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सऊदी अरब क्यों बच रहा है ईरान से सीधे युद्ध से? ताइवान से 10 गुना महंगी कीमत पर ड्रोन खरीदने के पीछे क्या है गेम प्लान?

by admin@bebak24.com on | 2026-07-15 19:56:12

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सऊदी अरब क्यों बच रहा है ईरान से सीधे युद्ध से? ताइवान से 10 गुना महंगी कीमत पर ड्रोन खरीदने के पीछे क्या है गेम प्लान?

रियाद/वॉशिंगटन (बेबाक24): मध्य-पूर्व (मिडिल ईस्ट) में भू-राजनीतिक (Geopolitical) समीकरण 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के बाद से पूरी तरह बदल चुके हैं। ईरान ने जवाबी कार्रवाई में मिसाइल और ड्रोन हमलों का रुख गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल (GCC) देशों—विशेष रूप से संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और सऊदी अरब—की तरफ मोड़ दिया है।

इस बदलते युद्ध के बीच, अमेरिकी मीडिया आउटलेट 'ब्लूमबर्ग' की एक हालिया रिपोर्ट ने वैश्विक रक्षा विशेषज्ञों को चौंका दिया है, जिसके मुताबिक सऊदी अरब ताइवान से 10 गुना अधिक कीमत चुकाकर रिकॉर्ड संख्या में ड्रोन खरीद रहा है। आखिर सऊदी अरब ईरान के सीधे हमलों के बावजूद सीधे युद्ध से क्यों बच रहा है? और इस महंगी रक्षा डील के पीछे रियाद की क्या दुविधा है? 'बेबाक24' की यह विशेष सामरिक रिपोर्ट:

ताइवान से 10 गुना महंगी कीमत पर ड्रोन खरीदने का रहस्य

ताइपे (ताइवान) के वित्त मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, सऊदी अरब पिछले महीने ताइवान से ड्रोन खरीदने वाला दुनिया का सबसे बड़ा खरीदार बन गया है:

  • रिकॉर्ड डील: सऊदी अरब ने 4.72 करोड़ डॉलर की कीमत के कुल 3,260 ड्रोन खरीदे हैं। जून 2023 के बाद से यह किसी भी देश द्वारा एक महीने में की गई सबसे बड़ी खरीद है।

  • 10 गुना ज्यादा भुगतान: जहां वैश्विक बाजार में इस श्रेणी (7 से 15 किलोग्राम वजन) के ड्रोन की औसत निर्यात कीमत 1,464 डॉलर प्रति ड्रोन है, वहीं सऊदी अरब ने इसके लिए औसतन 14,472 डॉलर प्रति ड्रोन का भुगतान किया है।

  • सैन्य और औद्योगिक उपयोग: हालांकि ब्लूमबर्ग का कहना है कि यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि सऊदी इन ड्रोनों का क्या करेगा, लेकिन रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि इनका उपयोग ईरान समर्थित हवाई खतरों की निगरानी और सैन्य अभियानों में किया जा सकता है।

सऊदी अरब क्यों बच रहा है ईरान से सीधे सैन्य टकराव से?

दशकों पुराने अविश्वास और हालिया हमलों (रास तनूरा और यनबू में अरामको रिफाइनरी को पहुंचे नुकसान) के बावजूद सऊदी अरब ईरान पर सीधे पलटवार करने से कतरा रहा है। इसके पीछे सेंटर फॉर स्ट्रैटिजिक इंटरनेशनल स्टडीज (CSIS) की रिपोर्ट और पूर्व अमेरिकी राजदूत माइकल रैटनी ने तीन मुख्य कारण बताए हैं:

  1. अमेरिकी सुरक्षा गारंटी पर बढ़ता अविश्वास: सऊदी अरब को डर है कि अमेरिका ने खाड़ी देशों से सलाह किए बिना ईरान पर युद्ध तो शुरू कर दिया, लेकिन वह उसकी पूरी सुरक्षा नहीं करेगा। रियाद को अंदेशा है कि अमेरिका किसी भी वक्त 'मिशन पूरा हुआ' घोषित कर पीछे हट जाएगा और बाद के गंभीर नतीजों से सऊदी को अकेले निपटना पड़ेगा।

  2. आर्थिक स्थिरता को खतरा: सऊदी अरब (MBS के विज़न 2030 के तहत) अपनी अर्थव्यवस्था को तेल निर्भरता से बाहर निकालने के लिए अरबों डॉलर का निवेश कर रहा है। सीधा युद्ध इस पूरे आर्थिक मॉडल और विदेशी निवेश को तबाह कर देगा।

  3. अराजकता और कट्टरपंथ का डर: सऊदी अरब को डर है कि अगर सीधे युद्ध से ईरान में सत्ता का पतन हुआ या वह अराजकता में डूबा, तो पूरे क्षेत्र में एक बड़ा शरणार्थी संकट और नए सिरे से कट्टरपंथ का उदय हो सकता है।

अमेरिका को लेकर विरोधाभास: डोनाल्ड ट्रंप का कड़ा रुख

खाड़ी देशों के सामने सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि वे अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिकी एयर डिफेंस पर निर्भर हैं, लेकिन अमेरिका उन्हें सुरक्षा देने में पूरी तरह कामयाब नहीं रहा है। प्रिंस सुल्तान एयर बेस पर अमेरिकी वायुसेना के बोइंग E-3 सेंट्री और KC-135 स्ट्रैटोटैंकर विमानों का नष्ट होना इसका सबूत है।

