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अर्दोआन के खिलाफ नाकाम सैन्य तख्तापलट के 10 साल पूरे; इन 10 वर्षों ने तुर्किये की राजनीति, सेना और कूटनीति को कैसे हमेशा के लिए बदल दिया?

by admin@bebak24.com on | 2026-07-15 19:01:11

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अर्दोआन के खिलाफ नाकाम सैन्य तख्तापलट के 10 साल पूरे; इन 10 वर्षों ने तुर्किये की राजनीति, सेना और कूटनीति को कैसे हमेशा के लिए बदल दिया?

इस्तांबुल (बेबाक24): आधुनिक तुर्किये (तुर्की) के इतिहास की सबसे खौफनाक और अभूतपूर्व रात को 10 साल पूरे हो चुके हैं। 15 जुलाई 2016 की उस रात जब अंकारा की सड़कों पर लड़ाकू विमान बेहद कम ऊंचाई पर उड़ रहे थे, संसद पर बम बरसाए जा रहे थे और इस्तांबुल के बोस्फोरस ब्रिज (अब '15 जुलाई शहीद पुल') पर टैंकों के सामने निहत्थे नागरिक खड़े थे।

राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन की एक मोबाइल स्क्रीन (लाइव वीडियो कॉल) से की गई अपील पर लाखों लोग सड़कों पर उतरे और महज कुछ घंटों में इस खूनी तख्तापलट की कोशिश को नाकाम कर दिया गया। इस हिंसा में 184 आम नागरिकों सहित 253 लोगों की मौत हुई थी। भले ही वह सैन्य तख्तापलट टल गया, लेकिन पिछले 10 वर्षों में इसने तुर्किये के भूगोल, लोकतंत्र, सेना और कूटनीति को पूरी तरह बदलकर रख दिया। 'बेबाक24' की यह विशेष राजनीतिक और ऐतिहासिक समीक्षा रिपोर्ट:

तख्तापलट के बाद आधुनिक इतिहास का सबसे बड़ा 'सफाई अभियान' (Purge)

अर्दोआन सरकार ने इस साजिश के पीछे अमेरिका में रह रहे अपने पूर्व सहयोगी और इस्लामी धर्मगुरु फ़ेतहुल्लाह गुलेन (जिनकी 2024 में मृत्यु हो चुकी है) के नेटवर्क को जिम्मेदार ठहराया। इसके बाद तुर्किये ने जो कदम उठाए, उसने पूरी नौकरशाही की सूरत बदल दी:

  • लगातार आपातकाल: तख्तापलट के बाद देश में आपातकाल लागू किया गया, जिसे 2018 तक सात बार बढ़ाया गया।

  • लाखों पर गिरी गाज: गुलेन आंदोलन से जुड़े होने के संदेह में सेना के शीर्ष जनरलों, वरिष्ठ अधिकारियों, हजारों जजों, सरकारी वकीलों, पुलिसकर्मियों, प्रोफेसरों और सिविल सेवकों को या तो गिरफ्तार कर लिया गया या नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया।

  • संस्थानों पर ताले: गुलेन नेटवर्क से जुड़े सैकड़ों निजी स्कूल, विश्वविद्यालय और चैरिटी संस्थान हमेशा के लिए बंद कर दिए गए। आलोचकों का मानना है कि इस कार्रवाई की आड़ में अर्दोआन ने अपनी मुखालफत करने वाली हर आवाज को दबा दिया।

संसदीय लोकतंत्र का खात्मा और 'सुपर-प्रेसिडेंट' अर्दोआन का उदय

इस नाकाम तख्तापलट का सबसे बड़ा राजनीतिक परिणाम 2017 में हुए संवैधानिक जनमत संग्रह के रूप में सामने आया:

  • खत्म हुआ प्रधानमंत्री का पद: साल 2018 में नए बदलाव लागू होने के साथ ही तुर्किये में दशकों पुरानी संसदीय प्रणाली को खत्म कर दिया गया और प्रधानमंत्री का पद इतिहास बन गया।

  • शक्तियों का भारी केंद्रीकरण: तुर्किये में शक्तिशाली 'कार्यकारी राष्ट्रपति प्रणाली' लागू की गई। इसके बाद पूरी सत्ता अर्दोआन के एक अकेले दफ्तर में सिमट गई।

  • कमजोर हुई संसद: थिंक टैंक 'फ्रीडम हाउस' की 2026 की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, इस प्रणाली के बाद तुर्किये के सांसदों की नीतियां बनाने की ताकत बेहद कमजोर हो गई है और राष्ट्रपति जब चाहें स्वतंत्र सरकारी संस्थाओं के काम में सीधा दखल देते हैं।

अतातुर्क के धर्मनिरपेक्ष 'गार्डियन' (सेना) के पर कतरे गए

मुस्तफा कमाल अतातुर्क द्वारा स्थापित आधुनिक तुर्किये गणराज्य में वहां की सेना खुद को धर्मनिरपेक्षता की संरक्षक (गार्डियन) मानती थी और इतिहास में तीन बार सीधे तख्तापलट कर चुकी थी। लेकिन 2016 के बाद सेना की यह ताकत हमेशा के लिए छीन ली गई:

  • नागरिक नियंत्रण: सशस्त्र बलों को पूरी तरह से नागरिक कमान (संसद व राष्ट्रपति) के अधीन लाया गया।

  • सैन्य अकादमियों का पुनर्गठन: सेना की भर्ती प्रक्रिया में बदलाव किए गए, सैन्य अकादमियों और अस्पतालों को बंद या पुनर्गठित किया गया ताकि भविष्य में बगावत की कोई गुंजाइश न बचे।

