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काकोरी के मतवालों की याद में गूंजा बनारस: सर्किट हाउस में उमड़ा राष्ट्रभक्ति का सैलाब, गीतों और तस्वीरों में जीवंत हुई आज़ादी की जंग

by on | 2026-08-09 11:58:34

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काकोरी के मतवालों की याद में गूंजा बनारस: सर्किट हाउस में उमड़ा राष्ट्रभक्ति का सैलाब, गीतों और तस्वीरों में जीवंत हुई आज़ादी की जंग

वाराणसी (बेबाक 24)। 9 अगस्त 1925... इतिहास की वो तारीख जब बिस्मिल, अशफ़ाक़ और लाहिड़ी की टोली ने ब्रिटिश हुकूमत की चूलें हिला दी थीं। उसी काकोरी ट्रेन एक्शन की 101वीं वर्षगांठ की पूर्व संध्या पर शनिवार को धर्मनगरी बनारस का सर्किट हाउस परिसर देशभक्ति के जुनून से सराबोर हो उठा। मौका था 'हर घर तिरंगा' अभियान के तहत आयोजित ऐतिहासिक प्रदर्शनी और सांस्कृतिक संध्या का, जहां हर जुबां पर शहीदों का नाम था और फिज़ा में क्रांति के तराने।

​कार्यक्रम की शुरुआत अमर शहीदों के चित्रों पर पुष्पांजलि और माल्यार्पण के साथ हुई। राजेंद्रनाथ लाहिड़ी, अशफाकउल्ला खां, पंडित रामप्रसाद बिस्मिल और ठाकुर रोशन सिंह जैसे वीरों को नमन करने के लिए जनप्रतिनिधियों, प्रशासनिक अधिकारियों, छात्रों और आम शहरियों का हुजूम उमड़ पड़ा।

तस्वीरों में उकेरी गई क्रांति की दास्तान

सर्किट हाउस में लगी ऐतिहासिक प्रदर्शनी लोगों के लिए आकर्षण का सबसे बड़ा केंद्र रही। काकोरी क्रांति के नायकों का जन्म, उनकी विचारधारा, क्रांतिकारी संगठन में भूमिका, गिरफ्तारी, अदालत के ड्रामे से लेकर फांसी के फंदे तक का पूरा सफर बेहद सजीव ढंग से प्रदर्शित किया गया था। अंग्रेजों की बर्बरता और हमारे नायकों के अदम्य साहस की पूरी कहानी यहां हर एक फ्लैक्स पर साफ झलक रही थी।

मुकदमों के मूल पन्नों और दस्तखतों ने खींचा ध्यान

इस प्रदर्शनी की सबसे खास बात रही—क्रांतिकारियों के दुर्लभ दस्तावेज। शहीदों के असली दस्तखतों की कॉपी, उनके लिखे ऐतिहासिक खत, अदालत के फैसले की प्रतियां और पुरानी दुर्लभ तस्वीरों ने हर देखने वाले को चौंका दिया। खासकर युवा और छात्र-छात्राएं इतिहास के इन सुनहरे पन्नों को अपने कैमरों और यादों में कैद करने के लिए उत्सुक नजर आए।

जब लोकगीतों पर झूम उठा पूरा सभागार

प्रदर्शनी के बाद बारी थी सांस्कृतिक मंच की। लोकगायकों ने जब काकोरी के वीरों की वीरता, त्याग और फांसी के फंदे को चूमने वाले जज्बे पर आधारित अपने गीत छेड़े, तो पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट और "भारत माता की जय" के नारों से गूंज उठा। गीतों के माध्यम से 1925 का वो दौर मानो सर्किट हाउस में उतर आया हो।

नई पीढ़ी ने जाना—क्या थी आज़ादी की कीमत

आयोजन में बड़ी संख्या में स्कूली बच्चों ने शिरकत की। प्रदर्शनी का कोना-कोना घूमकर बच्चों ने समझा कि जिस आज़ादी की हवा में हम सांस ले रहे हैं, उसके पीछे कितने वीरों का खून बहा है। आयोजकों का भी यही कहना था कि आज की पीढ़ी को अपनी मिट्टी के शहीदों से जोड़ने के लिए ऐसे मंच बेहद जरूरी हैं।

नेताओं और अफसरों ने झुकाया सिर

श्रद्धांजलि अर्पित करने वालों में जिला पंचायत अध्यक्ष पूनम मौर्य, एमएलसी धर्मेंद्र सिंह, भाजपा जिलाध्यक्ष राम सकल पटेल, महानगर अध्यक्ष प्रदीप अग्रहरी और सीडीओ प्रखर कुमार सिंह सहित तमाम प्रशासनिक अफसर, शिक्षक व गणमान्य नागरिक मौजूद रहे।

​वक्ताओं ने एक सुर में कहा कि काकोरी स्टेशन के पास ब्रिटिश खजाने को लूटना महज एक घटना नहीं, बल्कि अंग्रेजी सल्तनत के मुंह पर करारा तमाचा था। कार्यक्रम का समापन शहीदों की याद में रखे गए दो मिनट के मौन और उनके विचारों को घर-घर तक पहुंचाने के संकल्प के साथ हुआ।



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