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पाकिस्तान में 125 साल पुराने हिंदू मंदिर पर विवाद, तहरीक-ए-लब्बैक पर कब्जे का आरोप

by admin@bebak24.com on | 2026-09-02 13:50:02

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पाकिस्तान में 125 साल पुराने हिंदू मंदिर पर विवाद, तहरीक-ए-लब्बैक पर कब्जे का आरोप

नारोवाल | बेबाक24 न्यूज़

पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के नारोवाल जिले में करीब 100 से 125 साल पुराने हिंदू मंदिर को गिराए जाने के मामले ने विवाद खड़ा कर दिया है। स्थानीय हिंदू संगठनों और अल्पसंख्यक प्रतिनिधियों ने आरोप लगाया है कि मंदिर को सुनियोजित तरीके से गिराकर उसकी जमीन पर पास के मदरसे का विस्तार करने की कोशिश की गई। इस मामले में प्रतिबंधित धार्मिक संगठन तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान का नाम भी सामने आया है।

हालांकि, पाकिस्तान के संबंधित अधिकारियों ने इन आरोपों से इनकार किया है। अधिकारियों का कहना है कि पुराना और जर्जर मंदिर भारी बारिश के कारण ढह गया। मंदिर की जमीन किसी को पट्टे पर दिए जाने के दावे को भी प्रशासन ने खारिज किया है।

21 अगस्त को गिरा मंदिर, बाद में बढ़ा विवाद

यह मंदिर नारोवाल जिले के सिराज गांव में स्थित था और 21 अगस्त 2026 को इसके ढहने की जानकारी सामने आई। अगस्त के अंतिम दिनों में इसके पीछे की वजह को लेकर विवाद तेज हुआ।

स्थानीय हिंदू प्रतिनिधियों का दावा है कि मंदिर की करीब 1000 वर्ग मीटर भूमि पर मदरसे का विस्तार करने की योजना थी। उनका कहना है कि मंदिर को जानबूझकर गिराया गया और उसके बाद परिसर से ईंटें तथा धातु से बनी सामग्री भी हटा ली गई।

पाकिस्तान मसीहा मिल्लत पार्टी के अध्यक्ष असलम परवेज सहोत्रा ने आरोप लगाया कि इस पूरी कार्रवाई में तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान से जुड़े लोग शामिल थे।

पट्टा रद्द होने के बावजूद कब्जा हटाने का आरोप

अल्पसंख्यक संगठनों के अनुसार, मंदिर से लगी जमीन पहले इवैक्यूई ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड ने मदरसे के लिए पट्टे पर दी थी। उनका दावा है कि किराया नहीं चुकाने और नियमों के उल्लंघन के कारण 29 जनवरी 2026 को पट्टा रद्द कर दिया गया था। इसके बाद कथित अवैध कब्जा हटाने के आदेश भी दिए गए, लेकिन इन्हें प्रभावी तरीके से लागू नहीं किया गया।

हिंदू समुदाय के स्थानीय नेता रतन लाल का कहना है कि मंदिर परिसर के आसपास का वातावरण ऐसा बन गया है कि लोग वहां जाने से भी डर रहे हैं। उन्होंने प्रशासन पर सुरक्षा संबंधी चेतावनियों के बावजूद पर्याप्त कार्रवाई नहीं करने का आरोप लगाया।

प्रशासन ने कहा- बारिश से ढहा जर्जर ढांचा

इवैक्यूई ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड और जिला प्रशासन ने मंदिर को जानबूझकर गिराए जाने के आरोपों को खारिज किया है। अधिकारियों का कहना है कि पुराना ढांचा लगातार हुई भारी बारिश का दबाव नहीं सह सका और अपने आप गिर गया।

अधिकारियों ने यह भी कहा कि मंदिर की मूल भूमि किसी को पट्टे पर नहीं दी गई थी। इस तरह मंदिर ढहाने के कारण को लेकर दोनों पक्षों के दावे एक-दूसरे से पूरी तरह अलग हैं।

तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान क्या है?

तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान पाकिस्तान का प्रतिबंधित कट्टरपंथी धार्मिक-राजनीतिक संगठन है। इसकी स्थापना खादिम हुसैन रिजवी ने की थी। नवंबर 2020 में उनकी मृत्यु के बाद संगठन की कमान उनके बेटे साद हुसैन रिजवी के हाथों में आई।

यह संगठन पाकिस्तान के ईशनिंदा कानूनों को लेकर बेहद कठोर रुख के लिए जाना जाता है। संगठन पर हिंसक आंदोलनों और धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाए जाने के आरोप भी लगते रहे हैं।

आसिया बीबी मामले से मिली राष्ट्रीय पहचान

तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान को पाकिस्तान में बड़ी पहचान आसिया बीबी से जुड़े ईशनिंदा मामले के दौरान मिली। संगठन ने उस समय मुमताज कादरी का समर्थन किया था। कादरी ने 2011 में पंजाब के तत्कालीन राज्यपाल सलमान तासीर की हत्या कर दी थी। तासीर ने ईशनिंदा की आरोपी ईसाई महिला आसिया बीबी के प्रति सहानुभूति जताई थी।

इसके बाद तहरीक-ए-लब्बैक ने ईशनिंदा के आरोपियों के खिलाफ कठोर दंड की मांग को लेकर बड़े पैमाने पर आंदोलन किए।

चुनावी राजनीति में भी प्रभाव

सरकारी प्रतिबंधों और सुरक्षा बलों की कार्रवाई के बावजूद तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान का जनाधार बना हुआ है। संगठन ने 2018 और 2024 के आम चुनावों में हिस्सा लिया। हालांकि वह राष्ट्रीय संसद में कोई सीट नहीं जीत सका, लेकिन दोनों चुनावों में उसे 20 लाख से अधिक मत मिले।

2018 में वह कुल मतों के आधार पर पाकिस्तान की पांचवीं सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरा था। 2024 में उसका मत आधार और बढ़ा तथा कुल मतों के लिहाज से वह चौथे स्थान पर रहा।

पाकिस्तान में मंदिरों को लेकर क्यों उठते हैं सवाल?

पाकिस्तान में हिंदू और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के पूजा स्थलों की सुरक्षा लंबे समय से विवाद का विषय रही है। मंदिरों को नुकसान पहुंचाने की घटनाओं के पीछे जमीन और संपत्ति के विवाद, धार्मिक कट्टरता, राजनीतिक तनाव और प्रशासनिक निष्क्रियता जैसे विभिन्न कारणों के आरोप लगाए जाते रहे हैं।

अल्पसंख्यक संगठनों का कहना है कि कई मामलों में स्थानीय प्रशासन पर्याप्त सुरक्षा उपलब्ध नहीं करा पाता। वहीं, प्रत्येक घटना का कारण धार्मिक कट्टरता ही हो, ऐसा भी आवश्यक नहीं है; कई मामलों में भूमि और संपत्ति विवाद भी जुड़े होने के दावे सामने आते हैं।

नारोवाल मंदिर मामले में भी वास्तविक कारण क्या था, यह जांच और उपलब्ध प्रमाणों से ही स्पष्ट होगा। फिलहाल मंदिर गिराए जाने को लेकर अल्पसंख्यक संगठनों के आरोप और प्रशासन की ओर से दिया गया बारिश वाला स्पष्टीकरण, दोनों सामने हैं।



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