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चीन के 'विस्तारवाद' के खिलाफ भारत का 'ब्रह्मोस कूटनीति' दांव; जानिए क्यों रूस की लिखित रज़ामंदी के बिना भारत नहीं बेच सकता यह अचूक मिसाइल

by on | 2026-07-10 22:34:12

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चीन के 'विस्तारवाद' के खिलाफ भारत का 'ब्रह्मोस कूटनीति' दांव; जानिए क्यों रूस की लिखित रज़ामंदी के बिना भारत नहीं बेच सकता यह अचूक मिसाइल

नई दिल्ली/जियोपॉलिटिकल डेस्क (बेबाक24): भारत अब रक्षा उपकरणों के आयात (Import) वाले देश की छवि को पीछे छोड़कर एक बड़े निर्यातक (Exporter) के रूप में वैश्विक पटल पर उभर रहा है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इंडोनेशिया दौरे के दौरान भारत की सबसे घातक और दुनिया की सबसे तेज़ सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल 'ब्रह्मोस' (BrahMos) के सौदे पर अंतिम सहमति बन गई है। इससे पहले साल 2022 में भारत ने फिलीपींस के साथ 37.4 करोड़ डॉलर (374 मिलियन डॉलर) का ऐतिहासिक रक्षा सौदा किया था।

इंडोनेशिया और फिलीपींस जैसे आसियान (ASEAN) देशों को ब्रह्मोस बेचने के बाद वैश्विक रक्षा गलियारों में यह सवाल सबसे ऊपर है कि क्या भारत इस मिसाइल को बेचने के लिए रूस की अनुमति लेने को बाध्य है? और भारत आखिर अपने इस सबसे भरोसेमंद हथियार को दूसरे देशों को क्यों सौंप रहा है?

क्या ब्रह्मोस बेचने के लिए रूस की मंजूरी अनिवार्य है?

रक्षा विश्लेषकों और सामरिक विशेषज्ञों के मुताबिक, इसका सीधा और स्पष्ट जवाब है—हाँ, रूस की सहमति न केवल अनिवार्य है, बल्कि इस सौदे का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी हिस्सा है।

  • जॉइंट वेंचर और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट (IPR): ब्रह्मोस मिसाइल भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) और रूस की 'एनपीओ मशीनोस्ट्रोयेनिया' (NPO Mashinostroyeniya) का एक संयुक्त उपक्रम (Joint Venture) है। इस मिसाइल के बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) दोनों देशों के पास साझा हैं।

  • ब्रह्मोस एयरोस्पेस बोर्ड का फैसला: जेएनयू में नेशनल सिक्योरिटी स्टडीज के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. लक्ष्मण कुमार के अनुसार, ब्रह्मोस को किस देश को बेचना है और किसे नहीं, इसका फैसला 'ब्रह्मोस एयरोस्पेस बोर्ड' सामूहिक रूप से लेता है। इस बोर्ड में रूसी अधिकारी भी शामिल हैं और दोनों पक्षों की आम सहमति (Consensus) के बाद ही निर्यात को हरी झंडी मिलती है।

  • मुनाफे और तकनीक में हिस्सेदारी: सोसाइटी ऑफ पॉलिसी स्टडीज के निदेशक सी. उदय भास्कर बताते हैं कि मिसाइल के निर्यात से मिलने वाली राशि में रूस की तय व्यावसायिक हिस्सेदारी है। आज की तारीख में भी ब्रह्मोस का सबसे मुख्य हिस्सा—उसका रैमजेट इंजन (Ramjet Engine) और करीब 20 से 30 प्रतिशत कंपोनेंट्स सीधे रूस से ही आते हैं।

आखिर भारत क्यों बेच रहा है ब्रह्मोस? (रणनीतिक और भू-राजनीतिक मायने)

भारत द्वारा ब्रह्मोस मिसाइल का निर्यात केवल 'व्यापारिक मुनाफा' कमाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक बहुत बड़ी 'जियोपॉलिटिकल कूटनीति' काम कर रही है:

चीन को उसके ही पड़ोस में घेरने की रणनीति (Countering China)

भारत जिन देशों (फिलीपींस, इंडोनेशिया और भविष्य में संभावित वियतनाम) को ब्रह्मोस दे रहा है, उन सभी का दक्षिण चीन सागर (South China Sea) में चीन के साथ सीधा क्षेत्रीय या समुद्री आर्थिक क्षेत्र (EEZ) का विवाद है।

