by admin@bebak24.com on | 2026-07-04 20:12:25
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नेशनल डेस्क (बेबाक24): साल 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए भीषण दंगों के पीछे कथित 'बड़ी साज़िश' (Larger Conspiracy Case) रचने के मामले में जेल में बंद जेएनयू के पूर्व छात्र उमर ख़ालिद (Umar Khalid) और शरजील इमाम (Sharjeel Imam) को अदालत से एक बार फिर बड़ा झटका लगा है। दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट ने शनिवार (4 जुलाई 2026) को दोनों अभियुक्तों की नियमित ज़मानत याचिकाएं पूरी तरह ख़ारिज कर दीं।
यह याचिकाएं दिल्ली पुलिस द्वारा दोनों के ख़िलाफ़ 'ग़ैरक़ानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम' (UAPA) के तहत दर्ज किए गए बेहद गंभीर और संवेदनशील मामले से जुड़ी हुई थीं।
कानूनी समाचार वेबसाइट 'लाइव लॉ' (Live Law) के मुताबिक, कड़कड़डूमा कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (एडिशनल सेशंस जज) समीर बाजपेयी ने दोनों पक्षों की लंबी दलीलें सुनने के बाद शनिवार को ज़मानत अर्जियों को नामंजूर करने का आदेश सुनाया।
सुनवाई के दौरान दोनों अभियुक्तों के कद्दावर वकीलों ने कोर्ट के सामने उन्हें राहत देने के लिए कई कूटनीतिक और मानवीय तर्क रखे:
उमर ख़ालिद का पक्ष: ख़ालिद की ओर से पेश हुए देश के वरिष्ठ वकील त्रिदीप पेस ने अब तक की अदालती घटनाओं और सुप्रीम कोर्ट के पिछले आदेशों का पूरा ब्यौरा सामने रखा। उन्होंने दलील दी कि देश की शीर्ष अदालत ने पूर्व में ज़मानत देने से इनकार करते हुए कहा था कि उमर और शरजील भले ही एक साल तक दोबारा ज़मानत की अर्ज़ी न दें, लेकिन इस दौरान मामले से जुड़े सुरक्षित गवाहों (Protected Witnesses) से पूछताछ की प्रक्रिया को तेज़ी से पूरा किया जाना चाहिए था।
शरजील इमाम का पक्ष: दूसरी ओर, शरजील इमाम की तरफ से पैरवी कर रहे वकील तालिब मुस्तफ़ा ने कोर्ट में 'अंडर-ट्रायल' समय की दुहाई दी। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि उनके मुवक्किल पहले ही एक बहुत लंबा वक्त जेल की कालकोठरी में बिता चुके हैं। इस भारी-भरकम मामले की कानूनी पेचीदगियों को देखते हुए निकट भविष्य में मुक़दमे (Trial) के जल्द ख़त्म होने की कोई दूर-दूर तक संभावना नजर नहीं आ रही है।
सुनवाई के दौरान शरजील इमाम के वकील ने कोर्ट के सामने 'पैरिटी' (समानता का सिद्धांत) का भी हवाला दिया। उन्होंने तर्क दिया कि जब इसी एफआईआर और मामले से जुड़े दूसरे सह-अभियुक्तों को अदालत से बड़ी राहत मिल चुकी है, तो उसी संवैधानिक न्याय का फ़ायदा शरजील और उमर को भी मिलना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का पिछला रुख: गौरतलब है कि इसी साल 5 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली दंगा साज़िश मामले में एक बड़ा फैसला सुनाते हुए सह-अभियुक्त गुलफ़िशा फ़ातिमा, मीरान हैदर, शिफ़ा-उर-रहमान, मोहम्मद सलीम ख़ान और शादाब अहमद को नियमित ज़मानत दे दी थी। हालांकि, उस वक्त भी देश की शीर्ष अदालत ने उमर ख़ालिद और शरजील इमाम के खिलाफ लगे आरोपों की गंभीरता को देखते हुए उन्हें किसी भी तरह की ज़मानत देने से साफ़ इनकार कर दिया था।
केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा हाल ही में 23 आतंकियों को यूएपीए (UAPA) के तहत ब्लैकलिस्ट किए जाने के बड़े राष्ट्रीय घटनाक्रम के बीच, दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट द्वारा उमर ख़ालिद और शरजील इमाम की ज़मानत याचिकाओं को ख़ारिज करना यह साफ संदेश देता है कि देश की अदालतें राष्ट्रीय सुरक्षा और आंतरिक अखंडता से जुड़े मामलों में किसी भी तरह की ढिलाई बरतने के मूड में नहीं हैं। कूटनीतिक और कानूनी गलियारों में 'समानता के सिद्धांत' (Principle of Parity) के आधार पर पांच अन्य सह-अभियुक्तों की 5 जनवरी की ज़मानत को नज़ीर बनाने की कोशिश की गई, लेकिन जज समीर बाजपेयी का यह कड़ा फैसला यह साफ करता है कि जांच एजेंसियों की फाइलों में इन दोनों का 'कथित रोल' बाकी अभियुक्तों से कहीं ज्यादा गंभीर और केंद्रीय माना गया है।
'बेबाक24' का मानना है कि वकील तालिब मुस्तफ़ा की इस दलील में कड़वी सच्चाई जरूर है कि मुक़दमा (Trial) बेहद कछुआ गति से चल रहा है और इसके जल्द ख़त्म होने के आसार नहीं हैं। बिना दोष सिद्ध हुए किसी को सालों तक जेल में रखना लोकतांत्रिक मूल्यों पर सवाल तो उठाता है, लेकिन उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों में जो जान-माल का भयानक नुकसान हुआ था, उसकी साज़िश के तार खंगालना भी देश की सुरक्षा के लिए उतना ही अनिवार्य है। कड़कड़डूमा कोर्ट के इस झटके के बाद अब उमर और शरजील के वकीलों के पास दिल्ली हाई कोर्ट या दोबारा सुप्रीम कोर्ट का रुख करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है। आने वाले दिनों में यह कानूनी जंग देश के कड़े यूएपीए कानून की सीमाओं और नागरिक अधिकारों की नई व्याख्या तय करेगी।
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