by admin@bebak24.com on | 2026-07-12 20:48:47
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नई दिल्ली (बेबाक24): प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आधिकारिक न्यूज़ीलैंड यात्रा द्विपक्षीय समझौतों से ज्यादा अब एक तीखे कूटनीतिक और राजनीतिक विवाद को लेकर सुर्खियों में आ गई है। रविवार को ऑकलैंड में विदेश मंत्रालय की विशेष प्रेस ब्रीफिंग के दौरान न्यूज़ीलैंड की एक महिला पत्रकार ने सीधे सवाल दाग दिया कि "प्रधानमंत्री मोदी ने न्यूज़ीलैंड के मीडिया के लिए प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों नहीं की?"
इस सवाल पर भारतीय विदेश मंत्रालय के सचिव (पूर्व) रुद्रेंद्र टंडन की मुस्कुराहट और उनके द्वारा दिए गए 'विशिष्ट भारतीय राजनेता' वाले जवाब ने सोशल मीडिया से लेकर भारत के सियासी गलियारों तक एक नई बहस छेड़ दी है। 'बेबाक24' की विशेष कूटनीतिक रिपोर्ट:
न्यूज़ीलैंड की पत्रकार के सवाल पर सचिव रुद्रेंद्र टंडन ने अपनी प्रतिक्रिया की शुरुआत 'डेजा वू' (ऐसा अहसास कि यह पहले भी हो चुका है) शब्द से की। उन्होंने पीएम मोदी की कार्यशैली का बचाव करते हुए कहा:
"प्रधानमंत्री मोदी एक विशुद्ध भारतीय राजनेता हैं और आम तौर पर भारतीय राजनेता अपने मतदाताओं से सीधे संपर्क को प्राथमिकता देते हैं। आपको याद रखना चाहिए कि भारत का अधिकांश मतदाता वर्ग ग्रामीण क्षेत्रों में रहता है। वे सीधे संवाद पसंद करते हैं; उन्हें ऊपर से समझाया जाना या बिचौलियों (मीडिया) के जरिए बात पहुंचाना पसंद नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने मतदाताओं से सीधे संवाद करने की कला में महारत हासिल की है और यह उनके लिए बेहद प्रभावी रहा है, तभी वे लगातार तीसरी बार देश के प्रधानमंत्री चुने गए हैं।"
यह 'डेजा वू' दरअसल मई 2026 में पीएम मोदी की नॉर्वे यात्रा से जुड़ा है, जहाँ नॉर्वे की पत्रकार हेला लेंग ने पीएम मोदी से सवाल पूछने की कोशिश की थी, लेकिन वे आगे बढ़ गए थे। न्यूज़ीलैंड ब्रीफिंग के इस ताजा वीडियो को री-शेयर करते हुए हेला लेंग ने अपने 'एक्स' (ट्विटर) हैंडल पर तीखा तंज कसा:
"यह बेहद दिलचस्प जवाब था। क्या इसका मतलब यह है कि प्रधानमंत्री आमतौर पर टाउन हॉल जैसे कार्यक्रमों में लोगों से मिलते हैं और उनकी रोज़मर्रा की समस्याओं से जुड़े सवालों के जवाब देते हैं? मैंने उन्हें ज़मीनी स्तर के आंदोलन 'कॉकरोच जनता पार्टी' के साथ सीधे संवाद करते नहीं देखा है। अगर मैं गलत हूँ, तो कृपया मुझे सुधारिए।"
भारतीय राजनयिक के इस बयान को लेकर कांग्रेस और विपक्षी नेताओं ने सरकार को आड़े हाथों लिया है और सार्वजनिक जवाबदेही पर सवाल उठाए हैं:
सुप्रिया श्रीनेत (कांग्रेस प्रवक्ता): "तर्क सबसे पहले कमरे से बाहर चला गया। उसके बाद जवाबदेही और लोकतंत्र भी पीछे-पीछे निकल गए। प्रेस कॉन्फ्रेंस का मकसद सवाल पूछना और सरकारों को जवाबदेह ठहराना होता है। एकतरफा संवाद कभी भी सार्वजनिक जवाबदेही का विकल्प नहीं हो सकता।"
पवन खेड़ा (वरिष्ठ कांग्रेस नेता): "टंडन जी की टिप्पणी लोकतंत्र के चौथे स्तंभ (मीडिया) को सरकार की सुविधा का विषय बनाकर पेश करती है। जनता तक सीधे पहुंच बनाना, मीडिया की जवाबदेही तय करने वाली भूमिका का विकल्प नहीं हो सकता। यह तर्क स्पष्ट रूप से लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।"
प्रियंका चतुर्वेदी (पूर्व सांसद): उन्होंने तंज कसते हुए एक अलग नजरिया रखा—"अब विदेशी पत्रकारों को समझ आ गया है कि भारत में सुर्खियां बटोरने का सबसे आसान तरीका पीएम मोदी से प्रेस कॉन्फ्रेंस पर सवाल पूछना है। नॉर्वे की पत्रकार इस सवाल के बाद 1 लाख फॉलोअर्स पा गईं। हम जवाबदेही की नहीं, कंटेंट आधारित पत्रकारिता के दौर में जी रहे हैं।"
पेरिस स्थित संस्था 'रिपोर्टर्स सां फ्रंटियर्स' (RSF) के साल 2026 के वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स के आंकड़े इस बहस को और हवा दे रहे हैं:
| देश | वैश्विक रैंकिंग (2026) | प्रेस फ्रीडम स्कोर | विशेषता / स्थिति |
| नॉर्वे | नंबर 1 | अत्यधिक उच्च | पिछले 10 सालों से लगातार शीर्ष पर काबिज। |
| न्यूज़ीलैंड | नंबर 22 | 77.38 | स्वतंत्र और निष्पक्ष मीडिया व्यवस्था। |
| भारत | 157वें स्थान पर | 31.96 | 180 देशों की सूची में लगातार चिंताजनक गिरावट। |
इसमें कोई दोराय नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जनता से सीधे संवाद करने, रैलियों को संबोधित करने और 'मन की बात' जैसे एकतरफा संवाद के जरिए देश के ग्रामीण व शहरी वोटर्स को जोड़ने में माहिर हैं—तीसरी बार ऐतिहासिक रूप से चुनकर आना इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। लेकिन एक राजनयिक द्वारा अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रेस कॉन्फ्रेंस न करने की वजह "भारत का ग्रामीण होना" बताना कूटनीतिक रूप से बेहद कमजोर और अतार्किक है।
बेबाक24 का मानना है कि लोकतंत्र में स्वतंत्र मीडिया कोई 'बिचौलिया' नहीं, बल्कि जनता की तरफ से सत्ता से कठिन सवाल पूछने का एक संवैधानिक माध्यम है। विदेशी धरती पर जब भारतीय राजनयिक इस तरह के रक्षात्मक तर्क देते हैं, तो इससे वैश्विक मंचों पर भारत की लोकतांत्रिक साख और प्रेस स्वतंत्रता (Press Freedom) की रैंकिंग को ही नुकसान पहुँचता है। संवाद की अपनी कला है, लेकिन लोकतंत्र की खूबसूरती 'एकतरफा संवाद' में नहीं, बल्कि 'सवालों के खुले जवाब' देने में निहित है।
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