by admin@bebak24.com on | 2026-07-12 20:40:33
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तेहरान/वॉशिंगटन (बेबाक24): पश्चिम एशिया को महायुद्ध की विभीषिका से बाहर निकालने के लिए तीन हफ्ते पहले ओमान के सहयोग से जो युद्धविराम कराया गया था, वह पूरी तरह जमीनी स्तर पर मलबे में तब्दील हो चुका है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तुर्की में एक बड़ा बयान देते हुए साफ एलान कर दिया है कि "सीज़फ़ायर अब समाप्त हो चुका है।" इसके तुरंत बाद फारस की खाड़ी में मिसाइल हमलों का वही दौर दोबारा शुरू हो गया है, जो इस समझौते से पहले चल रहा था।
दुनिया भर के ऊर्जा बाजार और कूटनीतिक हलकों में यह सवाल उठ रहा है कि आखिर 60 दिनों की अवधि के लिए हुआ यह समझौता इतनी जल्दी क्यों टूट गया?
अंतरराष्ट्रीय मामलों के शोधकर्ता हमीदरेज़ा अज़ीज़ी के अनुसार, इस शांति समझौते के टूटने की सबसे बड़ी वजह इसके वाक्यों की अस्पष्टता थी, जिसका दोनों देशों ने अपनी सुविधानुसार अलग-अलग मतलब निकाला:
होर्मुज़ स्ट्रेट पर विवाद: समझौते में लिखा था कि ईरान 60 दिनों तक होर्मुज़ जलमार्ग से गुजरने वाले कमर्शियल जहाजों से कोई शुल्क नहीं लेगा और सुरक्षित आवाजाही के लिए 'सर्वोत्तम प्रयास' करेगा।
ईरान का पक्ष: ईरान का मानना था कि होर्मुज़ का रणनीतिक और प्रशासनिक नियंत्रण उसी के पास रहेगा, उसने केवल 60 दिनों के लिए टैक्स की रियायत दी है।
अमेरिका का पक्ष: अमेरिका का मानना था कि इस अवधि में जहाजों की आवाजाही पूरी तरह अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत स्वतंत्र होनी चाहिए और इसमें ईरान की मंजूरी या किसी प्रतिबंध की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए।
असल लड़ाई इस बात की नहीं थी कि जंग रुक जाए, बल्कि लड़ाई इस बात की थी कि जंग खत्म होने के बाद मिडिल ईस्ट के नक्शे पर सुपरपावर कौन कहलाएगा। 60 दिन की यह अवधि शांति के लिए नहीं, बल्कि अंतिम कूटनीतिक मेज पर बढ़त हासिल करने की होड़ बन गई:
वैकल्पिक समुद्री मार्ग: अमेरिका और ओमान मिलकर होर्मुज़ के दक्षिणी हिस्से में एक वैकल्पिक समुद्री मार्ग विकसित करने में जुट गए, ताकि दुनिया के 20% तेल व्यापार के लिए ईरान पर निर्भरता हमेशा के लिए खत्म की जा सके। ईरान इसे अपनी सबसे बड़ी रणनीतिक ताकत को छीनने की अमेरिकी साजिश के रूप में देख रहा था।
लेबनान में भूमिका पर रार: ईरान का मानना था कि समझौते के जरिए लेबनान की भविष्य की राजनीति में उसकी भूमिका को स्वीकार किया गया है, जबकि अमेरिका, इजरायल और लेबनान सरकार कूटनीतिक प्रयासों से हिज्बुल्लाह और ईरान के प्रभाव को पूरी तरह दरकिनार करने की कोशिश में लग गए।
शुरुआती समझौते के दस्तावेज में आर्थिक लाभ और खाड़ी देशों (Gulf Countries) द्वारा ईरान के पुनर्निर्माण के लिए निवेश की बात कही गई थी। लेकिन अमेरिका ने बाद में इस आर्थिक मदद को एक कूटनीतिक जाल में बदल दिया:
