by admin@bebak24.com on | 2026-07-05 21:27:05
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नेशनल डेस्क (बेबाक24): अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावा चोरी (Ram Mandir Donation Theft Case) के मामले पर मचे देशव्यापी सियासी घमासान के बीच अब इसमें एक नया कानूनी और प्रशासनिक मोड़ आ गया है। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) यानी सीपीआई (एम) के राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास (John Brittas) ने सीधे केंद्र सरकार को इस विवाद में घसीट लिया है।
सांसद ब्रिटास ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को एक आधिकारिक पत्र लिखकर मांग की है कि 'श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट' को तत्काल सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम, 2005 के दायरे में लाया जाए, ताकि जनता के प्रति इसकी जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सके।
सांसद जॉन ब्रिटास ने शनिवार (4 जुलाई 2026) को गृह मंत्री अमित शाह को भेजे पत्र की प्रतियों को अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल 'एक्स' (पहले ट्विटर) पर साझा किया। उन्होंने सिलसिलेवार तरीके से सरकार के उस तर्क को खारिज किया जिसमें ट्रस्ट को एक निजी या पूर्णतः स्वतंत्र संस्था बताया जाता है:
सांसद जॉन ब्रिटास का बेबाक तर्क:
"सरकार ने एक सरकारी अनुमोदित योजना के तहत श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन किया। संसद के एक विशेष कानून के तहत अधिग्रहित की गई बेशकीमती भूमि को इस ट्रस्ट को सौंप दिया। इतना ही नहीं, इसके प्रशासनिक ढांचे को चलाने के लिए सरकार के प्रतिनिधि के रूप में वर्तमान में कार्यरत आईएएस (IAS) अधिकारियों को नामित किया गया। और अब सरकार यह अजीब दावा कर रही है कि उसकी इसमें कोई भूमिका नहीं है और यह ट्रस्ट आरटीआई अधिनियम के दायरे से पूरी तरह बाहर है!"
35 पन्नों के तर्कों और अधिसूचनाओं का हवाला देते हुए ब्रिटास ने स्पष्ट किया कि ट्रस्ट का गठन किसी निजी समूह ने नहीं, बल्कि पूरी तरह सरकारी मशीनरी ने किया था:
स्वायत्तता के नाम पर पर्दा नहीं: उन्होंने लिखा कि सिर्फ किसी ट्रस्ट को कागजों पर 'स्वायत्त' (Autonomous) घोषित कर देने से जनता के प्रति वित्तीय पारदर्शिता की बलि नहीं चढ़ाई जा सकती।
नवंबर 2019 के फैसले का जिक्र: उन्होंने याद दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट के नवंबर 2019 के ऐतिहासिक अयोध्या फैसले के अनुपालन में खुद केंद्र सरकार ने ट्रस्ट को संचालित करने के लिए एक विस्तृत योजना बनाई थी। एक आधिकारिक सरकारी नोटिफिकेशन (Government Notification) के जरिए इसका गठन हुआ था।
15 में से 12 सदस्य सरकारी: ब्रिटास ने अपने पत्र में इस बात को विशेष रूप से रेखांकित किया कि शुरुआत में राम मंदिर ट्रस्ट के कुल 15 सदस्यों में से 12 सदस्यों को सीधे केंद्र सरकार ने ही नॉमिनेट (नामित) किया था, जो इसके पूरी तरह सार्वजनिक और सरकारी नियंत्रण वाले स्वरूप को प्रमाणित करता है।
चंदा चोरी और चढ़ावे की हेरफेर के आरोपों के बीच राम मंदिर ट्रस्ट को आरटीआई (RTI) के दायरे में लाने की यह मांग बेहद गंभीर और रणनीतिक है। वामपंथी सांसद जॉन ब्रिटास ने सीधे उस तकनीकी लूपहोल पर चोट की है, जिसका इस्तेमाल करके अब तक ट्रस्ट अपनी वित्तीय बैलेंस शीट और आंतरिक फैसलों को सार्वजनिक ऑडिट से दूर रखता आया है। जब देश की जनता ने मंदिर के लिए हजारों करोड़ रुपये का दान दिया है, और खुद आरएसएस के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने माना है कि चोरी से 'राम भक्तों की भावना आहत हुई है', तो ऐसे में पारदर्शिता का विरोध करना सरकार की साख को बट्टा लगा सकता है।
'बेबाक24' का मानना है कि जॉन ब्रिटास का यह तर्क कानूनी रूप से बेहद मजबूत है— जब किसी ट्रस्ट का गठन सरकारी गजट (Notification) के जरिए हुआ हो, उसकी जमीन संसद के कानून से मिली हो और उसके बोर्ड में सीनियर आईएएस अफसर (जैसे अयोध्या के कमिश्नर या जिलाधिकारी) बतौर सरकारी नुमाइंदे बैठते हों, तो उसे आरटीआई अधिनियम की धारा 2(h) के तहत 'पब्लिक अथॉरिटी' (Public Authority) मानने से इनकार करना कूटनीतिक रूप से बेमानी है। गृह मंत्री अमित शाह और मोदी सरकार को अब यह तय करना होगा कि वे इस मांग को 'विपक्षी प्रोपेगैंडा' कहकर खारिज करेंगे या करोड़ों राम भक्तों के भरोसे को और मजबूत करने के लिए ट्रस्ट के खातों को सूचना के अधिकार के तहत पूरी तरह पारदर्शी बनाएंगे।
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