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रेप से ठहरा गर्भ जारी रखने को मजबूर करना गरिमा के खिलाफ: दिल्ली हाई कोर्ट

by on | 2026-09-15 20:06:56

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रेप से ठहरा गर्भ जारी रखने को मजबूर करना गरिमा के खिलाफ: दिल्ली हाई कोर्ट

नई दिल्ली | बेबाक24 न्यूज़

दिल्ली हाई कोर्ट ने 15 साल की रेप सर्वाइवर की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि अपराध के कारण ठहरे गर्भ को महिला या बच्ची की इच्छा के खिलाफ जारी रखने के लिए मजबूर करना उसके गरिमा के साथ जीवन जीने के अधिकार का गंभीर उल्लंघन होगा। अदालत ने 30 हफ्ते से अधिक की गर्भावस्था को समाप्त करने की अनुमति मांगने वाली याचिका को मंजूर किया।

अदालत की यह टिप्पणी उस मामले में सामने आई, जिसमें नाबालिग रेप सर्वाइवर ने गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति मांगी थी। अदालत ने मातृत्व को लेकर महिला की व्यक्तिगत इच्छा और निर्णय के अधिकार को महत्वपूर्ण माना।

इच्छा के खिलाफ मातृत्व थोपना अधिकारों का उल्लंघन

दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि रेप जैसी घटना के परिणामस्वरूप ठहरे गर्भ को जारी रखने के लिए मजबूर करना पीड़िता पर ऐसी जिम्मेदारी डालने जैसा होगा, जिसे उसने अपनी इच्छा से स्वीकार नहीं किया है। अदालत के मुताबिक, ऐसा करना उसके सम्मान और गरिमा के साथ जीवन जीने के अधिकार को प्रभावित करेगा।

मामले में याचिकाकर्ता की उम्र 15 साल है और गर्भावस्था 30 हफ्ते से अधिक की थी। इसलिए मामला सामान्य गर्भसमापन की समयसीमा से आगे का था और अदालत के हस्तक्षेप की जरूरत पड़ी।

एमटीपी कानून में क्या प्रावधान है?

मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी यानी एमटीपी अधिनियम की धारा 3 के तहत कुछ निर्धारित श्रेणियों में आने वाली महिलाओं के लिए चिकित्सकीय और कानूनी शर्तों के अधीन 20 हफ्ते से अधिक और 24 हफ्ते तक की गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति है।

30 हफ्ते से अधिक की गर्भावस्था का मामला इससे आगे होने के कारण अदालत के सामने अलग कानूनी और चिकित्सकीय सवाल खड़े करता है। ऐसे मामलों में परिस्थितियों, पीड़िता की स्थिति और चिकित्सकीय सलाह को ध्यान में रखकर न्यायिक निर्णय महत्वपूर्ण हो जाता है।

नाबालिग पीड़िता के मामले में अदालत का रुख अहम

यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि याचिकाकर्ता नाबालिग है। अदालत की टिप्पणी में पीड़िता के शारीरिक और मानसिक हित के साथ उसके गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार को प्रमुखता दी गई है।

बेबाक24 टेक: इस फैसले का अहम पक्ष यह है कि अदालत ने रेप से उत्पन्न गर्भावस्था को केवल चिकित्सकीय मुद्दा न मानकर पीड़िता की गरिमा, स्वायत्तता और इच्छा से भी जोड़ा है। 30 हफ्ते से अधिक की गर्भावस्था वाले ऐसे मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप की भूमिका भी इससे स्पष्ट होती है।



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