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विश्वामित्र संग श्रीराम चले वन, रामनगर की ऐतिहासिक रामलीला में तीसरे दिन गूंजी ‘विदेह’ की वाणी!

by on | 2026-09-28 09:53:27

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विश्वामित्र संग श्रीराम चले वन, रामनगर की ऐतिहासिक रामलीला में तीसरे दिन गूंजी ‘विदेह’ की वाणी!


​वाराणसी/रामनगर। ​विश्व प्रसिद्ध रामनगर की रामलीला केवल अभिनय नहीं, सनातन परंपरा और अटूट आस्था की वो सजीव यात्रा है जो सदियों से बिना किसी लाउडस्पीकर और आधुनिक तड़क-भड़क के काशी की माटी को राममय करती आ रही है। लीला के तीसरे दिन रविवार को जब विश्वामित्र जी का अवध आगमन हुआ और श्रीराम-लक्ष्मण का वन गमन, ताड़का वध से लेकर जनकपुर आगमन तक के प्रसंग जीवंत हुए, तो समूचा रामनगर श्रीराम के जयकारों से गुंजायमान हो उठा।

​रामनगर की इस ऐतिहासिक लीला की सबसे बड़ी खासियत इसकी जीवंतता और पारंपरिक पदयात्रा है। तीसरे दिन की लीला में भी वही औघड़-दानी भाव देखने को मिला, जब श्रीराम और लक्ष्मण अपने कोमल चरणों से पदयात्रा करते हुए मुनि विश्वामित्र के पीछे वन पथ की ओर बढ़े।

​जब पुत्र-मोह पर भारी पड़ा गुरु-वचन: अयोध्या से वन की ओर बढ़े कदम

​लीला की शुरुआत विश्वामित्र जी के अयोध्या आगमन से हुई। वन में राक्षसों के बढ़ते अत्याचार और यज्ञ विध्वंस से व्यथित होकर जब महर्षि विश्वामित्र महाराजा दशरथ के दरबार पहुंचे, तो पूरी अयोध्या सहम गई। विश्वामित्र ने राजा दशरथ से यज्ञ रक्षा हेतु उनके प्राणप्रिय राम-लक्ष्मण को मांग लिया।

​पुत्र-मोह में व्याकुल राजा दशरथ पहले तो हिचकिचाए, लेकिन गुरु वशिष्ठ के नीतिपूर्ण मार्गदर्शन के बाद भारी मन से श्रीराम और लक्ष्मण को मुनि विश्वामित्र के सुपुर्द किया। बेबाक बात तो यह है कि रामनगर की लीला में इस वियोग और कर्तव्य के क्षण को पदयात्रा की प्राचीन परंपरा के साथ जिस तरह जीवंत किया गया, उसने उपस्थित हजारों श्रद्धालुओं की आंखें नम कर दीं।

​ताड़का वध, अहिल्या उद्धार और गंगा अवतरण का आलौकिक प्रसंग

​वन पथ पर आगे बढ़ते ही मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने ताड़का का वध कर मुनियों के तप को अभयदान दिया। इसके बाद सुबाहु का अंत और मारीच को एक ही बाण से दूर फेंककर यज्ञ की रक्षा की। अहिल्या का उद्धार करते हुए लीला गौतम मुनि के आश्रम से आगे बढ़ी।

​इसी यात्रा के दौरान मुनि विश्वामित्र ने श्रीराम और लक्ष्मण को पतित पावनी मां गंगा के पृथ्वी पर अवतरण की पौराणिक कथा सुनाई, जिसे रामनगर की इस प्रस्तुति में बेहद खास और अध्यात्मिक ढंग से पिरोया गया था।

​जनकपुर में ‘विदेह’ हुए विदेह: जब ब्रह्म को देख भाव-विभोर हुए राजा जनक

​लीला का सबसे भावुक और गूढ़ पड़ाव तब आया जब मुनि विश्वामित्र संग दोनों राजकुमार जनकपुर पहुंचे। श्रीराम के अलौकिक, शांत और तेजस्वी स्वरूप को देखते ही परमज्ञानी राजा जनक अपनी सुध-बुध खो बैठे।

​गोस्वामी तुलसीदास जी की इन्हीं कालजयी चौपाइयों का मर्म वहां सजीव हो उठा—

​“मूरति मधुर मनोहर देखी। भयेउ विदेह विदेह बिसेखी॥”

​राजा जनक ने कौतूहल और अपार स्नेह से विश्वामित्र जी से पूछा—‘हे मुनिवर! क्या ये मुनि कुल के आभूषण हैं, किसी महान राजवंश के रक्षक हैं, या फिर स्वयं वही निर्गुण ब्रह्म हैं जिसे वेद ‘नेति-नेति’ कहकर पुकारते हैं?’ तब महर्षि विश्वामित्र ने राजा जनक का संशय दूर करते हुए श्रीराम को चक्रवर्ती दशरथ का पुत्र और साक्षात परम ब्रह्म का स्वरूप बताया।

​संत ने उतारी आरती, अब ‘फूलवारी लीला’ का इंतजार

​राम-विश्वामित्र और जनक संवाद के बाद तीसरे दिन की लीला को विश्राम दिया गया। इसके बाद पूरे विधि-विधान और रामनगर के पारंपरिक तौर-तरीकों के अनुसार श्रीराम की भव्य आरती उतारी गई। आज की आरती की मुख्य सेवा एक पूज्य संत द्वारा संपन्न कराई गई।

​अब काशीवासियों और देश-विदेश से जुटे श्रद्धालुओं की निगाहें रामनगर की अगली प्रसिद्ध ‘फूलवारी लीला’ पर टिकी हैं, जहां श्रीराम और सीता जी के प्रथम दर्शन का अति-मनमोहक प्रसंग प्रस्तुत किया जाएगा।

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