा कि अपनी ही विचारधारा के लोगों और ट्रस्ट के अधिकारियों के नाम जानबूझकर छिपाकर सिर्फ विपक्ष के कुछ चुनिंदा नाम लिखना यह साफ करता है कि वीएचपी इस गंभीर मुद्दे पर केवल और केवल घटिया राजनीति करना चाहती है, जो कि बिल्कुल ठीक नहीं है।
संजय सिंह ने अयोध्या पुलिस के जांच अधिकारी (Investigating Officer) को खुली चुनौती देते हुए कहा कि वे जांच से भागने वाले नहीं हैं। उन्होंने स्पष्ट किया:
"अगर मामले के आईओ मुझे पूछताछ के लिए बुलाते हैं, तो मैं सहर्ष जाऊंगा। लेकिन मैं अकेला नहीं जाऊंगा, मैं अपने साथ उन सभी लोगों और संतों को लेकर आऊंगा जो चिल्ला-चिल्लाकर कह रहे हैं कि रामलला की चांदी चोरी हो गई, सोना चोरी हो गया। दूध का दूध और पानी का पानी वहीं हो जाएगा।"
संजय सिंह का यह पलटवार विश्व हिंदू परिषद (VHP) की कूटनीतिक घेराबंदी को पूरी तरह तार-तार करने वाला है। राजनीति और कानूनी लड़ाई का यह नियम है कि जब आप किसी को घेरने के लिए जाल बिछाते हैं, तो यह सुनिश्चित करना होता है कि उसमें आपकी अपनी ही नाव न फंस जाए। वीएचपी अध्यक्ष आलोक कुमार ने विपक्षी नेताओं के बयानों को आधार बनाकर पुलिस से जांच की मांग की थी, लेकिन संजय सिंह ने नृपेंद्र मिश्रा (निर्माण समिति अध्यक्ष) के 'डकैती' वाले बयान और अयोध्या के प्रतिष्ठित संतों के बयानों को सामने रखकर पासा पूरी तरह पलट दिया है।
'बेबाक24' का मानना है कि संजय सिंह का यह तर्क बेहद वजनदार है— यदि जांच केवल बयानों और दावों के आधार पर होनी है, तो कानून की नजर में ट्रस्ट के अंदरूनी पदाधिकारियों और पूजनीय संतों के बयान विपक्ष के नेताओं से कहीं ज्यादा अहम और प्राथमिक होने चाहिए। अगर राम मंदिर निर्माण के कर्ता-धर्ता नृपेंद्र मिश्रा खुद सुरक्षा और वित्तीय ढांचे पर सवाल उठा रहे हैं, तो जांच की शुरुआत वहीं से होनी चाहिए। वीएचपी द्वारा केवल विपक्षी नेताओं (केजरीवाल, प्रियंका गांधी, संजय सिंह) को टारगेट करना इस मामले को एक निष्पक्ष जांच के बजाय 'पॉलिटिकल टूल' (Political Tool) में तब्दील करता हुआ दिख रहा है। अब देखना यह है कि अयोध्या के डीएसपी आशुतोष तिवारी इस राजनीतिक नूराकुश्ती के बीच निष्पक्षता की लकीर कैसे खींच पाते हैं।
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