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"सरकार बनते ही सब संघ के हो गए": सरकारी अफसरों की 'होड़' पर कैलाश विजयवर्गीय का अपनी ही व्यवस्था पर बड़ा तंज, कांग्रेस हमलावर

by admin@bebak24.com on | 2026-06-28 14:06:19

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"सरकार बनते ही सब संघ के हो गए": सरकारी अफसरों की 'होड़' पर कैलाश विजयवर्गीय का अपनी ही व्यवस्था पर बड़ा तंज, कांग्रेस हमलावर

भोपाल: मध्य प्रदेश सरकार के कद्दावर नेता और शहरी विकास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय अपने बेबाक बयानों के लिए जाने जाते हैं, लेकिन इस बार उनके एक बयान ने सूबे से लेकर देश की सियासत में हलचल पैदा कर दी है। भोपाल में आयोजित एक स्मृति कार्यक्रम के दौरान विजयवर्गीय ने सरकारी अधिकारियों की अवसरवादिता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) में 'अच्छे लोगों' की कमी को लेकर अपनी ही सरकार और व्यवस्था को आईना दिखाया है।

इस बयान के सामने आते ही प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने इसे बीजेपी और प्रशासनिक अमले के 'गठबंधन' का आत्मस्वीकार बताते हुए तीखा हमला बोला है।

1. कैलाश विजयवर्गीय ने ऐसा क्या कह दिया?

26 जून 2026 (शुक्रवार) को भोपाल में 'शालिग्राम तोमर स्मृति कार्यक्रम' को संबोधित करते हुए कैलाश विजयवर्गीय ने सरकारी अफसरों के अचानक जागे 'संघ प्रेम' पर चुटकी ली। उन्होंने कहा:

"हम सरकार में हैं तो कोई अधिकारी आता है और कहता है कि सर मैं शाखा में जाता था। अरे भाई तुम अभी जाते हो, हमारी सरकार बनी उसके पहले तो कभी तुमने बताया नहीं। हर अधिकारी के मन में कुछ न कुछ रहता है कि मैं भी दिखाऊं कि मैंने भी बेल्ट पहनी है। सरकार आने के बाद सब संघ के हो गए। हर अधिकारी संघ का हो गया। मेरे पिताजी शाखा में जाते थे।"

विजयवर्गीय ने एक मजेदार वाकया साझा करते हुए कहा कि एक अफसर ने उनसे आकर दावा किया कि उनके पिता शाखा में 'अध्यक्ष' थे, जबकि संघ में ऐसी कोई पोस्ट ही नहीं होती। उन्होंने गंभीर चिंता जताते हुए आगे कहा, "इस भीड़ में अच्छे इंसानों की कमी है। संगठन बढ़ रहा है, विचारधारा बढ़ रही है। लेकिन अगर अच्छे इंसान ही न हों, तो उस विचारधारा के महत्व पर हमें चिंतन और मनन करना चाहिए।"

2. कांग्रेस ने लपका मुद्दा: "निष्पक्षता नहीं, वैचारिक पहचान बना सुरक्षा कवच"

कैलाश विजयवर्गीय के इस 'सत्यवचन' को विपक्ष ने हाथों-हाथ लिया है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि मंत्री ने खुद अपनी सरकार और अफसरों की कलई खोलकर रख दी है।

  • उमंग सिंघार (नेता प्रतिपक्ष, MP): उन्होंने 'एक्स' पर लिखा कि जब खुद कैबिनेट मंत्री यह स्वीकार कर रहे हैं कि अफसरों में आरएसएस का बनने की होड़ है, तो यह साफ है कि प्रशासनिक व्यवस्था में निष्पक्षता खत्म हो चुकी है। अब अधिकारी वैचारिक पहचान को अपना 'सुरक्षा कवच' समझने लगे हैं। वरिष्ठ मंत्री खुद मान रहे हैं कि संगठन में अवसरवादी और बुरे लोग आ गए हैं, जो बीजेपी के चरित्र का आत्मस्वीकार है।

  • राजीव शुक्ला (राज्यसभा सांसद): उन्होंने विजयवर्गीय का वीडियो शेयर करते हुए लिखा, "कैलाश जी ने बहुत सही कहा। आज की बीजेपी और अफसरों की कलई खोल दी।"

3. सरकारी कर्मचारियों और RSS: पाबंदी और सियासत का लंबा इतिहास

अधिकारियों के संघ प्रेम पर विवाद मध्य प्रदेश के लिए नया नहीं है। इस मुद्दे पर सालों से कानूनी और राजनीतिक लड़ाई चलती आ रही है:

  • 1981 और 2000 (कांग्रेस शासन): कांग्रेस सरकार ने पहली बार 1981 में और फिर साल 2000 में दिग्विजय सिंह के मुख्यमंत्री रहते हुए सरकारी कर्मचारियों के संघ की शाखाओं में जाने पर प्रतिबंध लगाया था। उल्लंघन करने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रावधान था।

  • 2006 (बीजेपी शासन): तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस प्रतिबंध को हटा दिया था। सरकार का तर्क था कि आरएसएस कोई चुनाव आयोग में रजिस्टर्ड राजनीतिक दल नहीं है, बल्कि एक 'सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन' है।

  • केंद्र सरकार का बड़ा फैसला (जुलाई 2024): भारत सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) ने एक आधिकारिक आदेश जारी कर सरकारी कर्मचारियों के संघ की गतिविधियों में भाग लेने पर लगे 58 साल पुराने प्रतिबंध को पूरी तरह हटा दिया था

बेबाक24 टेक

कैलाश विजयवर्गीय का यह बयान उस कड़वी हकीकत को बयां करता है जिसे राजनीतिक दल अक्सर छिपाने की कोशिश करते हैं। नौकरशाही (Bureaucracy) का चरित्र हमेशा से 'सत्तानुकूल' होने का रहा है, और विजयवर्गीय ने इसी अवसरवाद पर करारा प्रहार किया है। जब केंद्र सरकार ने 2024 में 58 साल पुराना प्रतिबंध हटाया था, तब मकसद कर्मचारियों को वैचारिक स्वतंत्रता देना था, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका नतीजा 'चाटुकारिता' के रूप में सामने आ रहा है, जहां अधिकारी काम के दम पर नहीं बल्कि 'बेल्ट पहनने' का नाटक करके पोस्टिंग पाना चाहते हैं।

विजयवर्गीय की यह आत्मपीड़ा कि 'भीड़ बढ़ गई है पर अच्छे इंसानों की कमी है', संघ के भीतर तेजी से हो रहे राजनीतिकरण और गिरते स्तर की तरफ इशारा करती है। अयोध्या में कथित चढ़ावा चोरी जैसे संवेदनशील मुद्दों के बीच अपनी ही व्यवस्था पर ऐसा तीखा तंज कसना यह दिखाता है कि बीजेपी के भीतर भी सब कुछ ठीक नहीं है और वरिष्ठ नेता अफसरों की बेलगाम कार्यशैली से नाराज हैं। विपक्ष के लिए यह बैठे-बिठाए मिला एक ऐसा हथियार है, जिससे वे ब्यूरोक्रेसी की निष्पक्षता पर लंबे समय तक सवाल खड़े करते रहेंगे।



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