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पंजाब चुनाव से पहले कांग्रेस-आप में पोस्टर वार, बढ़ी सियासी तल्खी

by admin@bebak24.com on | 2026-11-07 14:06:45

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पंजाब चुनाव से पहले कांग्रेस-आप में पोस्टर वार, बढ़ी सियासी तल्खी

चंडीगढ़ | बेबाक24 न्यूज़

पंजाब में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच राजनीतिक टकराव तेज हो गया है। दोनों दलों के नेताओं के बीच आरोप-प्रत्यारोप अब व्यक्तिगत टिप्पणियों और सामाजिक माध्यमों पर पोस्टर वार तक पहुंच गए हैं। हालांकि, इन दोनों पार्टियों के बीच मतभेद केवल पंजाब चुनाव तक सीमित नहीं हैं। राष्ट्रीय राजनीति में विपक्षी एकता और अलग-अलग राज्यों में राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई ने भी उनके रिश्तों में दूरी बढ़ाई है।

राहुल गांधी की टिप्पणी से शुरू हुआ ताजा विवाद

4 नवंबर को पंजाब के संगरूर में कांग्रेस की रैली के दौरान राहुल गांधी ने मुख्यमंत्री भगवंत मान पर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि जब मान लोकसभा सांसद थे, तब सुबह 11 बजे भी उनके मुंह से शराब की गंध आती थी।

राहुल गांधी ने कहा कि नशे के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाले राज्य के मुख्यमंत्री को खुद नशे से दूर रहना चाहिए। उन्होंने पंजाब सरकार पर दिल्ली से संचालित होने का आरोप लगाते हुए कहा कि आधी कमान अमित शाह और आधी अरविंद केजरीवाल के हाथ में है।

इस बयान पर आम आदमी पार्टी के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने प्रतिक्रिया दी। उन्होंने राहुल गांधी की टिप्पणी को उनके राजनीतिक कद के नेता के लिए छोटी बात बताया और सवाल उठाया कि कांग्रेस की मुख्य लड़ाई भारतीय जनता पार्टी से है या विपक्षी दलों से।

सामाजिक माध्यमों पर आमने-सामने आए दोनों दल

बयानबाजी के बाद दोनों पार्टियों के बीच सामाजिक माध्यमों पर भी तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। आम आदमी पार्टी ने राहुल गांधी को निशाना बनाते हुए एक पोस्टर जारी किया। इसके जवाब में कांग्रेस नेता बीवी श्रीनिवास ने अरविंद केजरीवाल की तस्वीर साझा की, जिसमें उन पर व्यक्तिगत टिप्पणी की गई।

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और पंजाब कांग्रेस के अन्य नेताओं ने भी भगवंत मान सरकार पर भ्रष्टाचार तथा पंजाब के हितों की अनदेखी करने के आरोप लगाए।

दोनों दलों के रिश्तों में पहले से रहा है विरोधाभास

कांग्रेस और आम आदमी पार्टी खुद को भाजपा के खिलाफ विपक्षी राजनीति का हिस्सा बताती रही हैं, लेकिन कई राज्यों में दोनों एक-दूसरे की प्रमुख राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी भी हैं।

वरिष्ठ पत्रकार हेमंत अत्री के मुताबिक, पंजाब चुनाव मौजूदा टकराव की तात्कालिक वजह है, लेकिन दोनों दलों के बीच प्रतिस्पर्धा का इतिहास काफी पुराना है। उनका मानना है कि आम आदमी पार्टी के राजनीतिक उदय के बाद से कांग्रेस उसके निशाने पर रही है। उनके अनुसार, दोनों दल बुनियादी तौर पर अलग राजनीतिक ध्रुव हैं और विशेष परिस्थितियों में साथ आने के बावजूद उनके बीच प्रतिस्पर्धा बनी रहती है।

2013 में कांग्रेस के समर्थन से बनी थी आप सरकार

दोनों पार्टियों के रिश्तों को समझने के लिए वर्ष 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव की ओर लौटना जरूरी है। अन्ना आंदोलन के बाद अरविंद केजरीवाल ने वर्ष 2012 में आम आदमी पार्टी बनाई थी। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से निकली इस पार्टी ने तत्कालीन कांग्रेस सरकार की राजनीति को खुली चुनौती दी।

