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जुलाई में 'अप्रैल जैसी धूप'; आखिर भारत के कई इलाकों से क्यों गायब हो गए बादल? जानिए क्या है यह 'मानसून ब्रेक' और अल नीनो का डबल अटैक

by admin@bebak24.com on | 2026-07-12 20:32:30

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जुलाई में 'अप्रैल जैसी धूप'; आखिर भारत के कई इलाकों से क्यों गायब हो गए बादल? जानिए क्या है यह 'मानसून ब्रेक' और अल नीनो का डबल अटैक

वाराणसी ब्यूरो (बेबाक24): जहाँ एक तरफ पूर्वी भारत के कुछ हिस्सों में झमाझम बारिश हो रही है, वहीं दिल्ली-एनसीआर, उत्तर-पश्चिम भारत के मैदानी इलाकों और मध्य भारत के एक बड़े हिस्से में अचानक मौसम शुष्क हो गया है और आसमान साफ हो गया है। मौसम विभाग (IMD) द्वारा जारी 11 जुलाई की सैटेलाइट तस्वीरों ने वैज्ञानिकों को हैरत और चिंता में डाल दिया है—तस्वीरों में अरब सागर से लेकर देश के अंदरूनी हिस्सों तक बादलों का नामोनिशान गायब दिख रहा है।

मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, देश इस समय एक बेहद लंबे 'मानसून ब्रेक' और 'अल नीनो' के दोहरे चक्रव्यूह में फंस गया है। स्थिति जुलाई के दूसरे सप्ताह जैसी न लगकर, 12 अप्रैल की चिलचिलाती सुबह जैसी दिखाई दे रही है। 'बेबाक24' की विशेष खोजी रिपोर्ट:

क्या होता है 'मानसून ब्रेक'? क्यों रूठ जाते हैं बादल?

मौसम विज्ञान की भाषा में, मानसून के मौसम (जुलाई-अगस्त) के दौरान जब किसी क्षेत्र में एकाध हफ्ते या उससे अधिक समय के लिए बारिश पूरी तरह रुक जाती है और मौसम शुष्क हो जाता है, तो उसे 'मानसून ब्रेक' कहा जाता है।

यह क्यों और कैसे होता है?

स्काईमेट वेदर के प्रमुख महेश पहलावत के मुताबिक, यह हवाओं के रुख और दबाव का खेल है:

  • मानसून टर्फ का खिसकना: जब भारत में पश्चिम की सूखी हवाएं अत्यधिक प्रभावशाली हो जाती हैं, तो वे मानसून की मानसूनी रेखा को उत्तर में हिमालय की तलहटी की तरफ धकेल देती हैं।

  • असर: इसके कारण मानसून का पश्चिमी सिरा पहाड़ों पर चला जाता है, जिससे मध्य, पश्चिम और उत्तर-पश्चिम भारत में हवा की नमी (Humidity) खत्म हो जाती है, आसमान साफ हो जाता है और तेज धूप निकलने लगती है।

  • पूर्वी भारत में राहत क्यों?: चूंकि अभी मानसून का पूर्वी सिरा दक्षिण-पूर्व की ओर झुका है, इसलिए पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों में बारिश का दौर जारी रहेगा।

सामान्य घटना जो इस बार बन गई 'असामान्य' और खतरनाक

वैसे तो मानसून के दौरान एक या दो बार ऐसा ब्रेक लगना सामान्य है (जो आमतौर पर 4-5 दिनों का होता है), लेकिन इस बार का ब्रेक लगभग 10 दिनों का होने का अनुमान है, जो इसे बेहद गंभीर बनाता है।

  • जून की 40% कमी की वापसी का डर: भारत में इस साल जून महीने में औसत से करीब 40 प्रतिशत कम बारिश दर्ज हुई थी। जुलाई के पहले हफ्ते में रिकवरी हुई और यह कमी घटकर 12 प्रतिशत रह गई थी। लेकिन अब इस लंबे ब्रेक के कारण पानी की कमी का ग्राफ फिर से तेजी से ऊपर भागेगा।

