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डिंपल का 'डंके की चोट' पर वार: "सरकार हमेशा से किसान-विरोधी, विदेशियों के आगे टेक दिए घुटने!"

by on | 2026-02-03 19:25:57

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डिंपल का 'डंके की चोट' पर वार: "सरकार हमेशा से किसान-विरोधी, विदेशियों के आगे टेक दिए घुटने!"

नई दिल्ली/लखनऊ: जब बात किसानों की हो और समाजवादी कुनबा चुप रहे, ऐसा हो नहीं सकता! भारत-अमेरिका के बीच हुई ताज़ा 'ट्रेड डील' पर राजनीति का पारा सातवें आसमान पर है। सपा सांसद डिंपल यादव ने इस समझौते को लेकर मोदी सरकार को आड़े हाथों लिया है और सीधा आरोप जड़ा है कि यह सरकार हमेशा से किसान-विरोधी रही है।

खबर की 'बेबाक' हेडलाइंस:

  • सौदा भारत का, ऐलान अमेरिका का क्यों? डिंपल का विदेश मंत्रालय से तीखा सवाल।
  • किसानों के साथ गद्दारी? अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए दरवाजे खोलने पर भड़कीं डिंपल।
  • ट्रम्प की 'धौंस' या मोदी की 'दोस्ती'? ट्रेड डील के बहाने सरकार की घेराबंदी।

क्या है पूरा माजरा?

​अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सोशल मीडिया पर भारत-अमेरिका ट्रेड डील का ऐलान क्या किया, देश में विपक्षी दलों ने मोर्चा खोल दिया। डिंपल यादव ने इस पर बेबाकी से अपनी बात रखते हुए कहा कि यह बेहद शर्मनाक है कि भारत के हितों से जुड़ी इतनी बड़ी डील की जानकारी हमें वाशिंगटन से मिल रही है, न कि अपनी सरकार से।

डिंपल का बेबाक बयान:

"ये सरकार शुरू से ही किसानों के खिलाफ रही है। जिस तरह से अमेरिका ने 18% टैरिफ थोपा है और हमारे बाजार अमेरिकी खेती के लिए खोले जा रहे हैं, वो भारतीय किसानों की कमर तोड़ देगा। हमारा विदेश मंत्रालय बातचीत में पूरी तरह फेल साबित हुआ है।"


क्यों भड़कीं डिंपल? 3 बड़े कारण:

  1. कृषि क्षेत्र पर खतरा: डिंपल का मानना है कि अमेरिकी अनाज और डेयरी उत्पादों के भारत आने से स्थानीय किसानों की कमाई खत्म हो जाएगी।
  2. घुटने टेकने वाली कूटनीति: डिंपल ने तंज कसा कि भारत सरकार दबाव में काम कर रही है और ट्रम्प के सामने सरेंडर कर चुकी है।
  3. पुरानी अदावत: सपा का आरोप है कि भूमि अधिग्रहण बिल से लेकर तीन काले कानूनों तक, इस सरकार का ट्रैक रिकॉर्ड हमेशा किसान-विरोधी रहा है।

बेबाक 24 का विश्लेषण:

​सरकार इसे 'ऐतिहासिक जीत' बता रही है क्योंकि अमेरिका ने टैरिफ 50% से घटाकर 18% कर दिया है, लेकिन डिंपल यादव ने इसे 'किसानों से विश्वासघात' करार दिया है। अखिलेश यादव ने भी इसे 70% आबादी के साथ धोखा बताया है। सवाल ये है कि क्या वाकई ये डील भारतीय मंडियों में विदेशी कब्जे का रास्ता साफ करेगी? या फिर ये सिर्फ चुनावी साल का सियासी शोर है?

अब देखना होगा कि सरकार इस 'किसान-विरोधी' ठप्पे को मिटाने के लिए क्या सफाई देती है।



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