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नरही थाना गोलीकांड: 10 साल बाद भी अनसुलझा विनोद राय हत्याकांड, कब मिलेगा इंसाफ?

by on | 2026-08-09 12:26:14

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नरही थाना गोलीकांड: 10 साल बाद भी अनसुलझा विनोद राय हत्याकांड, कब मिलेगा इंसाफ?

बलिया: 12 अगस्त 2016 को हुए चर्चित नरही थाना गोलीकांड की 10वीं पुण्यतिथि नजदीक आते ही दिवंगत भाजपा कार्यकर्ता विनोद राय को न्याय दिलाने की मांग एक बार फिर गरमाने लगी है। एक दशक बीत जाने के बाद भी असली हत्यारे का पता न चलना पूरे क्षेत्र के लिए गहरा आघात और सुलगता हुआ सवाल बना हुआ है। यह घटना न केवल विनोद राय के परिवार को उजाड़ गई, बल्कि नरही के इतिहास में एक 'काला दिवस' के रूप में दर्ज हो गई।

​क्या था पूरा मामला?

​12 अगस्त 2016 को पशुपालक चंद्रमा यादव के मामले को लेकर तत्कालीन भाजपा विधायक उपेंद्र तिवारी के नेतृत्व में नरही थाने पर उग्र प्रदर्शन किया गया था। दिनभर चले धरना-प्रदर्शन के बाद शाम होते-होते स्थिति तनावपूर्ण हो गई। आरोप है कि पुलिस फायरिंग के दौरान भाजपा कार्यकर्ता विनोद राय को गोली लगी और उनकी जान चली गई।

​घटना के बाद पुलिस ने तत्कालीन विधायक उपेंद्र तिवारी समेत 45 लोगों के खिलाफ नामजद मुकदमा दर्ज किया। वहीं दूसरी ओर, मृतक विनोद राय के भतीजे गोपाल राय की तहरीर पर तत्कालीन एडीएम, सीओ और थाना प्रभारी सहित कई पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी।

​सत्ता बदली, मंत्री बने... फिर भी क्यों चुप रहे उपेंद्र तिवारी?

​सपा शासनकाल में हुई इस हत्या के बाद 2017 में प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी और उपेंद्र तिवारी 2017 से 2022 तक राज्य सरकार में मंत्री भी रहे। अब जनता के बीच यह तीखा सवाल उठ रहा है कि:

​जिस विनोद राय ने उपेंद्र तिवारी के आंदोलन और राजनीति के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया, उनके मंत्री रहते हुए भी जांच आगे क्यों नहीं बढ़ी?


​प्रदेश में दो-दो बार भाजपा की सरकार बनने के बावजूद असली हत्यारे और दोषियों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?


​जब सत्ता हाथ में थी तब खामोशी क्यों थी, और अब 10वीं पुण्यतिथि पर पूर्व मंत्री द्वारा श्रद्धांजलि सभा का प्रचार-प्रसार तेजी से क्यों किया जा रहा है?


​सरकार में रहने के बावजूद आरोपियों के बच निकलने और मामले की निष्पक्ष जांच न होने को लेकर क्षेत्रीय जनता में तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं।

​सुलगते सवाल और जनता का आक्रोश

​10वीं पुण्यतिथि के मौके पर स्थानीय लोगों और विनोद राय के समर्थकों का रुख बेहद सख्त है:

दिखावे की राजनीति बंद हो: लोगों का कहना है कि सिर्फ हर साल फूल-माला चढ़ाने और राजनीतिक रोटियां सेकने से शहीद कार्यकर्ता को न्याय नहीं मिलेगा।


जवाबदेही और समीक्षा जरूरी: एक दशक का लंबा वक्त बीत जाने के बाद भी अगर हत्या की गुत्थी अनसुलझी है, तो इस पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष समीक्षा होनी चाहिए।


ठोस रणनीति की मांग: नेताओं को केवल बयानों तक सीमित न रहकर न्याय दिलाने के लिए ठोस कानूनी व मैदानी रणनीति बनानी होगी।


​अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या 10वीं पुण्यतिथि पर विनोद राय के परिवार को न्याय दिलाने के लिए कोई निर्णायक लड़ाई लड़ी जाएगी, या यह मुद्दा फिर से केवल श्रद्धांजलि और सियासत की भेंट चढ़ जाएगा?



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