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चुनाव आयोग में टकराव की कहानी: 1989 से अब तक कब-कब भिड़े सीईसी और आयुक्त?

by on | 2026-09-24 14:20:40

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चुनाव आयोग में टकराव की कहानी: 1989 से अब तक कब-कब भिड़े सीईसी और आयुक्त?

नई दिल्ली | बेबाक24 न्यूज़

चुनाव आयोग के भीतर मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद कोई नई घटना नहीं है। 1989 में आयोग के बहुसदस्यीय ढांचे में आने के बाद अधिकारों और निर्णय प्रक्रिया को लेकर कई बार विवाद सामने आए। टीएन शेषन के दौर से लेकर गोपालस्वामी-चावला और लवासा-अरोड़ा के मतभेदों तक, आयोग के भीतर की खींचतान अलग-अलग समय पर सार्वजनिक होती रही है।

अब मौजूदा आयोग के दो चुनाव आयुक्तों की कथित आपत्तियों को लेकर भी चर्चा तेज है। ऐसे में समझते हैं कि पिछले करीब 4 दशकों में आयोग के भीतर विवाद किन मुद्दों पर सामने आए।

1989 में पहली बार बहुसदस्यीय आयोग

अक्तूबर 1989 में एसएस धनाओआ और वीएस सीगल को चुनाव आयुक्त बनाया गया। उस समय आरवीएस पेरी शास्त्री मुख्य चुनाव आयुक्त थे। माना गया कि नए आयुक्तों की नियुक्ति से सीईसी के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। हालांकि यह व्यवस्था ज्यादा समय नहीं चली और जनवरी 1990 तक दोनों नियुक्तियां रद्द कर दी गईं।

1993 में बहुसदस्यीय व्यवस्था फिर लागू हुई। उस समय टीएन शेषन सीईसी थे और एमएस गिल तथा जीवीजी कृष्णमूर्ति को चुनाव आयुक्त बनाया गया। इसके बाद आयोग के भीतर अधिकारों को लेकर तीखा विवाद सामने आया।

शेषन ने गिल और कृष्णमूर्ति को 'दो गधे' कहा

शेषन दोनों चुनाव आयुक्तों को आयोग के कामकाज में शामिल किए जाने से असहमत थे। दिए गए विवरण के अनुसार, उन्होंने आधिकारिक दस्तावेज साझा नहीं किए और महत्वपूर्ण बैठकों में भी दोनों की भूमिका सीमित रही।

इसी दौरान शेषन ने गिल और कृष्णमूर्ति के लिए बेहद तीखी भाषा का इस्तेमाल करते हुए उन्हें अपने कार्यालय के “दो गधे” तक कह दिया था। विवाद का मुख्य केंद्र यह था कि बहुसदस्यीय आयोग में सीईसी के अधिकार कितने होंगे और अन्य आयुक्तों की भूमिका क्या होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने बताया 'समानों में प्रथम'

टीएन शेषन ने बहुसदस्यीय आयोग बनाए जाने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। 1995 में अदालत ने सीईसी और अन्य चुनाव आयुक्तों की स्थिति और अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण व्यवस्था दी।

अदालत ने दोनों को दर्जे और निर्णय लेने के अधिकार के मामले में बराबर माना। सीईसी को “समानों में प्रथम” माना गया। यानी बहुसदस्यीय आयोग में सीईसी को अन्य आयुक्तों से अलग कोई एकतरफा निर्णायक अधिकार नहीं दिया गया।

गोपालस्वामी-चावला विवाद

2006 से 2009 के बीच तत्कालीन सीईसी एन गोपालस्वामी और चुनाव आयुक्त नवीन चावला के बीच भी गंभीर मतभेद सामने आए। गोपालस्वामी ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर चावला को हटाने की सिफारिश की थी और उन पर कांग्रेस के प्रति पक्षपात के आरोप लगाए थे।

तत्कालीन सरकार ने यह सिफारिश स्वीकार नहीं की। बाद में चावला ने गोपालस्वामी के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभाला। इस विवाद ने आयोग की निष्पक्षता और सदस्यों के बीच मतभेद को लेकर बहस तेज की।

2019 में लवासा-अरोड़ा मतभेद

2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान सीईसी सुनील अरोड़ा और चुनाव आयुक्त अशोक लवासा के बीच मतभेद चर्चा में आए। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, लवासा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से जुड़ी आदर्श आचार संहिता की शिकायतों पर कुछ मामलों में अलग राय रखी थी।

उनकी असहमति को लेकर विवाद हुआ और बाद में लवासा ने अगस्त 2020 में अपना कार्यकाल पूरा होने से पहले इस्तीफा दे दिया। हालांकि आयोग ने उस समय असहमति संबंधी टिप्पणियों के सार्वजनिक किए जाने को लेकर अपनी प्रक्रिया स्पष्ट की थी।

मौजूदा आयोग में 14 आपत्तियों की चर्चा

मौजूदा दौर में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की कथित आपत्तियों को लेकर सवाल उठ रहे हैं। उपलब्ध सामग्री के अनुसार, दोनों ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 मौकों पर कुछ फैसलों और आदेशों को लेकर औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई।

इनमें मतदाता पंजीकरण के फॉर्म-6 में बदलाव और मतदाता सूची के आंकड़ों के केंद्रीकृत नियंत्रण जैसे मुद्दे बताए गए हैं।

चुनाव आयोग का कहना है कि विचारों में अंतर किसी भी संस्थागत विचार-विमर्श का सामान्य हिस्सा है। आयोग के अनुसार, एसआईआर समेत सभी अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं। संबंधित चुनाव आयुक्तों ने इन कथित आपत्तियों पर सार्वजनिक रूप से कोई टिप्पणी नहीं की है।

विवादों के पीछे क्या रहा मुख्य सवाल?

अलग-अलग दौर के मामलों में मुद्दे अलग रहे, लेकिन विवादों में बार-बार अधिकारों के बंटवारे, निर्णय लेने की प्रक्रिया, आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता जैसे सवाल सामने आए हैं। मौजूदा विवाद भी इन्हीं व्यापक सवालों के संदर्भ में देखा जा रहा है।

बेबाक24 की राय

1989 के बाद चुनाव आयोग के भीतर सामने आए विवाद बताते हैं कि बहुसदस्यीय व्यवस्था में अधिकार और निर्णय प्रक्रिया को लेकर मतभेद अलग-अलग समय पर सार्वजनिक हुए हैं। मौजूदा मामले में भी कथित आपत्तियों और आयोग के जवाब—दोनों को साथ देखकर ही पूरे घटनाक्रम को समझना जरूरी है।



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