विशेषज्ञ टेक: डॉ. लक्ष्मण कुमार के मुताबिक, "भारत के लिए यह रणनीतिक रूप से बेहद फायदेमंद है कि चीन अपने ही पड़ोस में सुरक्षा चुनौतियों में उलझा रहे। जब चीन का ध्यान और उसकी सैन्य ताकत दक्षिण चीन सागर में अपने पड़ोसियों से निपटने में बंटी रहेगी, तो वह हिंद महासागर (Indian Ocean) क्षेत्र में भारत पर उतना सैन्य दबाव नहीं बना पाएगा।"

 'झिझक' छोड़कर प्रभावी प्रतिरोधक क्षमता विकसित करना

पूर्व रक्षा मंत्री दिवंगत मनोहर पर्रिकर के समय भारत वियतनाम को ब्रह्मोस देने में इसलिए हिचकिचाता था कि कहीं चीन नाराज न हो जाए। लेकिन पूर्वी लद्दाख (गलवान घाटी) गतिरोध के बाद भारत ने यह पुरानी कूटनीतिक झिझक पूरी तरह छोड़ दी है। इंडोनेशिया भले ही सीधे तौर पर दक्षिण चीन सागर का दावेदार न हो, लेकिन नातुना द्वीपों के पास चीनी घुसपैठ से वह परेशान है। ब्रह्मोस जैसी मिसाइलें इन कम बजट वाले देशों को चीन जैसी महाशक्ति के खिलाफ एक मजबूत प्रतिरोधक क्षमता (Deterrence) प्रदान करती हैं।

 क्यों दुनिया की कोई भी सबसोनिक मिसाइल ब्रह्मोस का मुकाबला नहीं कर सकती?

सामरिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी के अनुसार, ब्रह्मोस कम संसाधन वाले देशों के लिए एक ऐसा 'गेम-चेंजर' हथियार है जो समुद्री शक्ति के संतुलन को पलट सकता है। इसकी तकनीकी श्रेष्ठता के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

विशेषताब्रह्मोस मिसाइल (BrahMos)अमेरिकी हार्पून / फ्रांसीसी एक्सोसेट
गति (Speed)मैक 2.8 से 3.0 (ध्वनि की गति से 3 गुना तेज़ - सुपरसोनिक)सबसोनिक (ध्वनि की गति से कम)
गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy)अत्यधिक उच्च (विनाशकारी प्रभाव कई गुना ज्यादा)सीमित (पारंपरिक प्रभाव)
ट्रैकिंग और इंटरसेप्शनगति और कम ऊंचाई पर उड़ने के कारण ट्रैक करना लगभग असंभवआधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम द्वारा इंटरसेप्ट करना आसान
निर्यात रेंज (Export Range)290 किलोमीटर (MTCR नियमों के तहत 300km के भीतर सुरक्षित)वेरिएंट के आधार पर अलग-अलग

बेबाक24 टेक

ब्रह्मोस का इंडोनेशिया और फिलीपींस के साथ हुआ यह सौदा भारत की 'एक्ट ईस्ट पॉलिसी' (Act East Policy) की सबसे बड़ी और व्यावहारिक सफलता है। दशकों तक रक्षा उपकरणों के लिए दूसरों पर निर्भर रहने वाला भारत अब खुद वैश्विक सुरक्षा प्रदाता (Security Provider) की भूमिका में आ गया है। यह रूस के साथ भारत के सदाबहार रणनीतिक संबंधों की मजबूती को भी दर्शाता है कि यूक्रेन युद्ध और पश्चिमी देशों के भारी प्रतिबंधों के बावजूद रूस ने भारत के साथ मिलकर इस मिसाइल के निर्यात को बिना किसी रुकावट के जारी रखा है।

'बेबाक24' का मानना है कि भारत का यह कदम सीधे तौर पर चीन के 'आक्रामक विस्तारवाद' की दुखती रग पर हाथ रखना है। मलक्का स्ट्रेट जैसे अति-संवेदनशील और रणनीतिक जलमार्ग पर स्थित इंडोनेशिया के पास पहले से रूसी सुखोई विमानों का बेड़ा है, जिसमें ब्रह्मोस को आसानी से इंटीग्रेट किया जा सकता है। भारत ने यह साफ संदेश दे दिया है कि यदि चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर भारत की सीमाओं को चुनौती देगा, तो भारत भी दक्षिण चीन सागर में चीन के विरोधियों के हाथों में 'ब्रह्मोस' जैसा अचूक और विनाशकारी त्रिशूल थमाकर बीजिंग की रातों की नींद उड़ाने की पूरी कूटनीतिक और सैन्य क्षमता रखता है। भारत सरकार का 2025 तक का 5 अरब डॉलर के रक्षा निर्यात का जो महत्वाकांक्षी लक्ष्य था, ब्रह्मोस उसका सबसे मजबूत स्तंभ बनकर उभरा है।



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