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हक की सीट या नियमों की दीवार? BHU के सिंहद्वार पर बरसीं हुंकारें, OBC सर्टिफिकेट पर गरमाया 'आरक्षण' का नया विवाद!

by on | 2026-09-27 23:08:10

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हक की सीट या नियमों की दीवार? BHU के सिंहद्वार पर बरसीं हुंकारें, OBC सर्टिफिकेट पर गरमाया 'आरक्षण' का नया विवाद!

​वाराणसी (बेबाक 24): काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) का ऐतिहासिक सिंहद्वार रविवार को एक बार फिर नारों की गूंज और पुलिस की धक्का-मुक्की का गवाह बना। मुद्दा था—आरक्षण का अधिकार और विश्वविद्यालय के कड़े कागज़ी नियम। NSUI के बैनर तले जुटे छात्रों ने साफ शब्दों में BHU प्रशासन से सवाल पूछा कि आखिर कागजी वैधता के फेर में किसी पिछड़े छात्र का हक कैसे छीना जा सकता है?

​क्या 1 साल में बदल जाती है किसी की जाति?

​विरोध प्रदर्शन की अगुवाई कर रहे BHU छात्र सुमन आनंद ने विश्वविद्यालय प्रशासन की उस नीति पर कड़ा प्रहार किया, जिसके तहत OBC और अन्य आरक्षित वर्गों के जाति व आय प्रमाणपत्रों के लिए एक निश्चित समय-सीमा तय कर दी जाती है।

​सुमन आनंद ने सीधा सवाल दागा— "अगर किसी अभ्यर्थी के पास 2024 का बना हुआ OBC प्रमाणपत्र है, तो महज एक साल का अंतर आ जाने से उसकी सामाजिक-जातिगत पहचान कैसे बदल जाएगी? जब जाति नहीं बदलती, तो नियमों का यह बेवजह पेंच किसके फायदे के लिए लगाया जा रहा है?"

​NSUI के कार्यकर्ताओं ने साफ शब्दों में कहा कि प्रमाणपत्रों की इस उलझाऊ व्यवस्था से दूर-दराज से आने वाले पिछड़े और जरूरतमंद छात्रों को दाखिले की प्रक्रिया से बाहर होना पड़ रहा है।

​बड़ा आरोप: क्या खाली सीटों को 'सामान्य' बनाने का खेल?

​प्रदर्शनकारियों ने सिर्फ नियमों पर सवाल नहीं उठाए, बल्कि BHU प्रशासन की नीयत पर भी गंभीर आरोप जड़े। NSUI का कहना है कि:

  • ​तकनीकी पेंच: प्रमाणपत्रों की तय समय-सीमा और कागजी शर्तों के नाम पर पहले पात्र आरक्षित अभ्यर्थियों को अयोग्य ठहराया जाता है।
  • ​सीटों का रूपांतरण: जब ये योग्य छात्र बाहर हो जाते हैं और सीटें खाली रह जाती हैं, तो बाद में उन आरक्षित सीटों को अन्य (सामान्य) वर्गों में परिवर्तित (Convert) कर दिया जाता है।

​छात्रों ने चेतावनी दी कि आरक्षण केवल कोई 'कागजी खानापूर्ति' नहीं है, बल्कि यह सामाजिक न्याय, अवसर और प्रतिनिधित्व का मामला है।

​सिंहद्वार पर छिड़ा संग्राम, सुरक्षाकर्मियों से नोकझोंक

​अपनी मांगों को लेकर सिंहद्वार की तरफ बढ़े NSUI कार्यकर्ताओं को जब पुलिस और विश्वविद्यालय के सुरक्षाकर्मियों ने रोकने की कोशिश की, तो माहौल गरमा गया।

​सिंहद्वार पर दोनों पक्षों के बीच तीखी नोकझोंक और धक्का-मुक्की हुई। हालांकि, छात्रों ने साफ कर दिया कि जब तक आरक्षण व्यवस्था की इन विसंगतियों को दूर नहीं किया जाता और प्रवेश प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी नहीं बनाया जाता, उनका संघर्ष थमेगा नहीं।

​बेबाक 24 का सीधा सवाल: BHU प्रशासन आखिर कब तोड़ेगा चुप्पी?

​छात्रों ने अपनी तरफ से लड़ाई की रेखा खींच दी है—सवाल अब BHU प्रशासन के पाले में है।

  • ​क्या विश्वविद्यालय प्रशासन OBC प्रमाणपत्रों की समय-सीमा को लेकर कोई व्यावहारिक और स्पष्ट गाइडलाइन जारी करेगा?
  • ​क्या आरक्षित वर्ग की सीटों को तकनीकी खामियों के नाम पर खाली छोड़ने या बदलने के आरोपों पर कोई आधिकारिक जवाब आएगा?

​नियमों की अपनी जगह है, लेकिन अगर नियम किसी का हक मारने का जरिया बनने लगें तो सवाल उठना लाजिमी है। खबर दो बेबाक 24 इस पूरे मामले पर नजर बनाए रखेगा।



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