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ई20 पेट्रोल की 'असली कीमत' कौन चुका रहा है? कम माइलेज और महंगे मेंटेनेंस की मार, आखिर 5 साल पहले क्यों लागू हुई नीति?

by on | 2026-07-12 20:15:31

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ई20 पेट्रोल की 'असली कीमत' कौन चुका रहा है? कम माइलेज और महंगे मेंटेनेंस की मार, आखिर 5 साल पहले क्यों लागू हुई नीति?

नई दिल्ली (बेबाक24): भारत में 1 अप्रैल से पूरे देश में 20 फ़ीसदी इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल  की बिक्री अनिवार्य किए जाने के बाद से देशव्यापी बहस और आक्रोश छिड़ गया है। आम उपभोक्ताओं से लेकर ऑटोमोबाइल और ऊर्जा विशेषज्ञों के बीच यह सवाल गूंज रहा है कि आखिर इस नीति की सबसे बड़ी आर्थिक और व्यावहारिक कीमत कौन चुका रहा है?

पेट्रोलियम मंत्रालय ने हाल ही में माना है कि ई20 ईंधन से वाहनों का माइलेज 3 से 5 प्रतिशत तक घट सकता है, लेकिन जमीन पर उपभोक्ताओं और विशेषज्ञों का अनुभव इससे कहीं अधिक गंभीर है।


जेब पर दोहरी मार: सबसे बड़ी कीमत चुका रहे हैं 'पुराने और छोटे वाहन' मालिक

ऑटो एक्सपर्ट अमित खरे और पेट्रोलियम मामलों के जानकार नरेंद्र तनेजा के अनुसार, ई20 पेट्रोल की सबसे बड़ी आर्थिक मार दोपहिया वाहनों  और 1500 सीसी से छोटे इंजन वाली कारों पर पड़ रही है। भारत के मध्यवर्ग और कामकाजी तबके के पास यही गाड़ियां सबसे ज्यादा हैं।


माइलेज में भारी गिरावट

इथेनॉल का ऑक्टेन नंबर भले ही अधिक हो, लेकिन इसकी ऊर्जा घनत्व  शुद्ध पेट्रोल से काफी कम होती है। इस कारण:

  • दोपहिया वाहन: बाइक मालिकों को माइलेज में 10 से 12 प्रतिशत तक की भारी कमी महसूस हो रही है।

  • छोटी कारें (1500 सीसी से कम): माइलेज में करीब 8 से 10 प्रतिशत की गिरावट देखी जा रही है।

  • बड़ी कारें (2 लीटर या अधिक): यहाँ असर अपेक्षाकृत कम, लगभग 6 से 7 प्रतिशत है।


महंगा मेंटेनेंस और फ्यूल पंप फेलियर

तकनीकी रूप से इथेनॉल की प्रकृति पानी/नमी को सोखने की होती है। जब फ्यूल टैंक में नमी बढ़ती है, तो इथेनॉल और पेट्रोल अलग होने लगते हैं। इससे फ्यूल फिल्टर में अशुद्धियां और गंदगी जल्दी जमा होती है, जिससे फ्यूल फिल्टर चोक हो जाता है। मैकेनिक या कंपनियां इसकी सफाई करने के बजाय सीधे पूरा फ्यूल पंप बदलने की सलाह देती हैं, जिससे आम गाड़ी मालिकों को मरम्मत का एक बहुत बड़ा और अप्रत्याशित बिल चुकाना पड़ रहा है।


क्या नीति लागू करने में जल्दबाजी हुई? 2030 का काम 2026 में क्यों?

नीति आयोग के रोडमैप के मुताबिक, ई20 को देश भर में 2030 तक क्रमिक रूप से लागू किया जाना था। लेकिन सरकार ने इसे 5 साल पहले यानी इसी साल पूर्ण रूप से अनिवार्य कर दिया।

  • जल्दबाजी की वजह: नरेंद्र तनेजा के मुताबिक, देश में उम्मीद से पहले बड़े स्तर पर इथेनॉल उत्पादन क्षमता विकसित हो गई। सरकार को लगा कि पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) के तनाव के बीच भारी तेल आयात बिल को इससे तुरंत कम किया जा सकता है।

  • दिक्कत कहाँ हुई: अमित खरे का मानना है कि अगर यह 2030 में लागू होता, तो पुरानी ई5 और ई10 अनुकूल गाड़ियां स्वाभाविक रूप से 10 साल की अवधि पूरी कर सड़कों से बाहर हो चुकी होतीं। सरकार ने पर्याप्त पारदर्शिता नहीं दिखाई और आम उपभोक्ताओं को संभावित असर के बारे में पहले से सतर्क नहीं किया।


कूटनीतिक और पर्यावरणीय बहस: क्या वाकई 'ग्रीन' है इथेनॉल?