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने खाड़ी देशों की यात्रा के दौरान नई शर्त रख दी कि ईरान में निवेश तभी संभव होगा, जब तेहरान अपने घातक मिसाइल और ड्रोन कार्यक्रम को बंद करेगा।
ईरान के रक्षा मंत्रालय ने इसे अपनी संप्रभुता पर हमला माना। वैसे भी, ईरान ने हालिया युद्ध के चरम पर अपने ड्रोन उत्पादन को तीन गुना बढ़ा लिया था, ऐसे में वह अमेरिका के सामने घुटने टेकने को कतई तैयार नहीं था।
शिकागो विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर रॉबर्ट पेप ने इस स्थिति को बहुत सटीक तरीके से परिभाषित किया है। उनके अनुसार, यह दोनों देशों के लिए 'तनाव बढ़ने का जाल' बन चुका था:
"इस युद्ध के बाद ईरान रणनीतिक रूप से पहले से अधिक मजबूत होकर उभरा है और उसने अपनी शर्तें मनवाई थीं। समस्या यह है कि डोनाल्ड ट्रंप अपनी इस रणनीतिक नाकामी को स्वीकार नहीं करना चाहते। ऐसे में जब एक पक्ष कोई सीमित कार्रवाई करता है, तो दूसरा पक्ष अपनी नाक बचाने के लिए जवाबी हमला करता है। कोई भी पक्ष पूर्ण युद्ध नहीं चाहता, लेकिन दोनों के कदम उन्हें महायुद्ध की ओर धकेल रहे हैं।"
| टकराव का मुद्दा | ईरान का रुख व उद्देश्य | अमेरिका व सहयोगियों की रणनीति |
| होर्मुज़ जलमार्ग | प्रबंधन पर पूर्ण संप्रभुता और नियंत्रण बनाए रखना। | ईरान पर निर्भरता खत्म करने के लिए वैकल्पिक मार्ग बनाना। |
| लेबनान व हिज्बुल्लाह | क्षेत्र में अपने रणनीतिक व राजनीतिक लाभ को स्थायी करना। | ईरान के प्रभाव को सीमित कर इजरायल की सुरक्षा पक्की करना। |
| रक्षा कार्यक्रम | प्रतिबंधों के बावजूद मिसाइल व ड्रोन क्षमता (3 गुना वृद्धि) को बढ़ाना। | आर्थिक निवेश रोकने की धमकी देकर रक्षा कार्यक्रम पर रोक लगाना। |
| नेगोशिएशन का तरीका | सुप्रीम लीडर मोजतबा ख़ामेनेई का रुख: 'खून का बदला' और कोई समझौता नहीं। | डोनाल्ड ट्रंप का रुख: आक्रामक दबाव और अमेरिकी सैन्य वर्चस्व की वापसी। |
अमेरिका और ईरान के बीच हुआ यह सीज़फ़ायर दरअसल कोई स्थायी शांति समझौता नहीं था, बल्कि यह केवल समय काटने का एक अस्थायी ढांचा था, जिसमें दोनों पक्षों ने मुश्किल और कड़वे मुद्दों को बाद के लिए टाल दिया था। जब बुनियाद ही अविश्वास और अस्पष्ट शर्तों पर टिकी हो, तो उस पर शांति की इमारत खड़ी नहीं की जा सकती।
बेबाक24 का मानना है कि इस कूटनीतिक विफलता की सबसे बड़ी मार वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाली है। होर्मुज़ जलसंधि के पूरी तरह ब्लॉक होने और जीएफएस गैलेक्सी जैसे कमर्शियल जहाजों पर लगातार हमलों से अंतरराष्ट्रीय नौवहन असुरक्षित हो चुका है। 'न पूरी शांति, न पूरा युद्ध' की यह स्थिति किसी भी समय एक परमाणु या बड़े वैश्विक संकट को जन्म दे सकती है। भारत जैसे देशों के लिए, जिनके नागरिक इन जहाजों पर तैनात हैं और जिनकी ऊर्जा जरूरतें खाड़ी देशों से पूरी होती हैं, यह सीज़फ़ायर का टूटना एक बहुत बड़ी खतरे की घंटी है।
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