इसी बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ओवल ऑफिस में दो-टूक कहा कि वह चाहते हैं कि खाड़ी के देश होर्मुज़ स्ट्रेट (Strait of Hormuz) की सुरक्षा में अमेरिकी सेना की मौजूदगी के बदले भारी भुगतान (पेमेंट) करें। पूर्व अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने भी चेतावनी दी है कि अमेरिका पर भरोसा कम होने के कारण खाड़ी देश अब वॉशिंगटन के विकल्प तलाश रहे हैं, जिसका सीधा फायदा चीन और रूस को मिल रहा है।

सुरक्षा का 'प्लान-B': पाकिस्तान, यूक्रेन और ग्रीस के साथ नई साझेदारियां

अमेरिका पर निर्भरता कम करने के लिए सऊदी अरब ने अपनी रक्षा साझेदारियों में तेजी से विविधता लानी शुरू कर दी है:

  • पाकिस्तान की बड़ी सैन्य तैनाती: 11 अप्रैल 2026 को सऊदी-पाकिस्तान डिफेंस पैक्ट के तहत करीब 13,000 पाकिस्तानी सैनिक और वायुसेना के लड़ाकू विमान धहरान स्थित किंग अब्दुलअज़ीज़ एयर बेस पर पहुंच गए हैं। 1991 के खाड़ी युद्ध के बाद यह सऊदी में पाकिस्तान की सबसे बड़ी तैनाती है।

  • यूक्रेन के साथ 10 वर्षीय ड्रोन डील: 27 मार्च 2026 को जेद्दा में राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की और क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसके तहत यूक्रेन ने ईरान के शाहेद-136 ड्रोन को मार गिराने के अपने अनुभव के आधार पर 200 से अधिक एंटी-ड्रोन विशेषज्ञ खाड़ी देशों में भेजे हैं।

  • ग्रीस का मिसाइल डिफेंस: 19 मार्च 2026 को यनबू में तैनात ग्रीस की पैट्रियट PAC-3 बैटरी ने यनबू रिफाइनरी की ओर दागी गईं ईरान की दो बैलिस्टिक मिसाइलों को सफलतापूर्वक मार गिराया।

मध्य-पूर्व संकट और सऊदी अरब की रक्षा रणनीति: मुख्य फैक्ट्स

मुख्य बिंदु / रणनीतिक कदमसऊदी अरब की नई रक्षा नीति के तथ्य
ताइवान ड्रोन डील4.72 करोड़ डॉलर में 3,260 ड्रोन; सामान्य से 10 गुना अधिक कीमत पर खरीद।
हवाई खतरे (मार्च-अप्रैल 2026)सऊदी रक्षा मंत्रालय ने 900 हवाई खतरों (ड्रोन/मिसाइल) को इंटरसेप्ट किया।
पाकिस्तानी सेना की तैनातीकिंग अब्दुलअज़ीज़ एयर बेस पर 13,000 सैनिक और लड़ाकू विमान तैनात।
यूक्रेनी रक्षा गठजोड़ईरानी शाहेद-136 ड्रोन का मुकाबला करने के लिए यूक्रेन के साथ 10 साल का समझौता।
ग्रीस की सैन्य कार्रवाईपैट्रियट मिसाइल सिस्टम से ईरान की 2 बैलिस्टिक मिसाइलों को हवा में ही किया नष्ट।

बेबाक24 टेक

सऊदी अरब का ताइवान से आनन-फानन में 10 गुना ज्यादा कीमत देकर भारी मात्रा में ड्रोन खरीदना और पाकिस्तान-यूक्रेन-ग्रीस जैसे देशों को अपनी धरती पर तैनात करना यह साफ संकेत देता है कि रियाद अब वाशिंगटन के 'सुरक्षा छाते' के भरोसे हाथ पर हाथ धरकर नहीं बैठा है। डोनाल्ड ट्रंप की "पहले भुगतान करो, फिर सुरक्षा पाओ" की कूटनीति ने खाड़ी देशों के भीतर एक गहरा असुरक्षा का भाव पैदा कर दिया है।

बेबाक24 का मानना है कि क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) का ईरान से सीधे न उलझने का फैसला एक सोची-समझी कूटनीति है। वे जानते हैं कि जैसे ही ईरान ने होर्मुज़ स्ट्रेट को पूरी तरह ब्लॉक किया, वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ-साथ सऊदी का तेल बाजार भी घुटनों पर आ जाएगा। सऊदी अरब इस समय सीधे युद्ध के बजाय अपने चारों तरफ रक्षा की एक ऐसी बहुस्तरीय (Multilayered) दीवार खड़ी कर रहा है, जिसमें अमेरिकी तकनीक तो हो, लेकिन उसका नियंत्रण पूरी तरह अमेरिका या उसकी शर्तों के अधीन न रहे। मध्य-पूर्व का यह नया 'सुरक्षा आर्किटेक्चर' आने वाले समय में वैश्विक राजनीति की दिशा तय करेगा।



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