सरकार का तर्क है कि ई20 एक हरित ईंधन (Green Fuel) है जो कार्बन उत्सर्जन घटाएगा। लेकिन ऊर्जा अर्थशास्त्र विशेषज्ञ स्वाति शेषाद्रि ने इसके पीछे छिपे एक बड़े संकट की ओर इशारा किया है:

  • पानी की भारी बर्बादी: 1 लीटर इथेनॉल बनाने के लिए लगभग 2860 लीटर पानी की खपत होती है। भारत जैसे देश में, जहाँ भूजल स्तर लगातार गिर रहा है, गन्ने और मक्के जैसी पानी की अत्यधिक खपत वाली फसलों से ईंधन बनाना पानी के संकट को और गहरा कर रहा है।

  • खाद्य सुरक्षा को खतरा: जैसे-जैसे इथेनॉल की मांग बढ़ेगी, किसान खाद्य फसलों के बजाय ईंधन के लिए गन्ना और मक्का उगाएंगे, जिससे खाद्य सुरक्षा (Food Security) प्रभावित हो सकती है।

  • फर्टिलाइजर उत्सर्जन: इन फसलों में भारी मात्रा में उर्वरकों का उपयोग होता है, जो खुद ग्रीनहाउस गैसें उत्सर्जित करते हैं। ऐसे में इसे पूरी तरह 'ग्रीन' कहना एक तकनीकी अतिशयोक्ति है।


ई20 पेट्रोल विवाद: मुख्य बिंदु एक नजर में

प्रभावित क्षेत्र / पहलूजमीनी हकीकत और विशेषज्ञों का दावासरकारी पक्ष / तर्क
वाहन माइलेजदोपहिया में 10-12% और छोटी कारों में 8-10% की कमी।माइलेज में केवल 3 से 5% की मामूली गिरावट संभव।
इंजन और फ्यूल सिस्टमनमी सोखने से फ्यूल फिल्टर चोक और महंगा फ्यूल पंप रिप्लेसमेंट।इंजन सुरक्षित है। ईंधन टैंक में पानी जाना हर पेट्रोल के लिए बुरा है।
ईंधन का विकल्प (E10)पंपों पर पुराना पेट्रोल (E10) भी मिलना चाहिए ताकि पुरानी गाड़ियां खराब न हों।देश के 1 लाख पंपों पर दोहरी व्यवस्था (अलग टैंक/टैंकर) व्यावहारिक व आर्थिक रूप से संभव नहीं।
पर्यावरणीय प्रभाव1 लीटर इथेनॉल = 2860 लीटर पानी की खपत। फर्टिलाइजर से प्रदूषण।तेल आयात पर निर्भरता कम होगी और कार्बन उत्सर्जन घटेगा।

बेबाक24 टेक

भारत सरकार का ऊर्जा सुरक्षा बढ़ाने और कच्चे तेल के आयात बिल को कम करने का इरादा कूटनीतिक रूप से सराहनीय है, विशेषकर तब जब पश्चिम एशिया के युद्ध और होर्मुज़ जलसंधि के संकट के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति खतरे में है। लेकिन इस कूटनीतिक और आर्थिक जीत की सबसे सीधी और तात्कालिक कीमत भारत का आम मध्यमवर्गीय उपभोक्ता और दोपहिया वाहन चालक अपनी जेब से चुका रहा है—पहले कम माइलेज के रूप में और फिर गैरेज में महंगे मेंटेनेंस के रूप में।

बेबाक24 का मानना है कि ब्राजील की तरह भारत में भी उपभोक्ताओं को ईंधन चुनने का विकल्प दिया जाना चाहिए था। कार निर्माता कंपनियों को भी सामने आकर पुराने इंजनों को ई20 के अनुकूल अपग्रेड करने के लिए विशेष किट या सर्विसिंग गाइडलाइंस जारी करनी चाहिए। केवल 'ग्रीन फ्यूल' का नारा देकर आम जनता को तकनीकी समस्याओं और आर्थिक नुकसान के चक्रव्यूह में अकेला नहीं छोड़ा जा सकता।



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