by admin@bebak24.com on | 2026-07-05 11:45:07
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सांस्कृतिक डेस्क (बेबाक24): छत्तीसगढ़ की माटी की महक और लोक कला 'पंडवानी' (Pandavani) को सात समंदर पार देश-दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचाने वाली महान लोक गायिका, अद्वितीय अदाकारा और पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई (Dr. Teejan Bai) का रविवार (5 जुलाई 2026) तड़के निधन हो गया। वह 70 वर्ष की थीं और पिछले काफी समय से गंभीर अस्वस्थता से जूझ रही थीं।
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) रायपुर के अनुसार, तीजन बाई ने रविवार सुबह करीब 3.15 बजे अस्पताल में अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर से कला, रंगमंच और संगीत जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।
तीजन बाई का जन्म छत्तीसगढ़ के पाटन अटारी गांव में 8 अगस्त 1956 को लोकपर्व 'तीज' के पावन दिन हुआ था, जिसके कारण माता-पिता ने उनका नाम 'तीजन' रखा। उनकी मां सुखवती देवी और पिता हुनुकलाल पारधी थे। तीजन का बचपन घोर आर्थिक तंगहाली और सामाजिक अभावों के बीच बीता।
आपराधिक जनजाति का दंश: तीजन बाई जिस 'पारधी' (पारंपरिक शिकारी) समुदाय से आती थीं, उसे अंग्रेजों ने 'अपराधिक जनजाति अधिनियम 1871' के तहत अपराधी घोषित कर रखा था। हालांकि, पंडित जवाहरलाल नेहरू के प्रयासों से 31 अगस्त 1952 को यह क्रूर कानून निरस्त हुआ, लेकिन 1972 के 'वन्यजीव संरक्षण अधिनियम' ने इस जाति के पारंपरिक रोजगार (शिकार) को पूरी तरह बंद कर दिया, जिससे पूरा समाज दिहाड़ी मजदूरी के चक्रव्यूह में फंस गया।
नाना से मिली प्रेरणा: ऐसे दबे-कुचले परिवेश के बीच, नन्हीं तीजन ने एक दिन अपने वृद्ध नाना बृजलाल पारधी को तंबूरा लेकर पंडवानी गाते सुना। वह इस विधा से इस कदर मंत्रमुग्ध हुईं कि मात्र 9 वर्ष की उम्र से ही उन्होंने छिप-छिपकर पंडवानी सीखना शुरू कर दिया।
जिस दौर में छत्तीसगढ़ में पंडवानी गायन पर केवल पुरुषों का एकाधिकार था और महिलाओं के लिए यह मंच पूरी तरह प्रतिबंधित था, उस दौर में तीजन बाई ने स्थापित रूढ़ियों को चुनौती दी। इस दुस्साहस की उन्हें अपनी निजी जिंदगी में बहुत भारी और दर्दनाक कीमत चुकानी पड़ी:
घर से निकाला गया: समाज और परिवार ने उनका कड़ा विरोध किया। सामाजिक प्रतिबंध लगाते हुए उन्हें अपने ही घर से बेदखल कर दिया गया।
टूटे वैवाहिक रिश्ते: पंडवानी गाने की ज़िद और कला के प्रति अटूट समर्पण के कारण उनकी पहली शादी टूट गई। इसके बाद दूसरी और फिर तीसरी शादी में भी इसी कला के कारण दरारें आईं। तीन जीवनसाथियों ने उनका साथ छोड़ा, उन्होंने अपने दो बेटों और एक दत्तक पुत्री को असमय खोया, मगर तीजन ने अपने हाथ से तंबूरा कभी नीचे नहीं गिरने दिया।
मंच पर शौहर को ललकारा: मात्र 13 वर्ष की उम्र में जब वह चंदखुरी गांव के सतीचौरा चौक पर अपनी पहली सार्वजनिक प्रस्तुति दे रही थीं, तब उनके तत्कालीन पति ने हिंसक अंदाज में मंच पर आकर अभद्र व्यवहार किया। तीजन ने कड़कड़ाती आवाज में तंबूरा तानकर कहा— "तुमने सिर्फ मेरा नहीं, इस मंच और कला का अपमान किया है, आज से तुम मेरे कोई नहीं हो।"
पंडवानी मूलतः सबल सिंह चौहान द्वारा रचित महाभारत पर आधारित पांडवों की शौर्यगाथा है, जिसकी दो शैलियां हैं— वेदमती (बैठकर शास्त्रों के अनुसार गाना) और कापालिक (खड़े होकर, हाथ में तंबूरा लेकर जोश और कल्पना के साथ मंच पर चहलकदमी करना)।
तीजन बाई छत्तीसगढ़ और देश की पहली महिला कलाकार बनीं, जिन्होंने कापालिक शैली में पंडवानी गाने का अभूतपूर्व साहस दिखाया।