दिसंबर 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को 28 सीटें मिलीं, जबकि कांग्रेस 8 सीटों पर सिमट गई। भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन बहुमत हासिल नहीं कर सकी। इसके बाद कांग्रेस ने बाहर से समर्थन देकर केजरीवाल की सरकार बनवाई।

हालांकि, यह सरकार केवल 49 दिन चली। जनलोकपाल विधेयक विधानसभा में पेश नहीं हो पाने के बाद केजरीवाल ने इस्तीफा दे दिया। इसके बाद दोनों दलों के बीच राजनीतिक दूरी लगातार बढ़ती गई।

वर्ष 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने 70 में से 67 सीटें जीत लीं और कांग्रेस का खाता भी नहीं खुला। वर्ष 2020 में भी आप ने 62 सीटें जीतकर सत्ता बरकरार रखी, जबकि कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत सकी।

विपक्षी गठबंधन में साथ आए, फिर अलग हुए

भाजपा के खिलाफ विपक्षी एकता की कोशिशों के तहत जून 2023 में बने इंडिया गठबंधन में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी दोनों शामिल हुईं। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में दोनों दलों ने दिल्ली, गुजरात, हरियाणा और चंडीगढ़ में सीटों का बंटवारा किया, लेकिन पंजाब में अलग-अलग चुनाव लड़ा।

यह राजनीतिक सहयोग ज्यादा समय तक कायम नहीं रह सका। वर्ष 2025 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में दोनों दल फिर आमने-सामने आ गए। भाजपा ने 48 सीटें जीतकर सरकार बनाई, आम आदमी पार्टी को 22 सीटें मिलीं और कांग्रेस एक भी सीट हासिल नहीं कर सकी।

इसके बाद आम आदमी पार्टी ने इंडिया गठबंधन से दूरी बना ली। जुलाई 2025 में संजय सिंह ने कहा था कि यह गठबंधन लोकसभा चुनाव के लिए बना था और उनकी पार्टी अब इसका हिस्सा नहीं है। इसी साल अप्रैल में आप के 7 राज्यसभा सांसदों के भाजपा में शामिल होने के बाद भी राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तेज हुए।

पंजाब में दोनों दलों के सामने बड़ी चुनौती

वरिष्ठ पत्रकार सबा नकवी का मानना है कि मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच दोस्ती की उम्मीद करना उचित नहीं है। पंजाब में आप सरकार चला रही है, जबकि कांग्रेस मुख्य विपक्षी दल है। ऐसे में दोनों के बीच सीधा चुनावी मुकाबला स्वाभाविक है।

उनके मुताबिक, पंजाब कांग्रेस का पुराना राजनीतिक आधार रहा है और पार्टी उसे दोबारा हासिल करना चाहेगी। दूसरी ओर, दिल्ली में सत्ता गंवाने के बाद आम आदमी पार्टी के लिए पंजाब की सरकार बचाना बेहद महत्वपूर्ण हो गया है।

सबा नकवी का मानना है कि कांग्रेस लंबे समय से आम आदमी पार्टी को भाजपा की 'बी टीम' बताती रही है। हालांकि, राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस को भाजपा के खिलाफ व्यापक विपक्षी एकता के लिए दूसरे क्षेत्रीय दलों के साथ भी काम करना पड़ रहा है।

नशा और गैंगस्टर संस्कृति बन सकते हैं चुनावी मुद्दे

पंजाब की राजनीति पर नजर रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार जसपाल सिद्धू के मुताबिक, अगले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच सीधा मुकाबला होने की संभावना है। उनके आकलन में अकाली दल और भाजपा तीसरे स्थान के लिए प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं।

उन्होंने नशे की समस्या और गैंगस्टर संस्कृति को चुनाव के दो प्रमुख मुद्दे बताया। उनके अनुसार, वर्ष 2022 में आम आदमी पार्टी की जीत के पीछे किसान आंदोलन के बाद का माहौल, कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान और अकाली दल के खिलाफ नाराजगी जैसे कारण थे।