  • राजनीति से सेना बाहर: यिलदिरिम बेयाज़ित विश्वविद्यालय के प्रोफेसर नूरी सालिक के अनुसार, "15 जुलाई वह पहला मौका था जब जनता ने सेना का खुलकर विरोध किया। अब सेना तुर्किये की राजनीति को प्रभावित करने की अपनी क्षमता पूरी तरह खो चुकी है।"

तुर्किये में आए युगांतकारी बदलावों पर एक नजर (2016-2026)

क्षेत्र / विषयतख्तापलट (2016) से पहलेवर्तमान स्थिति (2026)
शासन प्रणालीसंसदीय लोकतंत्र (प्रधानमंत्री और संसद शक्तिशाली)।कार्यकारी राष्ट्रपति प्रणाली (राष्ट्रपति के पास असीमित अधिकार)।
सेना की भूमिकाराजनीति और सरकार की नीतियों पर मजबूत नियंत्रण और हस्तक्षेप।पूरी तरह नागरिक प्रशासन के अधीन; हस्तक्षेप की क्षमता शून्य
प्रेस स्वतंत्रता रैंकिंगतुर्किये मध्य-स्थानों पर संघर्षरत था।'रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स' 2026 के अनुसार, 180 देशों में 163वें स्थान पर
विदेश नीति का झुकावपूरी तरह पश्चिमी देशों (NATO और अमेरिका) की ओर झुकाव।विविध और आक्रामक नीति; रूस के साथ करीबी और सीरिया में सैन्य अभियान।

मानवाधिकारों का हनन और विपक्ष पर बड़ा अदालती प्रहार

पिछले एक दशक में तुर्किये में तानाशाही प्रवृत्तियों में भारी बढ़ोतरी देखी गई है:

  • विपक्ष पर निशाना: मार्च 2025 में इस्तांबुल के लोकप्रिय मेयर और भविष्य में अर्दोआन के सबसे मजबूत प्रतिद्वंद्वी माने जाने वाले एक्रेम इमामोउलू को भ्रष्टाचार के आरोपों में गिरफ्तार कर लिया गया। मई 2026 में उनकी पार्टी (CHP) के नेतृत्व को भी अदालत के जरिए बदल दिया गया, जिसे विपक्ष 'न्यायिक तख्तापलट' कह रहा है।

  • प्रेस पर शिकंजा: अभिव्यक्ति की आजादी का दायरा इतना सिमट गया है कि राष्ट्रपति का मजाक उड़ाने या अपमान करने के आरोप में हाल ही में एक लोकप्रिय स्टैंड-अप कॉमेडियन और कई पत्रकारों को जेल में डाल दिया गया।

विदेश नीति में भारी बदलाव: नाटो सदस्य होकर भी रूस से दोस्ती

15 जुलाई की घटना के बाद तुर्किये ने महसूस किया कि सुरक्षा के लिए वह पूरी तरह पश्चिमी देशों पर निर्भर नहीं रह सकता:

  • सीरिया में सैन्य अभियान: तुर्किये ने अपनी सुरक्षा को सर्वोपरि रखते हुए उत्तरी सीरिया में तीन बड़े सैन्य अभियान चलाए ताकि वाईपीजी (YPG) और कुर्द विद्रोहियों को कुचला जा सके।

  • रूस से S-400 डील: नाटो (NATO) का प्रमुख सदस्य होने के बावजूद अर्दोआन ने रूस से S-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम खरीदा। इस फैसले से भड़के अमेरिका ने तुर्किये को F-35 फाइटर जेट प्रोग्राम से बाहर कर दिया था और उस पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए थे (हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में इन प्रतिबंधों को हटाने के संकेत दिए हैं)।

  • यूरोपीय संघ (EU) से दूरी: मानवाधिकारों के हनन और तानाशाही रवैये के कारण यूरोपीय संघ में शामिल होने की तुर्किये की बातचीत 2018 से पूरी तरह ठप पड़ी है।

बेबाक24 टेक

15 जुलाई 2016 की नाकाम तख्तापलट की कोशिश तुर्किये के इतिहास का वह मोड़ थी जिसने देश को सुरक्षा के नाम पर एक 'पुलिस स्टेट' में तब्दील कर दिया। अर्दोआन ने जनता के उस स्वतःस्फूर्त प्रतिरोध (जो लोकतंत्र को बचाने के लिए था) का इस्तेमाल अपनी व्यक्तिगत सत्ता को असीमित बनाने के लिए किया। आज का तुर्किये बाहरी तौर पर स्थिर और मजबूत सैन्य ताकत जरूर नजर आता है, लेकिन आंतरिक रूप से वह अपनी लोकतांत्रिक संस्थाओं, स्वतंत्र न्यायपालिका और अभिव्यक्ति की आजादी की बलि चढ़ा चुका है।

बेबाक24 का मानना है कि सेना को बैरक में वापस भेजना अर्दोआन की एक ऐतिहासिक सफलता हो सकती है, लेकिन एक ऐसे लोकतंत्र का निर्माण करना जहां विपक्ष के सबसे मजबूत नेता (इस्तांबुल के मेयर) जेल में हों और प्रेस की आजादी 163वें पायदान पर हो, यह साबित करता है कि तुर्किये ने तख्तापलट तो टाल दिया, लेकिन वह तानाशाही के एक ऐसे चक्रव्यूह में फंस गया है जिससे बाहर निकलना अब बेहद मुश्किल है।



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