by admin@bebak24.com on | 2026-06-25 20:20:54
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लंदन/नई दिल्ली: वैश्विक बाजार से आम उपभोक्ताओं और अर्थव्यवस्था के लिए एक बहुत बड़ी और राहत भरी खबर सामने आई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें पिछले चार महीनों के अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई हैं। गुरुवार को वैश्विक मानक ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) की कीमत भारी गिरावट के साथ कुछ देर के लिए 72.48 डॉलर प्रति बैरल तक नीचे आ गई।
यह ठीक वही कीमत का स्तर है, जो इस साल 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमले से महज एक दिन पहले दर्ज किया गया था। हालांकि, बाजार बंद होने तक कीमतों में मामूली रिकवरी देखी गई और यह 72.63 डॉलर प्रति बैरल पर टिकी रही।
वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में आई इस बड़ी गिरावट के पीछे कूटनीतिक मोर्चे पर मिली एक बहुत बड़ी सफलता है:
अमेरिका-ईरान के बीच ऐतिहासिक समझौता (MoU): बीते 17 जून को अमेरिका और ईरान के बीच एक महत्वपूर्ण सहमति पत्र (MoU) पर हस्ताक्षर हुए हैं। इस समझौते के तहत दोनों देश अपने परमाणु कार्यक्रम और युद्ध को पूरी तरह समाप्त करने से जुड़े मुद्दों पर अगले 60 दिनों तक सघन बातचीत करेंगे।
होर्मुज़ स्ट्रेट का दोबारा खुलना: इस कूटनीतिक शांति का सबसे बड़ा असर रणनीतिक रूप से दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री जलमार्ग 'होर्मुज़ स्ट्रेट' (Strait of Hormuz) पर पड़ा है। ईरान के हमलों के बाद यह रास्ता लगभग ठप हो गया था, जिससे तेल की सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई थी। अब इस रास्ते से मालवाहक और तेल टैंकर जहाजों की आवाजाही पूरी तरह सामान्य हो गई है।
होर्मुज़ स्ट्रेट वैश्विक कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के परिवहन के लिए सबसे अहम समुद्री रास्ता है। दुनिया का लगभग एक-तिहाई समुद्री तेल परिवहन इसी संकरे रास्ते से होकर गुजरता है। युद्ध के कारण इस रास्ते के बंद होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊर्जा की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव और अनिश्चितता देखी जा रही थी, जो अब थम गई है।
कच्चे तेल की कीमतों का 72 डॉलर प्रति बैरल के पास आना वैश्विक अर्थव्यवस्था, विशेषकर भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों के लिए एक बड़ी संजीवनी है। पिछले चार महीनों से पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में जारी युद्ध ने जिस तरह पूरी दुनिया को एक बड़े ऊर्जा संकट और महंगाई की खाई में धकेल दिया था, वह अमेरिका और ईरान की इस कूटनीतिक सूझबूझ से फिलहाल टल गया है। होर्मुज़ स्ट्रेट का दोबारा खुलना यह साबित करता है कि युद्ध चाहे मिसाइलों से लड़ा जाए, उसकी असली कीमत वैश्विक व्यापार और आम जनता को चुकानी पड़ती है।
हालांकि, इस गिरावट को लेकर अभी बहुत ज्यादा जश्न मनाना जल्दबाजी होगी। अमेरिका और ईरान के बीच अभी केवल 60 दिनों की बातचीत का ढांचा तैयार हुआ है, न कि कोई स्थायी शांति समझौता। अगर इन 60 दिनों में परमाणु कार्यक्रम और प्रतिबंधों को लेकर दोनों देशों के बीच बात बिगड़ती है, तो तेल के बाजार में दोबारा आग लगते देर नहीं लगेगी। भारत के नजरिए से देखें तो यह घरेलू स्तर पर पेट्रोल-डीजल की कीमतों को कम करने और राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने का एक बेहतरीन मौका है, बशर्ते यह कूटनीतिक शांति स्थायी रूप ले सके।
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