जसपाल सिद्धू का मानना है कि इस बार आप के पक्ष में वैसी चुनावी लहर दिखाई नहीं दे रही है। उन्होंने कहा कि पंजाब में कांग्रेस का संगठनात्मक ढांचा और गांवों-शहरों तक फैला पुराना नेटवर्क आम आदमी पार्टी की तुलना में मजबूत है।

हालांकि, उनके अनुसार आप सरकार की कुछ योजनाएं अब भी पार्टी की राजनीतिक ताकत हैं। इनमें मुफ्त बिजली, महिलाओं के लिए सरकारी बसों में मुफ्त यात्रा, खेती के लिए नलकूपों को रियायती बिजली और मंडियों में फसलों की खरीद शामिल हैं। उन्होंने यह भी कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में मुख्यमंत्री भगवंत मान की स्वीकार्यता शहरी और शिक्षित वर्ग में होने वाली आलोचना से अलग है।

आम आदमी पार्टी के लिए पंजाब क्यों है इतना अहम?

दिल्ली की सत्ता गंवाने और राज्यसभा सांसदों के पार्टी छोड़ने के बाद पंजाब आम आदमी पार्टी का सबसे मजबूत राजनीतिक आधार बचा है। यहां सरकार होने के कारण पार्टी के पास प्रशासनिक संसाधन और संगठन चलाने की क्षमता भी है।

हेमंत अत्री के मुताबिक, आम आदमी पार्टी की वित्तीय स्थिरता भी पंजाब की सत्ता से जुड़ी हुई है। यदि पार्टी यहां सरकार गंवाती है तो उसके सामने संगठन और राजनीतिक गतिविधियों के लिए संसाधन जुटाने का संकट खड़ा हो सकता है।

जसपाल सिद्धू भी पंजाब को आप के लिए अस्तित्व की लड़ाई मानते हैं। हालांकि, उनके मुताबिक सरकार की योजनाएं और ग्रामीण इलाकों में भगवंत मान की स्वीकार्यता पार्टी के पक्ष में कुछ मजबूती बनाए हुए हैं।

राष्ट्रीय राजनीति में विपक्षी एकता पर भी असर

कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच बढ़ती दूरी का असर राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी राजनीति पर भी पड़ सकता है। कांग्रेस का आरोप रहा है कि आप उन राज्यों में चुनाव लड़कर विपक्षी मतों को बांटती है, जहां कांग्रेस भाजपा को चुनौती दे रही होती है।

वहीं, आम आदमी पार्टी का तर्क है कि कांग्रेस खुद भाजपा को प्रभावी चुनौती देने में नाकाम रही है और उसे क्षेत्रीय दलों से टकराव के बजाय सहयोग करना चाहिए।

हेमंत अत्री के आकलन में राष्ट्रीय राजनीति में आम आदमी पार्टी की मौजूदा स्थिति ऐसी नहीं है कि उसके बिना विपक्षी समीकरण पर बड़ा असर पड़े। दूसरी ओर, सबा नकवी इस विवाद को केवल नेताओं के बयानों या सामाजिक माध्यमों की लड़ाई नहीं मानतीं। उनके मुताबिक, यह दोनों दलों के बीच राजनीतिक जगह और नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा भी है।

बेबाक24 टेक

कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच बढ़ती तल्खी के पीछे पंजाब की सत्ता के साथ-साथ दोनों दलों की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं और राष्ट्रीय स्तर पर अपनी भूमिका मजबूत करने की कोशिश भी है। दिल्ली में अलग-अलग चुनाव लड़ने और पंजाब में आमने-सामने होने के बाद विपक्षी एकता का साझा आधार कमजोर हुआ है। वर्ष 2027 का पंजाब विधानसभा चुनाव आम आदमी पार्टी के लिए सत्ता और संगठन बचाने की बड़ी परीक्षा होगा, जबकि कांग्रेस के लिए अपना पुराना राजनीतिक आधार वापस हासिल करने का अवसर।



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