by admin@bebak24.com on | 2026-07-05 11:41:25
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इंटरनेशनल डेस्क (बेबाक24): संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) के स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जांच आयोग ने ग़ज़ा में इसराइली सैन्य अभियानों और फ़लस्तीनी बच्चों की स्थिति को लेकर एक बेहद चौंकाने वाली और गंभीर रिपोर्ट पेश की है। इस आयोग के अध्यक्ष और भारत के प्रतिष्ठित न्यायविद जस्टिस एस मुरलीधर (ओडिशा हाई कोर्ट के पूर्व चीफ़ जस्टिस) ने रिपोर्ट को लेकर उठ रहे सवालों और इसराइल द्वारा लगाए गए 'पक्षपात' के आरोपों पर बेहद कड़ा, तार्किक और बेबाक जवाब दिया है।
इसराइल द्वारा रिपोर्ट को पूरी तरह खारिज करने और जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाने के बाद, जस्टिस मुरलीधर ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बातचीत में इसराइली तंत्र और उसकी सैन्य रणनीति को बेनकाब किया है।
जब जस्टिस मुरलीधर से यह तीखा सवाल पूछा गया कि क्या उन्होंने रिपोर्ट तैयार करते समय इसराइली सेना का पक्ष नहीं लिया? तो उन्होंने बेहद कड़े शब्दों में कहा:
जस्टिस एस मुरलीधर का बेबाक बयान:
"बहुत सारे लोग सवाल करते हैं कि आपने रिपोर्ट तैयार करने में इसराइली सैनिकों से बात नहीं की। मेरा जवाब है कि इसराइली सैनिकों ने तो ख़ुद बात की है— सिर्फ़ हमसे नहीं, बल्कि पूरी दुनिया से। उन्होंने बकायदा फ़लस्तीनी बच्चे को मारकर और उस पर गर्व करते हुए वीडियो बनाए और उन्हें सोशल मीडिया पर पोस्ट किया। एक सैनिक वीडियो में ख़ुद स्वीकार कर रहा है कि उसने 16 साल के बच्चे को मारा है। जब सबूत इंटरनेट पर सरेआम तैर रहे हैं, तो सेना से अलग से पूछने की क्या ज़रूरत है?"
उन्होंने रिपोर्ट में इसराइल के डिप्टी स्पीकर निसिम वतूरी के बयानों का भी हवाला दिया, जिन्होंने 9 अक्तूबर को पोस्ट किया था कि "ग़ज़ा को मिटा दो, वहां एक बच्चे तक को मत छोड़ो।" इतना ही नहीं, 30 जनवरी 2025 को उन्होंने दोबारा कहा कि "ग़ज़ा में जन्म लेने वाला हर बच्चा जन्म के समय से ही आतंकवादी है।" जस्टिस मुरलीधर ने कहा कि जब शीर्ष राजनेताओं और जनप्रतिधियों की ऐसी सोच इंटरनेट पर मौजूद है, तो मंशा पर कोई संदेह नहीं रह जाता।
जस्टिस मुरलीधर ने साफ किया कि आयोग ने पूरी निष्पक्षता के साथ काम किया और कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए इसराइली सरकार को अपनी बात रखने का पूरा मौका दिया था:
ग़ज़ा जाने की नहीं मिली इजाजत: जस्टिस मुरलीधर ने बतौर अध्यक्ष इसराइली अधिकारियों को नोट भेजा था कि आयोग ज़मीनी जांच के लिए ग़ज़ा और कब्ज़े वाले फ़लस्तीनी इलाकों का दौरा करना चाहता है, लेकिन इसराइल ने कोई जवाब नहीं दिया।
अंतिम रिपोर्ट से पहले भेजा ड्राफ्ट: आयोग ने अपनी रिपोर्ट का पहला ड्राफ्ट इसराइल और फ़लस्तीनी अधिकारियों दोनों को भेजा था। फ़लस्तीन ने टिप्पणियां कीं, जिसके बाद सुधार किए गए, लेकिन इसराइल मौन रहा।
पीठ पीछे लगाया पक्षपात का आरोप: जस्टिस मुरलीधर ने बताया कि इसराइली अधिकारियों ने आयोग को कोई आधिकारिक जवाब देने के बजाय, सार्वजनिक रूप से 18 पन्नों का एक खंडन पत्र जारी कर दिया और आयोग पर 'भेदभाव और पक्षपात' का आरोप लगा दिया। उन्होंने चुनौती देते हुए कहा कि अगर इसराइल के पास हमारी रिपोर्ट को गलत साबित करने वाले सबूत हैं, तो वे आज भी उन्हें पेश कर सकते हैं।
