by admin@bebak24.com on | 2026-06-25 16:26:23
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पासपोर्ट सेवा दिवस के अवसर पर आए इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों और सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं, जबकि कानूनी विशेषज्ञ इसे संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप बता रहे हैं।
आम तौर पर यह माना जाता है कि पासपोर्ट सबसे कड़े पुलिस वेरिफिकेशन और आवासीय पते की जांच के बाद ही जारी होता है। यही वजह है कि इस फैसले पर कई सवाल उठ रहे हैं:
जावेद अख्तर का तर्क: प्रसिद्ध गीतकार जावेद अख्तर ने इस रुख को 'बेतुका' बताते हुए सवाल उठाया कि क्या सरकार खुद अपनी ही जांच एजेंसियों और पुलिस सत्यापन प्रक्रिया पर भरोसा नहीं करती?
आदित्य ठाकरे की चिंता: शिवसेना (यूबीटी) नेता आदित्य ठाकरे ने कहा कि यदि सरकार यह मानती है कि यह दस्तावेज गैर-नागरिकों को भी मिल सकता है, तो इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय पासपोर्ट की विश्वसनीयता कमजोर हो सकती है।
कपिल सिब्बल का सवाल: वरिष्ठ राजनेता और वकील कपिल सिब्बल ने पूछा कि यदि पासपोर्ट, वोटर आईडी या पैन कार्ड नागरिकता का अकाट्य सबूत नहीं हैं, तो फिर एक आम भारतीय के पास नागरिकता का असली कानूनी प्रमाण क्या है?
सरकारी सूत्रों और कानूनी विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि विदेश मंत्रालय का यह रुख पूरी तरह से पासपोर्ट अधिनियम, 1967 और नागरिकता अधिनियम, 1955 के तकनीकी अंतर पर आधारित है।
इस पूरे भ्रम को बॉम्बे उच्च न्यायालय के 2013 के एक फैसले से आसानी से समझा जा सकता है:
गैर-नागरिकों को पासपोर्ट का प्रावधान: पासपोर्ट अधिनियम, 1967 के तहत कुछ विशेष और तकनीकी परिस्थितियों में गैर-नागरिकों को भी यात्रा दस्तावेज (पासपोर्ट) जारी करने की अनुमति दी जा सकती है। इसलिए केवल पासपोर्ट का होना नागरिकता का 'निर्णायक' सबूत नहीं है।
कानूनी स्थिति बनाम यात्रा अधिकार: पूर्व राजनयिक निरुपमा मेनन राव के अनुसार, पासपोर्ट का प्राथमिक उद्देश्य केवल विदेश यात्रा के दौरान धारक की पहचान और उसके अधिकारों की रक्षा करना है। यह सरकार की संपत्ति होती है जिसे कभी भी जब्त किया जा सकता है, जबकि नागरिकता इतनी आसानी से नहीं छीनी जा सकती।
नागरिकता का नियमन: भारत में किसी भी व्यक्ति की नागरिकता का दर्जा केवल 'नागरिकता अधिनियम, 1955' के प्रावधानों के तहत ही तय और प्रमाणित किया जा सकता है।
नागरिकता अधिनियम, 1955 और सरकारी गाइडलाइंस के अनुसार, कानूनी रूप से अकाट्य प्रमाण निम्नलिखित हैं:
जन्म प्रमाण पत्र : जन्म या वंश के आधार पर भारत में रह रहे अधिकांश नागरिकों के लिए उनका वैध जन्म प्रमाण पत्र ही नागरिकता का प्राथमिक आधार है।
नागरिकता प्रमाण पत्र: यह प्रमाण पत्र मुख्य रूप से उन लोगों को गृह मंत्रालय द्वारा जारी किया जाता है जिन्होंने 'पंजीकरण' (Registration) या 'प्राकृतिककरण' (Naturalization) की कानूनी प्रक्रिया के जरिए भारतीय नागरिकता हासिल की है।
विदेश मंत्रालय का यह रुख कानूनी और तकनीकी रूप से बिल्कुल सही है, लेकिन यह व्यावहारिक धरातल पर आम जनता के बीच एक बड़ा असमंजस पैदा करता है। एक आम भारतीय नागरिक के नजरिए से देखें तो यह व्यवस्था काफी विरोधाभासी लगती है—पैन कार्ड, बैंक खाते या पासपोर्ट जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेज बनवाने के लिए सरकारी तंत्र जिस मुस्तैदी से बैकग्राउंड और पहचान का वेरिफिकेशन करता है, उसी दस्तावेज को बाद में 'नागरिकता का अंतिम सबूत' मानने से कतराना आम आदमी को भ्रमित करता है।
तकनीकी रूप से नागरिकता एक 'स्थायी संवैधानिक दर्जा' है, जबकि पासपोर्ट महज एक 'अस्थायी यात्रा विशेषाधिकार' है जो सरकार द्वारा प्रदान किया जाता है। हालांकि, शासन को यह समझना होगा कि जब तक देश के हर नागरिक के पास एक सुलभ और सार्वभौमिक नागरिकता दस्तावेज अनिवार्य रूप से उपलब्ध नहीं होता, तब तक पहचान के कागजातों पर आने वाले ऐसे तकनीकी मोड़ जनता के बीच अपनी पहचान को लेकर अनजाने में ही सही, पर एक असुरक्षा की भावना पैदा करते हैं।
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