इंदिरा गांधी से ऐतिहासिक संवाद:
थियेटर के दिग्गज हबीब तनवीर तीजन बाई के अभिनय और गर्जना से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सामने उनकी प्रस्तुति का आयोजन करवाया। तीजन के दमदार प्रदर्शन को देखकर जब इंदिरा गांधी ने प्रभावित होकर कहा— "आप बहुत अच्छा महाभारत करती हैं।" तो तीजन बाई ने तपाक से अपनी चिरपरिचित बेबाकी के साथ जवाब दिया था— "अम्मा, मैं महाभारत करती नहीं हूँ, मैं महाभारत की कथा सुनाती हूँ।"
इसके बाद दिग्गज निर्देशक श्याम बेनेगल ने अपने ऐतिहासिक दूरदर्शन धारावाहिक 'भारत एक खोज' में तीजन बाई को महाभारत प्रसंग के लिए आमंत्रित किया, जिसके बाद उनकी गूंज भारत के घर-घर तक पहुंच गई।
अनपढ़ होने के बावजूद तीजन बाई ने स्त्री अधिकारों और साक्षरता अभियानों में बढ़-चढ़कर भाग लिया। भिलाई स्टील प्लांट ने साल 1986 में उनकी प्रतिभा का सम्मान करते हुए उन्हें नौकरी दी। उनके कलात्मक जीवन में पुरस्कारों की एक लंबी फेहरिस्त रही:
| सम्मान/पुरस्कार | वर्ष | सम्मानित करने वाली संस्था / पद |
| पद्मश्री | 1988 | भारत सरकार (चौथा सर्वोच्च नागरिक सम्मान) |
| संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार | 1995 | राष्ट्रीय संगीत, नृत्य एवं नाटक अकादमी |
| पद्म भूषण | 2003 | भारत सरकार (तीसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान) |
| डी.लिट्. की मानद उपाधि | 2003 & 2006 | बिलासपुर विश्वविद्यालय और रविशंकर विश्वविद्यालय |
| फुकुओका पुरस्कार (Fukuoka Prize) | 2018 | जापान सरकार (अंतरराष्ट्रीय सम्मान) |
| पद्म विभूषण | 2019 | तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा (द्वितीय सर्वोच्च नागरिक सम्मान) |
तीजन बाई छत्तीसगढ़ की पहली महिला कलाकार थीं, जिन्हें देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'पद्म विभूषण' से नवाजा गया था।
डॉ. तीजन बाई का जाना केवल छत्तीसगढ़ की माटी के लिए नहीं, बल्कि वैश्विक लोक कला जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है। वह केवल एक गायिका नहीं थीं; वह खुद में स्त्री सशक्तिकरण, सामाजिक विद्रोह और कलात्मक जिजीविषा का एक जलता हुआ मशाल थीं। जिस समाज ने उन्हें पंडवानी गाने पर दुत्कारा, प्रताड़ित किया और शादियां तोड़ीं, उसी समाज और देश को तीजन बाई ने अपनी कला के दम पर दुनिया के नक्शे पर ला खड़ा किया। तंबूरे को कभी अर्जुन का गांडीव, कभी भीम की गदा तो कभी कृष्ण की बांसुरी बना देने का जो हुनर उनके पास था, वह सदियों में किसी एक कलाकार को नसीब होता है।
'बेबाक24' का मानना है कि वरिष्ठ कला समीक्षक अशोक वाजपेयी की यह बात आज भी प्रासंगिक है कि तीजन बाई का गायन केवल अतीत की कथा नहीं थी, बल्कि वह महाभारत के प्रसंगों के जरिए आज की सामाजिक-राजनीतिक विसंगतियों पर भी तीखा और बेबाक प्रहार करती थीं। जीवन के आखिरी पड़ाव में भले ही पक्षाघात (Paralysis) और बीमारी के कारण वह गुमसुम हो गई थीं, लेकिन कला के प्रति उनका समर्पण कभी कम नहीं हुआ। जैसा कि उन्होंने खुद एक बार बरामदे में पान चबाते हुए कहा था— "जैसे बंदर का बच्चा मां को पकड़ कर रखता है, वैसे ही मैंने पंडवानी को पकड़ रखा है, पंडवानी ही मेरा बेड़ा पार लगाएगी।" आज तीजन बाई भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन कड़कड़ाती आवाज में गाई गई उनकी 'द्रौपदी चीर हरण' या 'कर्ण वध' की गाथाएं और उनका बेबाक अंदाज़ इस लोक कला के इतिहास में हमेशा अमर रहेगा। 'बेबाक24' परिवार की ओर से महान लोक विदुषी को भावभीनी श्रद्धांजलि।
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