  • खेती और किसानों पर संकट: यह खरीफ का सीजन है, जहाँ धान की बुवाई और रोपाई के लिए सबसे ज्यादा पानी की जरूरत होती है। मानसून ब्रेक के लंबे खिंचने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा पर सीधा खतरा मंडराने लगा है।

'अल नीनो' का महा-संकट: 2027 तक झेलनी पड़ सकती है मार

इस साल मानसून के इतना कमजोर और अनिश्चित होने के पीछे सबसे बड़ा विलेन अल नीनो है। अमेरिकी एजेंसी 'एनओएए' और जापान मौसम विज्ञान एजेंसी ने पुष्टि की है कि प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से 0.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक बढ़ गया है।

  • 63% संभावना 'महा-अल नीनो' की: वैज्ञानिकों के अनुसार, इस साल का अल नीनो 1950 के बाद से अब तक दर्ज इतिहास का सबसे शक्तिशाली (Very Powerful) अल नीनो बन सकता है।

  • 2027 हो सकता है सबसे गर्म साल: इंसानी गतिविधियों से बढ़ते ग्लोबल वार्मिंग के बीच, इस अल नीनो का असर 2027 की शुरुआत तक रहने की आशंका है। इसके प्रभाव से वैश्विक तापमान रिकॉर्ड स्तर पर टूटेगा, जिससे दुनिया भर के मानसून और खाद्य आपूर्ति चेन को भारी नुकसान होगा।

मानसून ब्रेक और अल नीनो संकट: एक नजर में

मुख्य बिंदु / क्षेत्रवर्तमान प्रभाव और स्थितिकब तक सुधार की उम्मीद?
प्रभावित क्षेत्रदिल्ली-एनसीआर, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश और पश्चिमी भारत।19–20 जुलाई 2026 के बाद, जब मानसून टर्फ वापस दक्षिण की ओर आएगा।
तापमान का हालदिल्ली और आसपास के मैदानी इलाकों में तापमान 37–38°C तक जाएगा, उमस घटेगी पर शुष्क गर्मी बढ़ेगी।चक्रवाती सिस्टम (Low Pressure) बनने पर ही बंगाल की खाड़ी से नमी दोबारा खिंचेगी।
खेती पर असरधान की फसलों के लिए पानी का संकट; ग्रामीण भारत में रोजी-रोटी पर सीधा असर।संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई से शुरू हो रहा है, जहाँ यह मुद्दा गरमाने के पूरे आसार हैं।

बेबाक24 टेक

ग्लोबल वार्मिंग और अल नीनो का यह गठजोड़ अब केवल अकादमिक चर्चा का विषय नहीं रह गया है, यह सीधे तौर पर भारत के आम आदमी की थाली और अर्थव्यवस्था पर हमला है। जुलाई के महीने में देश के मुख्य मानसूनी बेल्ट का सूखा रह जाना और सैटेलाइट तस्वीरों का अप्रैल जैसा दिखना डराने वाला है।

बेबाक24 का मानना है कि मानसून की इस भारी अनिश्चितता को देखते हुए सरकार को केवल पारंपरिक सिंचाई के भरोसे नहीं रहना चाहिए। संसद के आगामी मानसून सत्र (20 जुलाई से 13 अगस्त) में केवल राजनीतिक रस्साकशी के बजाय विपक्ष और सत्तापक्ष को मिलकर इस 'क्लाइमेट इमरजेंसी' और किसानों के लिए सूखा-राहत बैकअप प्लान पर गंभीरता से चर्चा करनी चाहिए। अगर अल नीनो का यह दौर 2027 तक खिंचता है, तो हमें अपनी कृषि कूटनीति और जल संरक्षण तकनीकों को युद्ध स्तर पर अपग्रेड करना होगा, वरना पानी और अनाज का संकट हमारी विकास दर को थाम देगा।



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