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बंगाल की बिसात (बेबाक24): टीएमसी को महा-झटका; सुखेंदु शेखर राय, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बड़ाईक भाजपा में शामिल; 24 जुलाई के राज्यसभा उपचुनाव से पहले बड़ा खेल

by admin@bebak24.com on | 2026-07-09 21:55:09

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बंगाल की बिसात (बेबाक24): टीएमसी को महा-झटका; सुखेंदु शेखर राय, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बड़ाईक भाजपा में शामिल; 24 जुलाई के राज्यसभा उपचुनाव से पहले बड़ा खेल

कोलकाता ब्यूरो (बेबाक24): पश्चिम बंगाल की सियासत से इस वक्त की सबसे बड़ी और चौंकाने वाली राजनैतिक खबर सामने आ रही है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के तीन कद्दावर पूर्व राज्यसभा सांसद— सुखेंदु शेखर राय, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बड़ाईक ने गुरुवार को आधिकारिक तौर पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) का दामन थाम लिया है।

कोलकाता के साल्ट लेक स्थित भाजपा के राज्य मुख्यालय में आयोजित एक भव्य कार्यक्रम के दौरान, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष शमीक भट्टाचार्य की मौजूदगी में इन तीनों वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी की सदस्यता ग्रहण की। बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद भाजपा का यह अब तक का सबसे बड़ा कूटनीतिक और राजनैतिक दांव माना जा रहा है।

 'दागियों को नो एंट्री, साफ-सुथरी छवि वालों का स्वागत'— शमीक भट्टाचार्य

टीएमसी के इन तीन शीर्ष नेताओं को भाजपा का झंडा थामने के बाद प्रदेश अध्यक्ष शमीक भट्टाचार्य ने पार्टी की नीति को लेकर पत्रकारों के सामने स्थिति साफ की। उन्होंने कहा:

प्रदेश अध्यक्ष शमीक भट्टाचार्य का बयान:

"इन तीनों वरिष्ठ नेताओं का भाजपा में शामिल होना एक अपवाद (Exception) है। भाजपा अपनी इस नीति पर आज भी पूरी तरह अडिग है कि तृणमूल कांग्रेस के भ्रष्ट और दागी नेताओं या कार्यकर्ताओं को पार्टी में शामिल नहीं किया जाएगा। लेकिन, टीएमसी में रहे उन साफ-सुथरी छवि वाले नेताओं को साथ लेने के खिलाफ भाजपा कभी नहीं रही है, जिन्होंने खुद को भ्रष्टाचार से दूर रखा।"

राज्यसभा टिकट पर सस्पेंस: पश्चिम बंगाल से खाली हुई राज्यसभा की इन तीन सीटों पर आगामी 24 जुलाई को उपचुनाव होना है। राजनीतिक गलियारों में यह कयास तेज हैं कि क्या भाजपा इन तीनों नए चेहरों को ही अपना उम्मीदवार बनाकर दोबारा संसद भेजेगी? इस सवाल पर शमीक भट्टाचार्य ने सीधा जवाब न देते हुए मुस्कुराकर सिर्फ इतना कहा— "मजा लीजिए, कयास जारी रहने दें।"

 जून महीने में ही तीनों ने छोड़ दी थी टीएमसी और संसद की सदस्यता

गौरतलब है कि इन तीनों नेताओं की बगावत की पटकथा पिछले महीने ही लिखी जा चुकी थी, जब इन्होंने एक-एक कर पार्टी और संसद से इस्तीफा दे दिया था:

  • सुखेंदु शेखर राय: टीएमसी के सबसे वरिष्ठ और संसदीय मामलों के जानकार सुखेंदु शेखर राय ने 8 जून को राज्यसभा की सदस्यता और पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा देकर खलबली मचा दी थी।

  • सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बड़ाईक: इसके ठीक बाद 10 और 11 जून को सुष्मिता देव (उत्तर-पूर्व का बड़ा चेहरा) और प्रकाश चिक बड़ाईक ने भी पार्टी और राज्यसभा से अपने इस्तीफे सौंप दिए थे, जिसके बाद से ही इनके भाजपा में जाने की अटकलें थीं।

'टीएमसी में रहकर भी हम पर कोई दाग नहीं'— सुखेंदु और सुष्मिता का पलटवार

भाजपा की सदस्यता लेने के तुरंत बाद सुखेंदु शेखर राय और सुष्मिता देव ने ममता बनर्जी की पार्टी को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आड़े हाथों लिया।

  • सुष्मिता देव का दावा: "मैं चुनौती देकर कह सकती हूँ कि तृणमूल कांग्रेस में रहने के बावजूद मेरे पूरे राजनैतिक करियर में मुझ पर भ्रष्टाचार का एक भी आरोप नहीं लगा। हमने हमेशा सिद्धांतों की राजनीति की है।"

  • सुखेंदु शेखर राय का रुख: सुखेंदु शेखर ने भी सुष्मिता की बात का समर्थन करते हुए कहा कि टीएमसी के भीतर का दमघोंटू और भ्रष्ट माहौल अब बर्दाश्त से बाहर हो चुका था, इसलिए साफ-सुथरी छवि वाले नेताओं के लिए वहां बने रहना मुमकिन नहीं था।

बेबाक24 टेक

सुखेंदु शेखर राय, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बड़ाईक का भाजपा में जाना केवल तीन सांसदों का दलबदल नहीं है, बल्कि यह बंगाल की राजनीति में टीएमसी के वैचारिक और प्रशासनिक पतन का सबसे बड़ा कूटनीतिक प्रमाण है। सुखेंदु शेखर राय जैसे कद्दावर और अनुभवी नेता, जो संसद में टीएमसी की आवाज हुआ करते थे, उनका पाला बदलना यह साफ दिखाता है कि पार्टी के भीतर अंदरूनी कलह और असंतोष किस कदर चरम पर है।

'बेबाक24' का मानना है कि भाजपा प्रदेश अध्यक्ष शमीक भट्टाचार्य का यह तर्क कि 'हम केवल साफ-सुथरी छवि वालों को ले रहे हैं', पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं को शांत करने की एक कूटनीतिक कोशिश है। बंगाल में सत्ता में आने के बाद भाजपा ने दावा किया था कि वह टीएमसी के किसी नेता को नहीं लेगी, लेकिन 24 जुलाई को होने वाले राज्यसभा उपचुनाव के गणित को जीतने और टीएमसी को मनोवैज्ञानिक रूप से पछाड़ने के लिए भाजपा ने अपनी ही नीति में थोड़ा 'राजनैतिक समझौता' कर लिया है। सुष्मिता देव के आने से भाजपा को असम और त्रिपुरा जैसे उत्तर-पूर्वी राज्यों में भी फायदा होगा। अब देखना यह है कि क्या भाजपा इन तीनों को वापस राज्यसभा भेजकर पुरस्कृत करती है या इन्हें बंगाल की सांगठनिक राजनीति में इस्तेमाल करती है। ममता बनर्जी के लिए यह अपनी साख और किले को बचाने की एक बेहद कठिन परीक्षा है।



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