ग़ज़ा में सीधे प्रवेश न मिलने के बावजूद रिपोर्ट की विश्वसनीयता को अचूक बनाने के लिए आयोग ने कड़े वैज्ञानिक और फोरेंसिक तौर-तरीके अपनाए। जस्टिस मुरलीधर ने बताया कि यह कोई न्यायिक फैसला नहीं बल्कि एक विस्तृत प्रशासनिक जांच है, जिसका आधार ये ठोस साक्ष्य हैं:
साक्ष्यों के विविध स्रोत: गज़ा से बाहर आने में कामयाब रहे पीड़ितों, चश्मदीदों, घायल बच्चों के निजी बयान, डॉक्टरों की गवाहियां, फोरेंसिक और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य, तथा पत्रकारों की रिपोर्ट।
तकनीकी सत्यापन: हर घटना का भौगोलिक स्थान (Geolocation), सटीक कालक्रम और सैटेलाइट से ली गई तस्वीरों के जरिए घटनास्थल का मिलान किया गया। यह भी जांचा गया कि घटना के वक्त इसराइली सैनिकों की वहां मौजूदगी थी या नहीं।
विशेषज्ञों की फौज: आयोग की 12 सदस्यीय टीम में सैन्य विश्लेषक (जो हथियारों और सैन्य योजनाओं का अध्ययन करते हैं), जेंडर एक्सपर्ट, फोरेंसिक एक्सपर्ट और साइबर क्राइम एक्सपर्ट शामिल थे।
जस्टिस मुरलीधर ने बच्चों की सुरक्षा से जुड़े तीन व्यापक अंतरराष्ट्रीय कानूनों का हवाला देते हुए इसराइल के सैन्य आचरण को कटघरे में खड़ा किया:
उन्होंने स्पष्ट किया कि इन तीनों कानूनों में बच्चों के लिए विशेष सुरक्षात्मक स्थिति तय की गई है। युद्ध के मैदान में भी बच्चे कभी भी 'वैध निशाना' (Valid Target) नहीं हो सकते। जेनेवा कन्वेंशन के मुताबिक, एंबुलेंस पर हमला न करना और सफेद झंडा दिखाने वाले पर गोली न चलाना युद्ध के बुनियादी नियम हैं, जिन्हें मटियामेट कर दिया गया।
युद्ध के कड़वे आंकड़े: हमास के 7 अक्तूबर 2023 के हमले (जिसमें 1200 इसराइली मारे गए थे) के जवाब में शुरू हुए इस युद्ध में अब तक 73 हज़ार से ज़्यादा फ़लस्तीनियों की मौत हो चुकी है, जिनमें 21 हज़ार से ज़्यादा सिर्फ मासूम बच्चे हैं। इन आंकड़ों को संयुक्त राष्ट्र (UN) भी पूरी तरह विश्वसनीय मानता है।
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अक्सर मानवाधिकार रिपोर्टों को 'एकतरफा' कहकर खारिज कर दिया जाता है, लेकिन जस्टिस एस मुरलीधर जैसी कानूनी शख्सियत का इस आयोग का नेतृत्व करना इस रिपोर्ट को एक अकाट्य कानूनी वजन देता है। भारत के सबसे निष्पक्ष और कड़े न्यायाधीशों में शुमार रहे जस्टिस मुरलीधर ने यह साफ कर दिया है कि आधुनिक युद्ध केवल बंदूकों से नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर रील और वीडियो बनाकर लड़ा जा रहा है, जहां खुद हमलावर अपने अपराधों का ढिंढोरा पीट रहे हैं। इसराइल का जांच आयोग को सहयोग न करना और बाद में 'पक्षपात' का रोना रोना उसकी कूटनीतिक कमजोरी को दर्शाता है।
'बेबाक24' का मानना है कि 21 हजार बच्चों की मौत को केवल 'कोलैटरल डैमेज' (युद्ध का अप्रत्याशित नुकसान) कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। जैसा कि जस्टिस मुरलीधर ने बेहद भावुक होकर कहा कि यह जांच इसलिए जरूरी थी ताकि "फ़लस्तीन के बच्चे यह महसूस न करें कि जब वे तकलीफ में थे, तो पूरी दुनिया सो रही थी।" पुतिन के गढ़ में यूक्रेन के ड्रोन हमलों से लेकर मध्य-पूर्व के इस खूनी दलदल तक, साल 2026 वैश्विक व्यवस्था के नैतिक पतन का गवाह बन रहा है। इसराइल को अगर खुद को पाक-साफ साबित करना है, तो उसे बंद कमरों में खंडन पत्र लिखने के बजाय जस्टिस मुरलीधर के आयोग द्वारा उठाए गए तीखे और बेबाक सवालों का डेटा और सबूतों के साथ सामना करना होगा।
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