by on | 2026-06-25 02:34:19
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पटना/आरा: बिहार के भोजपुर जिला अंतर्गत शाहपुर थाना क्षेत्र के बिलौटी में हुई कथित पुलिस मुठभेड़ का मामला अब गंभीर कानूनी और प्रशासनिक मोड़ पर आ गया है। राज्य सरकार ने घटना की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच सुनिश्चित करने के उद्देश्य से पटना उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश विनोद कुमार सिन्हा की अध्यक्षता में एक न्यायिक जांच आयोग का गठन किया है। वहीं दूसरी ओर, पीड़ित पक्ष की शिकायत पर घटना के छह दिन बाद स्थानीय पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध हत्या की सुसंगत धाराओं में प्राथमिकी दर्ज कर विधिक कार्रवाई शुरू कर दी गई है।
प्रशासनिक कार्रवाई: एसडीपीओ और थानाध्यक्ष नामजद, पांच पुलिसकर्मी निलंबित
मुठभेड़ की सत्यता को लेकर उठ रहे गंभीर सवालों के बीच पुलिस महानिदेशालय और स्थानीय प्रशासन ने प्रथम दृष्टया संदेहास्पद भूमिका और लापरवाही के आरोप में कड़ा रुख अपनाया है:
प्राथमिकी और गंभीर धाराएं: बिलौटी गांव निवासी मृतक भरत भूषण तिवारी की माता आशा देवी द्वारा दिए गए आवेदन के आधार पर शाहपुर थाने में कांड संख्या 178/26 (दिनांक 22/06/2026) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है। पुलिसकर्मियों के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 103(1)(5) (समान आशय के साथ परस्पर मिलीभगत कर हत्या कारित करना) तथा 27 आर्म्स एक्ट के अंतर्गत आरोप पंजीकृत किए गए हैं।
वरिष्ठ अधिकारी नामजद: दर्ज प्राथमिकी में जगदीशपुर के तत्कालीन अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी (एसडीपीओ) राजेश शर्मा तथा शाहपुर के निलंबित थानाध्यक्ष इंस्पेक्टर राजेश मालाकार को नामजद अभियुक्त बनाया गया है।
निलंबन की कार्रवाई: विभागीय स्तर पर त्वरित कदम उठाते हुए शाहपुर थानाध्यक्ष समेत पांच पुलिसकर्मियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है। मामले की अग्रिम विवेचना के लिए पुलिस निरीक्षक संजीव कुमार को अनुसंधानकर्ता नियुक्त किया गया है।
न्यायिक आयोग: सेवानिवृत्त जस्टिस विनोद कुमार सिन्हा संभालेंगे जांच की कमान
राज्य सरकार द्वारा गठित एकल सदस्यीय न्यायिक जांच आयोग के अध्यक्ष बनाए गए सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति विनोद कुमार सिन्हा का न्यायिक और प्रशासनिक करियर अत्यंत सुदीर्घ और प्रतिष्ठित रहा है:
शैक्षणिक एवं प्रारंभिक पृष्ठभूमि: पटना के राजेंद्र नगर (रोड नंबर 3) के मूल निवासी जस्टिस सिन्हा का जन्म 23 अप्रैल 1958 को हुआ था। उन्होंने वर्ष 1983 में पटना लॉ कॉलेज से विधि स्नातक (एलएलबी) की उपाधि प्राप्त करने के पश्चात पटना उच्च न्यायालय में दीवानी, आपराधिक और सेवा संबंधी मामलों में वकालत प्रारंभ की थी।
उच्च न्यायिक सेवा में योगदान: वर्ष 1997 में वे अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश के रूप में बिहार उच्च न्यायिक सेवा का हिस्सा बने। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने समस्तीपुर के जिला जज और बिहार सरकार के विधि सलाहकार जैसे महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया।
उच्चतर पद और मानवाधिकार आयोग: पदोन्नति से पूर्व वर्ष 2014 में वे पटना उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल तथा बिहार सरकार के विधि सचिव के पद पर कार्यरत थे। 9 दिसंबर 2016 को उन्हें पटना उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत किया गया, जहां से वे 22 अप्रैल 2020 को सेवानिवृत्त हुए। उनकी निष्पक्ष छवि के दृष्टिगत तत्कालीन राज्य सरकार ने उन्हें बिहार राज्य मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष भी नियुक्त किया था।
घटनाक्रम के अंतर्विरोध: पुलिस की थ्योरी बनाम परिजनों के आरोप
इस पूरे प्रकरण में पुलिस प्रशासन के आधिकारिक दावों और मृतक के परिजनों के बयानों में भारी विरोधाभास परिलक्षित हो रहा है, जो न्यायिक जांच का मुख्य बिंदु होगा:
पुलिस का आधिकारिक पक्ष:
पुलिस रिपोर्ट और सोशल मीडिया पर प्रसारित साक्ष्यों के अनुसार, 16 जून की संध्या को शाहपुर थानाध्यक्ष राजेश मालाकार के नेतृत्व में पुलिस बल भरत भूषण तिवारी को अभिरक्षा में लेने उसके आवास पर पहुंचा था, जहां अभियुक्त द्वारा पुलिस टीम पर आग्नेयास्त्र तानने का मामला सामने आया। तत्पश्चात, 17 जून की सुबह विशेष कार्य बल (STF) और स्थानीय पुलिस ने पुनः घेराबंदी की। पुलिस का दावा है कि आत्मरक्षा में की गई जवाबी फायरिंग के दौरान अभियुक्त को गोली लगी, जिसकी इलाज के दौरान पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल (PMCH) में मृत्यु हो गई।
परिजनों के संगीन आरोप:
इसके विपरीत, मृतक की मां आशा देवी ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया है कि पुलिस अधिकारी उनके पुत्र को घर से अभिरक्षा में लेकर गए थे। जब वे कटाव पीड़ितों के समीप पहुंचे, तब उनका पुत्र सोशल मीडिया (फेसबुक लाइव) के माध्यम से अपनी बात रख रहा था और उसने अपने आग्नेयास्त्र को भूमि पर रखकर आत्मसमर्पण कर दिया था। आरोप है कि इसके बाद पुलिसकर्मियों ने उसे बलपूर्वक धक्का देकर गिराया और उच्चाधिकारियों के निर्देश पर अत्यंत समीप से पांच गोलियां मार दीं।
विधिक और राजनीतिक निहितार्थ
यद्यपि राज्य सरकार ने सेवानिवृत्त न्यायाधीश के नेतृत्व में आयोग का गठन कर मामले को शांत करने का प्रयास किया है, किंतु पीड़ित परिवार इस प्रक्रिया से पूरी तरह आश्वस्त नजर नहीं आ रहा है। परिजनों द्वारा मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) अथवा उच्च न्यायालय के किसी वर्तमान न्यायाधीश (Sitting Judge) से जांच कराने की निरंतर मांग की जा रही है। इस बीच, राजनीतिक हलकों में भी पूर्णिया सांसद पप्पू यादव सहित अन्य जनप्रतिनिधियों ने पुलिस मुख्यालय के स्तर पर गंभीर साठगांठ होने के दावे कर मामले को और संवेदनशील बना दिया है।
न्यायिक आयोग की रिपोर्ट और स्थानीय पुलिस द्वारा की जा रही आपराधिक जांच के निष्कर्ष ही यह तय करेंगे कि यह घटना विधिक सम्मत पुलिस कार्रवाई थी अथवा सत्ता और वर्दी के दुरुपयोग का एक गंभीर दृष्टांत।
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