by admin@bebak24.com on | 2026-07-04 20:10:10
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नेशनल डेस्क (बेबाक24): देश की राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर देश की शिक्षा व्यवस्था में सुधार और पेपर लीक के खिलाफ छात्रों का गुस्सा अब चरम पर पहुंच गया है। "कॉकरोच जनता पार्टी" के संस्थापक अभिजित दीपके ने इस बेहद संवेदनशील मुद्दे को लेकर सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) को एक बेहद कड़ा और भावुक पत्र लिखा है।
अभिजीत दीपके ने इस पत्र की प्रति को अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल 'एक्स' (X) पर भी साझा किया है। पत्र में उन्होंने देश के करोड़ों युवाओं के भविष्य के साथ हो रहे खिलवाड़ का हवाला देते हुए केंद्र सरकार और केंद्रीय शिक्षा मंत्री से बेहद तीखे और बेबाक सवाल पूछे हैं।
प्रधानमंत्री को भेजे गए पत्र के मुताबिक, दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों का यह शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन पिछले 15 दिनों से लगातार जारी है। इसके साथ ही, देश के मशहूर शिक्षा विशेषज्ञ और पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक भी छात्रों के समर्थन में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे हैं, जिसका शनिवार (4 जुलाई 2026) को 7वां दिन है।
अभिजीत दीपके ने प्रधानमंत्री से सीधा सवाल किया है कि आखिर सरकार इतने लंबे समय से युवाओं के इस बड़े आंदोलन और एक सम्मानित शिक्षा विशेषज्ञ की भूख हड़ताल को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ क्यों कर रही है?
अभिजीत दीपके ने अपने पत्र में देश में लगातार हो रही परीक्षा पेपर लीक की घटनाओं को युवाओं के साथ सबसे बड़ा विश्वासघात बताया है। उन्होंने पत्र में बेहद कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए लिखा:
अभिजीत दीपके का पीएम मोदी को पत्र: "हम यहां जंतर-मंतर पर इसलिए बैठे हैं क्योंकि आपकी सरकार बार-बार परीक्षा पेपर लीक (Paper Leak) को रोकने में पूरी तरह विफल रही है, जिसने करोड़ों भारतीय युवाओं के भविष्य और उनके भरोसे को तोड़कर रख दिया है। हम यहां इसलिए बैठे हैं क्योंकि आपके शिक्षा मंत्री ने इतनी बड़ी नाकामियों के बाद भी कोई नैतिक ज़िम्मेदारी स्वीकार नहीं की और वे पिछले लगभग पांच वर्षों से लगातार अपने पद पर बने हुए हैं।"
उन्होंने आगे व्यवस्था के बोझ तले दम तोड़ने वाले छात्रों का जिक्र करते हुए कहा:
"हम यहां इसलिए बैठे हैं क्योंकि आपकी सरकार उन पीड़ित छात्रों के परिवारों को न तो कोई आर्थिक-मानसिक राहत दे सकी, न सम्मान, और न ही न्याय, जिन्होंने इस टूटी हुई सरकारी व्यवस्था के बोझ तले आकर आत्महत्या जैसा आत्मघाती कदम उठाया। और सबसे महत्वपूर्ण बात, हम यहां इसलिए बैठे हैं क्योंकि हम अब भी भारत के संविधान के उस मूल वादे पर विश्वास करते हैं कि देश के निर्वाचित प्रतिनिधि अपने मतदाताओं के प्रति पूरी तरह जवाबदेह होते हैं।"
दीपके ने चेतावनी भरे लहजे में लिखा कि लोकतंत्र में कोई भी सरकार सवालों से ऊपर नहीं है, कोई भी मंत्री अपनी ज़िम्मेदारी से भाग नहीं सकता और कोई भी प्रशासन लाठी के दम पर नागरिकों को जवाब मांगने से चुप नहीं करा सकता।
पत्र के दूसरे हिस्से में अभिजीत दीपके ने प्रदर्शन स्थल पर दिल्ली पुलिस द्वारा की गई कथित बर्बरता और बदसलूकी का मुद्दा बेहद आक्रामकता के साथ उठाया है। उन्होंने पुलिस अधिकारियों के नामजद निलंबन की मांग करते हुए लिखा:
छात्रों के साथ मारपीट: दिल्ली पुलिस ने हमारे शांतिपूर्ण प्रदर्शन स्थल पर घुसकर पढ़ाई कर रहे निर्दोष छात्रों के साथ मारपीट की।
महापुरुषों के साहित्य का अपमान: एसीपी अजय शर्मा और इंस्पेक्टर नीरज साहू के सीधे और लिखित-मौखिक आदेशों पर पुलिसकर्मियों ने छात्रों की किताबों को उठाकर कीचड़ में फेंक दिया। इन किताबों में छत्रपति शिवाजी महाराज, डॉ. भीमराव आंबेडकर और शहीद भगत सिंह से संबंधित बेहद प्रेरणादायक और ऐतिहासिक साहित्य शामिल था।
निलंबन की मांग: अभिजीत दीपके ने प्रधानमंत्री से मांग की है कि इन दोनों संबंधित पुलिस अधिकारियों (एसीपी और इंस्पेक्टर) को पवित्र साहित्य का अपमान करने और छात्रों पर बल प्रयोग करने के आरोप में तत्काल प्रभाव से सस्पेंड (निलंबित) किया जाए।
अंत में, उन्होंने पीएम मोदी से अपील की है कि वे इस संवेदनशील विषय पर अपनी चुप्पी तोड़ें, देश की शिक्षा व्यवस्था की जर्जर हो चुकी हालत पर देश के सामने जवाब दें और दोषी अधिकारियों व भ्रष्ट तत्वों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करें।
देश की सबसे प्रतिष्ठित परीक्षाओं के पेपर लीक होना और उसके खिलाफ आवाज उठाने वाले छात्रों को दिल्ली की सड़कों पर कीचड़ और पुलिस की लाठियों से नवाजा जाना— यह किसी भी परिपक्व लोकतंत्र के लिए बेहद शर्मनाक और विचलित करने वाली तस्वीर है। सोनम वांगचुक जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित शिक्षा विशेषज्ञ का छात्रों के भविष्य के लिए 7 दिनों से अन्न-जल त्यागकर भूख हड़ताल पर बैठे रहना, और देश के नीति-नियंताओं का इस पर पूरी तरह मौन साध लेना यह साफ दिखाता है कि हमारे सिस्टम की प्राथमिकताएं कितनी बदल चुकी हैं। अभिजीत दीपके का यह पत्र देश के उसी आक्रोशित युवा मानस की बेबाक आवाज है, जो अब खोखले आश्वासनों से थक चुका है।
'बेबाक24' का मानना है कि दिल्ली पुलिस के अधिकारियों पर छत्रपति शिवाजी महाराज, बाबासाहेब आंबेडकर और भगत सिंह जैसी महान विभूतियों की किताबों को कीचड़ में फेंकने के जो आरोप लगे हैं, यदि वे सच हैं, तो यह महज़ एक प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि वैचारिक और नैतिक पतन की पराकाष्ठा है। सरकार को यह समझना होगा कि शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक विरोध को लाठियों और मुकदमों के दम पर दबाने की कोशिशें हमेशा उलटी पड़ती हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस संवेदनशील मोड़ पर खुद सामने आकर छात्रों से सीधा संवाद स्थापित करना चाहिए, क्योंकि जब देश का युवा खुद को ठगा हुआ महसूस करता है और उसकी किताबों का अपमान होता है, तो व्यवस्था की नींव हिलना तय है।
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